
यह एक ऐसी दुनिया की कहानी है जहां परिंदे भी अपनी उड़ान की ऊंचाई भूल जाते हैं. जहां खिड़की से बाहर झांकने पर नीचे सड़क नहीं, बल्कि बादलों का समंदर दिखाई देता है. 100वीं मंजिल की बालकनी से नीचे सड़क पर चलती गाड़ियां माचिस के डिब्बे जैसी और इंसान चींटियों की तरह नजर आते हैं. एक जमाने में ऊंची इमारतों का मतलब न्यूयॉर्क का 'मैनहट्टन' होता था, लेकिन अब यह ताज किसी वेस्टर्न देश के पास नहीं है. आज ऊंचाइयों की रेस में एशियाई शहर हॉन्गकॉन्ग निर्विवाद रूप से सबसे आगे है.
गगनचुंबी इमारतों की लिस्ट वहां से शुरू होती है जहां इमारतों की ऊंचाई 150 मीटर यानी करीब 500 फीट से ऊपर पहुंच जाती है. स्काई स्क्रैपर सेंटर की लिस्ट के मुताबिक हॉन्गकॉन्ग में 569 ऐसी इमारतें हैं जिनकी ऊंचाई 150 मीटर से अधिक है. जबकि चीन के शेनजेन में 469 ऐसी इमारतें हैं. तीसरे नंबर पर है अमेरिका का न्यूयॉर्क जहां 324 इमारतें 150 मीटर से ऊंची हैं. नंबर 4 पर दुबई है जहां 269 इमारतें ऐसी हैं.
50 शहरों की लिस्ट में भारत से केवल एक शहर है. नंबर-15 पर भारत की आर्थिक लाइफलाइन कही जाने वाली मुंबई. जहां 113 इमारतें इस ऊंचाई की रेखा को पार करती हैं. हालांकि, अब नोएडा और गुड़गांव भी इस वर्टिकल विस्तार का हिस्सा बन रहे हैं.

अगर बात करें हॉन्गकॉन्ग की तो इसे टॉलेस्ट सिटी का खिताब किसी शौक से नहीं मिला. एक मजबूरी से लड़ते हुए इस शहर ने आसमान पर कब्जा जमा लिया. एक तरफ गहरा दक्षिण चीन सागर और दूसरी तरफ ऊबड़-खाबड़ पहाड़... इस शहर के पास फैलने के लिए जमीन का एक टुकड़ा भी जब शेष नहीं बचा तो यहां के इंजीनियरों और आर्किटेक्ट्स ने एक फैसला किया- अब आसमान को बांटना होगा.
जमीन की जंग से पार पाने के लिए जब इंजीनियरों और रियल स्टेट सेक्टर ने गगनचुंबी सफर शुरू किया तो कुछ दशकों में ही यहां देखते-देखते आसमान में रिहाइश का इंतजाम होने लगा. यहां की सबसे ऊंची इमारत है 'इंटरनेशनल कॉमर्स सेंटर' की बिल्डिंग. यह 484 मीटर की ऊंचाई वाली है. शहर की स्काईलाइन इतनी घनी है कि रात के समय यह रोशनी के एक कृत्रिम पहाड़ जैसी नजर आती है.

लेकिन, स्काईस्क्रैपर्स का मतलब इमारतों का सिर्फ ऊंचा होना नहीं, बल्कि 'स्मार्ट' होना भी है. इसके लिए पहले ऊंचाई के विज्ञान को समझना जरूरी है. इतनी ऊंचाई तक जहां हवाएं अपना रास्ता बदलती हैं वहां घर बनाना महज ईंट और सीमेंट का खेल नहीं है. यहां असली खिलाड़ी है- 'फिजिक्स'. विंड डैम्पर्स यानी हॉन्गकॉन्ग की इमारतों में विशालकाय स्टील के गोले लगे होते हैं. जब तेज समुद्री हवा इमारत को धकेलती है, तो ये डैम्पर्स उसे विपरीत दिशा में संतुलित कर देते हैं.
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एक-डेढ़ हजार फीट की ऊंचाई पर बने फ्लैट में रहने वाले इंसान के लिए नीचे का सफर आसान रहे इसके लिए इन इमारतों में सुपरफास्ट लिफ्ट की भी जरूरत होती है. यहां की लिफ्ट 20 मीटर प्रति सेकंड की गति से चलती हैं, जो आपको पलक झपकते ही बादलों के पार ले जाती हैं और फिर दफ्तर या स्कूल जाने वालों को इतनी ही तेजी से नीचे भी लाती हैं.

आसमान में घर है तो हरियाली भी चाहिए. इसके लिए अब दुनिया भर के आर्किटेक्ट्स 'वर्टिकल फॉरेस्ट' बना रहे हैं. जहां हर बालकनी में पेड़ होंगे और इमारतें अपनी बिजली खुद पैदा करेंगी. आसमान में सजी इस नई दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बड़े शहरों में ड्रोन से सामान डिलीवरी की सर्विसेज भी शुरू होने लगी है. मतलब आप 100वें फ्लोर के अपने फ्लैट की बालकनी में बैठे हों और पिज्जा खाने का मन करे तो 15-मिनट में ड्रोन आकर आपकी बालकनी में पिज्जा डिलीवर करके चला जाए. मतलब एक ऐसी दुनिया जो जमीन पर टिकी भले ही हो लेकिन जिसकी उम्मीदें जमीन से काफी ऊपर उठ चुकी हों, जहां केवल इंसानों के जरिए मैनुअल सर्विस ही नहीं ड्रोन की उड़ान और स्पीड भी शामिल हो.
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वैसे देखा जाए तो मुंबई की स्थिति भी हॉन्गकॉन्ग से काफी मिलती-जुलती है- तीनों ओर समुद्र और सीमित जमीन. इसीलिए देश की 90% गगनचुंबी इमारतें मुंबई में ही दिखती हैं. भारत की सबसे ऊंची इमारतों में 'वर्ल्ड वन' जैसी संरचनाएं शामिल हैं, जो करीब 280 मीटर ऊंची हैं. ये इमारतें केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं हैं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था का चेहरा हैं. नोएडा और गुड़गांव जैसे शहर भी आसमानी रिहाइश वाले शहरों के रूप में तेजी से बदल रहे हैं. जहां 'लाइफ एट द टॉप' यानी 'ऊपर की ओर जीवन' एक नया स्टेटस सिंबल बन गया है.

हॉन्गकॉन्ग की चमकती स्काईलाइन हो या मुंबई की समंदर किनारे खड़ी मीनारें- ये इमारतें इंसान की उस जिद का प्रतीक हैं कि अगर नीचे जगह न मिले, तो हम आसमान में अपना घर बना लेंगे. तो अगली बार जब आप ऊपर गगनचुंबी इमारतों की ओर देखें, तो याद रखें- आप सिर्फ एक बिल्डिंग को ही नहीं, बल्कि इंसान की असीमित कल्पना को देख रहे हैं, आप आसमान में विस्तृत होती एक दुनिया को देख रहे हैं.