पिता किसान थे, दादा भी किसान थे. परिवार का मुख्य पेशा खेती है. बेंगलुरु के रहने वाले कारिगौड़ा को स्नातक तक पढ़ाई करने के बाद अच्छी नौकरी मिल रही थी. लेकिन उन्होंने नौकरी के बजाय खेती को ही अपना करियर चुना. हालांकि कारिगौड़ा अपने दादा-पिता की तरह पारंपरिक खेती नहीं करना चाहते थे.
दरअसल, कारिगौड़ा (Karigowda) को पता था कि पारंपरिक खेती में अधिकतर किसान कम लाभ और बाजार की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, उन्होंने आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग को समझकर सफलता की नई कहानी लिखी दी है. एक इंटरव्यू में कारिगौड़ा ने बताया कि उन्होंने अपनी 3.5 एकड़ जमीन पर 'बेबी बॉटल गॉर्ड' यानी छोटी लौकी उगाने का फैसला किया.
ये फैसला उनके लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. आज वो केवल लौकी की खेती करके रोजाना लगभग 50,000 रुपये की मोटी कमाई कर रहे हैं. इस पैदावार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी भारी मांग खाड़ी देश खासकर कतर (Qatar) के बाजारों में है.
पारंपरिक खेती से निर्यात बाजार तक का सफर
कारिगौड़ा एक पारंपरिक किसान परिवार से आते हैं, उनके परिवार के लोग मक्का, बैंगन और टमाटर जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते थे. लेकिन स्थानीय बाजारों में उपज का सही दाम न मिलना और बिक्री में आने वाली समस्याएं एक बड़ी चुनौती थीं. जिसे वो करीब से महसूस किया करते थे.
मोटी कमाई के लिए उन्होंने टेक्नोलॉजी की मदद ली. ड्रिप इरिगेशन, मल्चिंग और आधुनिक कृषि उपकरणों को अपनाया. इसी दौरान उन्हें विदेशों में छोटी सब्जियों की बढ़ती मांग के बारे में पता चला, जिसके बाद उन्होंने 'बेबी लौकी' उगाने का फैसला किया.
कतर में क्यों है 'बेबी लौकी' की इतनी मांग?
भारतीय बाजारों में आमतौर पर बड़ी लौकी बेची जाती है, लेकिन कतर जैसे देशों में छोटे परिवारों के लिए 500 ग्राम वजन वाली 'बेबी लौकी' पहली पसंद बन चुकी है. छोटे साइज की लौकी को एक ही समय के भोजन में पूरा पकाया जा सकता है. इससे सब्जी को काटकर फ्रिज में रखने की झंझट खत्म हो जाती है.
समय से पहले तोड़ लेने से इन छोटी लौकियों की छाल बहुत पतली, मुलायम और बीज बहुत नरम होते हैं. स्वाद में यह सामान्य लौकी से अधिक मीठी और स्वादिष्ट होती हैं.
कमाई का गणित और निर्यात प्रक्रिया
कारिगौड़ा अधिकतर 'स्वीकार 045 F1' किस्म की लौकी उगाते हैं. वह जून-जुलाई में बुवाई करते हैं और लगभग 70 दिनों बाद यानी सितंबर से दिसंबर के बीच फसल की कटाई शुरू होती है. उनकी फसल से रोजाना लगभग 1000 किलो लौकी निकलती है. बड़े व्यापारी उनके खेत से ही 50 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से उपज खरीद लेते हैं.
आप आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस खेती से कारिगौड़ा कितनी तगड़ी कमाई कर रहे हैं. 1,000 किलो लौकी की दाम 50,000 रुपये बैठता है. 90 दिनों के कटाई के सीजन में उनकी कुल कमाई लगभग 45 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. यानी वो केवल आधुनिक तरीके से लौकी उगाकर 15 लाख रुपये महीने कमा रहे हैं.
व्यापारी सीधे खेत पर आकर उपज खरीदते हैं और कतर भेजने के लिए लॉजिस्टिक्स व एक्सपोर्ट की प्रक्रिया संभालते हैं. इससे कारिगौड़ा को मार्केटिंग या परिवहन का तनाव नहीं लेना पड़ता और वह पूरी तरह से हाईटेक खेती पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं.
सही समय पर कटाई है सबसे महत्वपूर्ण
कारिगौड़ा बताते हैं कि निर्यात बाजार के लिए समय प्रबंधन बहुत नाजुक होता है. अगर लौकी को लत में कुछ घंटे भी अधिक छोड़ दिया जाए, तो उसका वजन 500 ग्राम से बढ़कर 800 ग्राम हो जाता है, जो एक्सपोर्ट के मानकों के अनुकूल नहीं रहता. इसलिए हर दिन सटीक आकार पर ही कटाई की जाती है.
आजतक बिजनेस डेस्क