अभी ईरान के साथ अमेरिका की जंग खत्म भी नहीं हुई है. लेकिन ट्रंप ने अपना अगला शिकार चुन लिया है. ट्रंप अब अमेरिकी राज्य फलोरिडा से करीब 170 किलोमीटर दूर मौजूद एक करोड़ दस लाख की आबादी वाले देश क्यूबा पर कब्जा करना चाहते हैं. हालांकि जिस तरह से पिछले पांच सौ सालों में ईरान को कोई भी मुल्क हरा नहीं पाया, ठीक वैसे ही पिछले 67 सालों में अमेरिका के 13 राष्ट्रपति क्यूबा पर कब्जा करने की हसरत दिल में लिए हुए चले गए. लेकिन वे सभी क्यूबा पर कब्जा नहीं कर पाए. तो चलिए आपको सिलसिलेवार तरीके से बताते हैं कि आखिर अमेरिका क्यूबा पर कब्जा क्यों करना चाहता है.
35 दिन बीत चुके हैं. तीन देशों के बीच जंग को. ये जंग अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही है. लेकिन इस जंग की आग में जाने-अनजाने पूरी दुनिया झुलस रही है. अगर ये जंग जल्दी नहीं रुकी और ईरान समेत मीडिल ईस्ट के देशों के तेल और गैस में यूं ही आग लगती रही, तो आने वाले दिनों में दुनिया की क्या तस्वीर होगी. इसकी एक बानगी दुनिया के एक देश की तस्वीर से कोई भी समझ सकता है. हालांकि इस देश का अमेरिका, इजरायल या ईरान के बीच जारी जंग से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन बिना तेल, गैस और बिजली के दुनिया के देशों की तस्वीर कैसी होगी, ये देश उसकी झलकभर है.
इस देश का नाम है क्यूबा. कुल जमा 1 करोड़ 10 लाख की आबादी है इस देश की. पर फिलहाल इस देश की हालत ये है कि इस वक्त पूरा देश ही ब्लैक आउट है. ना तेल है, ना गैस है, ना बिजली है. लिहाजा ना इस देश में घरों में बत्तियां जल रही हैं, ना गैस के चूल्हे जल रहे हैं. ना सड़कों पर गाड़ियां दौड़ रही हैं. ना अस्पताल में ऑपरेशन हो रहे हैं. ना कल-कारखाने चल रहे हैं और ना ही स्कूल, कॉलेज और दफ्तर खुल रहे हैं.
बस यूं समझ लीजिए कि सिर्फ तेल, गैस और बिजली ने इस देश को पूरी तरह से खा-पी लिया है. पूरी दुनिया का ध्यान इस वक्त ईरान की तरफ है. जो अमेरिका और इजरायल से एक साथ लोहा ले रहा है. लिहाजा, दुनिया के लोग और दुनिया के नेताओं को फिलहाल क्यूबा की कोई फिक्र ही नहीं है. एक करोड़ दस लाख लोगों की पूरी जिंदगी उलट-पुलट होकर रह गई है. और ये सबकुछ इसलिए हो रहा है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप उस क्यूबा पर कब्जा पाने की हसरत पाले हैं, जिस क्यूबा पर अमेरिका के पिछले 13 राष्ट्रपति तमाम कोशिशों के बावजूद कभी कब्जा नहीं कर पाए.
ये वो क्यूबा है, जिसके चलते एक बार तो ऐसी नौबत आ गई थी कि बस दुनिया ही खत्म होने वाली थी. क्योंकि तब इसी क्यूबा के चलते अमेरिका और रूस परमाणु बम लेकर एक दूसरे के आमने-सामने आ गए थे. आखिर बीते 67 सालों से अमेरिका एक छोटे से देश क्यूबा को क्यों हथियाना चाहता है? तो इसकी पूरी कहानी शुरू करें, उससे पहले डोनाल्ड ट्रंप का ये ऐलान या बयान सुन लीजिए. जो क्यूबा को लेकर उनका सबसे ताजा बयान है.
नॉर्थ अमेरिका के अमेरिकी राज्य फ्लोरिडा से लगभग 170 किमी दूर समंदर में एक छोटा सा द्वीप है. कैरिबियन द्वीप. और इसी कैरिबियन द्वीप या आईलैंड का ये सबसे बड़ा आईलैंड है क्यूबा. इस क्यूबा में कुल 1 करोड़ 10 लाख लोग रहते हैं. बहुत से इतिहासकार क्यूबा को चीनी की कटोरी भी कहते हैं. दरअसल, क्यूबा अपनी चीनी, कॉफी, नेचुरल रिसोर्सेज़, मिनरल्स, सिगरेट और सिगार के लिए दुनिया भर में जाना जाता है.
क्यूबा की कहानी शुरू होती है स्पेन के मशहूर खोजकर्ता कोलंबस से. वो कोलंबस ही था जिसने 1492 में क्यूबा की खोज की थी. चूंकि कोलंबस स्पेन का था, लिहाजा क्यूबा की खोज की खबर तब के स्पेन के हुक्मरानों तक पहुंची. तब स्पेन में एक ताकतवर साम्राज्य हुआ करता था. स्पेन ने क्यूबा पर हमला कर उस पर अपना कब्जा जमा लिया. अगले चार सौ सालों तक क्यूबा पर स्पेन की हुकूमत रही. हालांकि जब स्पेन ने क्यूबा पर कब्जा किया था, तब भी अमेरिका इससे नाराज था. लेकिन तब अमेरिका आज की तरह सुपर पावर नहीं हुआ करता था.
19वीं सदी आते-आते अमेरिका फलने-फूलने लगा था. चूंकि क्यूबा अमेरिकी राज्य फ्लोरिडा के बिल्कुल बराबर में था, लिहाजा अमेरिका अब या तो क्यूबा को हड़पना चाहता था या फिर स्पेन की हुकूमत खत्म होने के बाद वहां अपना कंट्रोल चाहता था. स्पेनी हुकूमत के आखिरी दौर में क्यूबा के लोग विद्रोह पर उतर आए थे. और इस विद्रोह को चिंगारी दे रहा था अमेरिका. अमेरिका पैसे और हथियारों से विद्रोहियों की मदद कर रहा था. क्यूबा के लोग क्यूबा पर अमेरिकी कब्जे की अमेरिकी मंशा को समझ ना पाएं, इसलिए तब अमेरिका ने उन्हें यकीन दिलाया था कि वो सिर्फ क्यूबा की आजादी चाहता है. कब्जा नहीं.
स्पेनी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए तब लोगों ने अमेरिका पर भरोसा करना शुरू कर दिया. क्यूबा के लोग चाहते थे कि अमेरिका उन्हें आजादी दिलाने में उनकी मदद करे. तब माहौल को देखते हुए अमेरिका ने बड़ी चालाकी से एक शर्त रख दी. शर्त ये कि क्यूबा की आजादी के बाद वहां के अंदरुनी मामलों, राजनीतिक दलों, चुनाव और सरकार में उसका भी दखल रहेगा. दरअसल, अमेरिका समझ चुका था कि अब क्यूबा कभी भी आजाद हो सकता है और सचमुच ऐसा ही हुआ.
चार सौ लंबे सालों की गुलामी के दौर के बाद 1902 में क्यूबा आजाद हो गया. आजादी के बाद क्यूबा की जनता ने अपनी सरकार चुन ली. देश के पहले राष्ट्रपति बने टॉमस पाल्मा. तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे रूजवेल्ट. अब कायदे से क्यूबा आजाद था. वहां की अपनी सरकार. लेकिन धीरे-धीरे अब क्यूबा पर अमेरिकी कंट्रोल बढ़ता जा रहा था. पाल्मा के बाद कई और राष्ट्रपति आए. अब तक सबकुछ ठीक था. लेकिन फिर 1933 में फल्गेनसियो बतिस्ता क्यूबा को राष्ट्रपति बने और यहीं से क्यूबा की कहानी पलटनी शुरू हो गई.
दरअसल, बतिस्ता पूरी तरह अमेरिका के ईशारे पर ही काम कर रहे थे. बतिस्ता के कार्यकाल में ही धीरे-धीरे क्यूबा की हर चीज पर अमेरिका और अमेरिकी कंपनियों का कब्जा होता चला गया. गन्ने की खेती, चीनी मिल, कॉफी की खेती, सिगरेट, सिगार, शराब और यहां तक कि टूरिज्म पर भी अमेरिकी कंपनियों का अब कब्जा था. अमेरिका ने बतिस्ता के दौर में ही क्यूबा और उसके खूबसूरत द्वीप हवाना में केसिनो, शराब के अड्डे, जिस्मफरोशी की दुकानें खोलनी शुरू कर दी. इससे अमेरिकी कंपनी मालामाल होती गई, जबकि क्यूबा के लोग बेरोजगार होते चले गए. 1950 आते-आते क्यूबा के लोगों का सब्र टूटने लगा और वो बतिस्ता के खिलाफ हो गए.
बतिस्ता के खिलाफ इसी विरोध आंदोलन ने एक नेता को जन्म दिया. नाम था- फिडेल एलेजेंड्रो कास्त्रो रुज. जिसे आगे चल कर दुनिया फिडेल कास्त्रो के नाम से जानने लगी. फिडेल कास्त्रो की अगुवाई में क्यूबा में ऐसा जनआंदोलन छिड़ा कि 1959 में यानी पूरे 26 साल बाद बतिस्ता को कुर्सी से हटना पड़ा. अब फिडेल कास्त्रो क्यूबा के नए शासक थे. क्यूबा में अब कॉम्युनिस्ट राज आ चुका था. सत्ता संभालते ही फिडेल कास्त्रो ने जो सबसे पहला काम किया, जिसकी वजह से क्यूबा के लोग भड़के हुए थे, वो ये कि एक जनवरी 1959 को कास्त्रो ने सभी अमेरिकी कंपनियों से फौरन क्यूबा छोड़ कर जाने को कह दिया.
क्यूबा में अब फिर से चीनी, कॉफी, सिगरेट, सिगार, नैचुरल रिसोर्सेज, पब, बार, केसिनो सभी पर क्यूबा की हुकूमत और क्यूबा के लोगों का कब्जा हो चुका था. कास्त्रो के इस फैसले से क्यूबा के नागरिक बेहद खुश थे. लेकिन अमेरिका नाराज हो गया. यही वो नाराजगी थी, जो बीते 67 सालों से आज भी जारी है. क्यूबा से अमेरिकी कंपनियों की विदाई हो चुकी थी. वहां की सरकार में भी अब अमेरिकी दखलंदाजी खत्म हो चुकी थी. इससे अमेरिका भड़क गया. तब आईजनहावर अमेरिका के राष्ट्रपति थे. हावर वो पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे, जो फिडेल कास्त्रो का या तो तख्तापलट चाहते थे या कास्त्रो को मारना चाहते थे.
फिडेल कास्त्रो के सत्ता में आने के सिर्फ दो साल बाद ही क्यूबा में तख्तापलट के लिए अमेरिका ने पहला ऑपरेशन चलाया. ऑपरेशन बे ऑफ पिग. इस ऑपरेशन के तहत सीआईए ने 32 बतिस्ता की सेना के करीब 1500 लोगों को ट्रेनिंग दी, हथियार दिए और पांच अमेरिकी जहाजों को क्यूबा के झंडे का पेंट कर और क्यूबा की जहाज का रंग देकर क्यूबा भेज दिया. लेकिन कास्त्रो को पता चल चुका था. लिहाजा, सौ से ज्यादा विद्रोही मारे गए और बाकी पकड़े गए. इस ऑपरेशन के बाद अब अमेरिका में जॉन एफ केनेडी नए राष्ट्रपति बन चुके थे.
केनेडी ने फिडेल कास्त्रो के तख्तापलट के लिए फिर से ऑपरेशन चलाने का हुक्म दिया. इस ऑपरेशन का नाम रखा गया- ऑपरेशन मंगूज. 61 से 63 तक, दो सालों तक ये ऑपरेशन चला. दरअसल, इस ऑपरेशन के जरिए केनेडी क्यूबा को आर्थिक तौर पर इतना कमजोर कर देना चाहते थे कि वो अमेरिकी से समझौता कर ले. इस ऑपरेशन के दौरान क्यूबा की कॉफी की खेती, गन्ने की खेती, अनाज के गोदाम, पुल, सड़क, बिजली घर सभी को भारी नुकसान पहुंचाया गया.
यही वो ऑपरेशन था जिसके दौरान क्यूबा रूस के करीब आ चुका था. रूस में भी कॉम्युनिस्ट सरकार थी और अमेरिका क्यूबा का दुश्मन. अब रूस ने क्यूबा की मदद करनी शुरू कर दी. दो साल तक चले ऑपरेशन मंगूज के तहत भी जब अमेरिका फिडेल कास्त्रो की सरकार नहीं गिरा पाया और वहां के लोगों को भड़काने में नाकाम रहा, तब केनेडी ने एक और कोशिश की. सीआईए को हुक्म दिया कि वो किसी भी कीमत पर फिडेल कास्त्रो को मार दे.
सीआईए के इतिहास में शायद ये इकलौता ऐसा मामला है, जब उसने किसी को मारने के लिए इतनी कोशिश की कि ये मामला गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में दर्ज हो गया. शायद ही ऐसा कोई तरीक़ा हो, जो सीआईए ने फिडेल कास्त्रो को मारने के लिए ना अपनाया हो. सीआईए ने कुल 638 बार फिडेल कास्त्रो को मारने की कोशिश की. चूंकि फिडेल कास्त्रो सिगार के शौकीन थे, लिहाजा कहते हैं कि सबसे ज्यादा कोशिश उन्हें सिगार के जरिए ही मारने की, की गई. कभी सिगार में बारूद भर दिया गया, कभी सिगार में जहर.
फिडेल कास्त्रो को स्विमिंग का शौक था. गोताखोरी के दौरान उनकी ऑक्सीजन मास्क तक को खराब किया गया. चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, पानी, खाना ऐसी कोई चीज नहीं बची थी, जिसके जरिए फिडेल कास्त्रो को मारने की साजिश ना रची गई. कास्त्रो के नाई तक को सीआईए ने अपनी तरफ मिला लिया था. लेकिन भेद खुल गया और कास्त्रो बच गए. पब्लिक मीटिंग के दौरान कास्त्रो के माइक तक में बम लगाया गया. प्रेस ब्रीफिंग के दौरान मीडिया के कैमरे में भी बम फिट किया गया. उनकी जीप, गाड़ी, यहां तक कि चॉपर में भी बम फिट किए गए. लेकिन हर साजिश की जानकारी कास्त्रो को पहले मिल जाती.
फिडेल कास्त्रो को मारने के लिए लड़कियों की शक्ल में हनीट्रैप का भी इस्तेमाल हुआ. लेकिन वो सारी लड़कियां भी पकड़ी गईं. इस तरह सीआईए की हर साजिश को फिडेल कास्त्रो ने नाकाम कर दिया. फिडेल कास्त्रो को मारने की साजिश के साथ-साथ अमेरिका अपने स्पाई प्लेन से क्यूबा की निगरानी कर रहा था. ऐसे कई स्पाई प्लेन को भी फिडेल कास्त्रो ने मार गिराया. लेकिन अमेरिका का एक स्पाई प्लेन क्यूबा के ऊपर उड़ान भरने में कामयाब रहा. और तब उस प्लेन से ली गई तस्वीर ने जो अमेरिका को दिखाया, वो अमेरिका के होश उड़ाने वाला था. असल में रूस ने क्यूबा में अपने न्यूक्लियर मिसाइल तैनात कर दिए थे. क्यूबा में रूसी न्यूक्लियर मिसाइल के तैनात होने का मतलब ये था कि अमेरिका का हर शहर अब रूसी परमाणु बम की रेंज में था.
दरअसल, इससे पहले हुआ ये था कि अमेरिका ने तुर्की जो अब तुर्किए हो चुका है, वहां और इटली में अपने परमाणु मिसाइल तैनात कर दिए थे. उस परमाणु मिसाइल का नाम था- जुपिटर मिसाइल. तुर्किए से रूस की दूरी मुश्किल से पौने दो सौ किलोमीटर भी नहीं है. तुर्किए में परमाणु मिसाइल तैनात करने का मतलब सीधे-सीधे ये था कि अमेरिका रूस के किसी भी शहर को बड़ी आसानी से अपने परमाणु बमों का निशाना बना सकता था.
लिहाजा, जैसे ही क्यूबा में रूसी परमाणु मिसाइलों की तैनाती की बात अमेरिका को पता चली, अमेरिका ने पूरे क्यूबा को अमेरिकी नेवी के जंगी जहाजों से घेर लिया. इतना ही नहीं अमेरिका ने क्यूबा पर तमाम आर्थिक पाबंदी लगा दी. इससे हुआ ये कि कोई भी देश क्यूबा से कारोबार नहीं कर सकता था. क्यूबा की घेरेबंदी से क्यूबा तक पहुंचना भी मुश्किल कर दिया गया. तब ऐसे हालात में दोस्त बन कर रूस सामने आया.
रूस ने अपने जंगी जहाज और परमाणु बमों से लैस दो बी-59 पनडुब्बी मॉस्को से क्यूबा की तरफ रवाना कर दिया. रूसी हलचल की भनक अमेरिका को भी थी. अमेरिका अब क्यूबा के इर्द-गिर्द लगातार सुरक्षा बढ़ा रहा था. अमेरिका को ये भी डर था कि कहीं परमाणु बमों से लैस रुसी पनडुब्बी करीब ना आ जाए. इसी अंदेशे के चलते बीच-बीच में अमेरिकी नौसैनिक समंदर के अंदर गोलिया और बम भी बरसा रहे थे.
इत्तेफाक से ऐसे ही एक रूटीन फायर के दौरान एक धमाका समंदर के अंदर मौजूद रूसी बी-59 पनडुब्बी पर होता है. तब ये पनडुब्बी समंदर के अंदर गहरे पानी में थी. धमाके के बाद इस पनडुब्बी का संपर्क मॉस्को से टूट गया. मॉस्को से रवाना होने से पहले ही रूस ये तय कर चुका था कि अगर पनडुब्बी का संपर्क कभी भी मॉस्को से टूट जाता है, तो फिर इस पनडुब्बी से फौरन परमाणु हमला कर दो. लेकिन इस हमले की इजाजत तभी थी, जब तीन अफसर एक साथ इसके लिए अपनी रजामंदी दे दें. ये तीन अफसर थे- पनडुब्बी के कैप्टन कमांडर वेलेंटाइन सेवेत्सकी, सेकंड इन कमांड वसीली आर्किपोव और पॉलिटिकल ऑफिसर इवान मासले निकोव.
कमांडर वेलेंटाइन सेवेत्सकी ने अपनी राय दी कि परमाणु बम छोड़ देना चाहिए. लेकिन सेकंड इन कमांड वसीली आर्किपोव इसके खिलाफ थे. वो आर्किपोव ही थे, जिन्होंने कहा कि एक बार पनडुब्बी को समंदर के ऊपर ले जा कर ये देखना चाहिए कि अमेरिकी नौसेना ने जानबूझ कर ये हमला किया है या फिर रूटीन फायर में ये गलती हो गई. पॉलिटिकल ऑफिसर इवान मासले निकोव भी भी आर्किपोव से सहमत थे. अगर उस दिन आर्किपोव कमांडर के साथ राजी हो जाते, तो अमेरिका और रूस के बीच शर्तिया परमाणु युद्ध हो जाता.
वो 27 अक्टूबर 1962 की बात थी. इसी के बाद अब रूसी पनडुब्बी समंदर की गहराई से पानी के ऊपर आती है. जैसे ही पनडुब्बी पानी के ऊपर आई, सामने अमेरिकी जहाज खड़ा था. हालात बेहद तनावपूर्ण थे. एक जरा सी चूक दोनों तरफ से परमाणु हमलों को हवा दे सकते थे. आनन-फानन में मॉस्को और वॉशिंगटन में बात हुई. तब रूस के राष्ट्रपति थे निकिता क्रूशचेव. जबकि अमेरिका के जॉन एफ केनेडी. अमेरिका ने रूस को यकीन दिलाया कि रूटीन फायर की वजह से उनकी पनडुब्बी को नुकसान पहुंचा. बातचीत का लंबा दौर चला और फिर एक समझौते ने उस दिन पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध से बचा लिया. समझौता ये था कि अमेरिका, तुर्की और इटली से अपने परमाणु मिसाइल हटा लेगा. जबकि रूस क्यूबा से अपने परमाणु मिसाइल हटाएगा.
रूस और अमेरिका का ये टकराव तो तब खत्म हो गया. लेकिन क्यूबा को लेकर अमेरिकी जद्दोजहद जारी रही. रूजवेल्ट से लेकर डोनाल्ड ट्रंप तक 13 राष्ट्रपति आए और चले गए. पर क्यूबा पर कब्जा नहीं कर पाए. ना फिडेल कास्त्रो को मार पाए. 50 साल तक हुकूमत करने के बाद 2008 में फिडेल ने अपनी मर्जी से कुर्सी छोड़ दी. इसके बाद अगले दस साल तक उनके छोटे भाई राउल कास्त्रो राष्ट्रपति बने. राउस कास्त्रो के बाद 2018 से अब तक डियास कैनाल क्यूबा के राष्ट्रपति हैं. जो बाकी के 12 राष्ट्रपति नहीं कर पाए, वो अब ट्रंप करना चाहते हैं. क्यूबा पर कब्जा.
जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठा कर अमेरिका ले जाने के बाद वेनेजुएला पर एक तरह से अमेरिकी कंट्रोल है. क्यूबा अपना सारा ईंधन उसी वेनेजुएला से खरीदता रहा है. अब जबसे वेनेजुएला पर अमेरिकी कंट्रोल है, वेनेजुएला से क्यूबा में तेल सप्लाई बंद हो गई है. क्यूबा डीजल से ही बिजली बनाता है. इसीलिए बीते दो हफ्तों से बिना तेल और बिजली के क्यूबा में ब्लैकआउट है. पर पुराने दोस्त रूस ने एक बार फिर अपनी दोस्ती निभाई है. क्यूबा की गुजारिश पर रूस वो इकलौता देश है, जिसने जहाज में भर कर क्यूबा को तेल भेजा है.
(मनीषा झा के साथ सुप्रतिम बनर्जी की रिपोर्ट)