ईरान में मार गिराया गया अमेरिका का F-15E ईगल विमान और फिर वहां फंसे पायलट्स का रेस्क्यू ऑपरेशन चर्चा में है. यह मिशन किसी हॉलीवुड फिल्म की तरह था. बड़ी तादाद में अमेरिकी कमांडो अंधेरे की आड़ में चुपचाप ईरान के भीतर घुसे. 7 हजार फीट ऊंची पहाड़ी चढ़कर घायल अमेरिकी एयरमैन को बचाया.
वहीं, अमेरिका को वेपंस ऑफिसर को ईरान से बाहर निकालने के लिए 155 विमानों का इस्तेमाल किया गया. लेकिन सिर्फ दो एयरमैन को बचाने के लिए इतने बड़े ऑपरेशन और विमान को पहुंचे नुकसान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
अमेरिका ने यह ऑपरेशन इस्फहान से शुरू किया, जो उस जगह से काफी दूर था, जहां अमेरिका का एयरमैन फंसा हुआ था. इस वजह से एक्सपर्ट्स का मानना है कि शायद इसके पीछे मकसद कुछ और था.
ईरान का दावा है कि असली उद्देश्य इस्फहान के पास स्थित परमाणु ठिकानों से यूरेनियम को गुप्त रूप से कब्जे में लेना था. कई सैन्य विश्लेषकों ने भी इस दावे का कुछ हद तक समर्थन किया है.
एक्सपर्ट्स का एनालिसिस दो बातों पर आधारित है. पहला विशाल स्तर पर ऑपरेशन शुरू करना और दूसरा, जिस जगह पर अमेरिका का विमान गिराया गया था. वहां से ऑपरेशन की जगह की दूरी. अमेरिका ने इन दोनों पहलुओं पर ज्यादा स्पष्टता नहीं दी है, जिससे कई तरह की थ्योरी सामने आ रही हैं.
अमेरिकी रेस्क्यू मिशन पर उठते सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि F-15E लड़ाकू विमान आखिर मध्य ईरान में कर क्या रहा था. अमेरिका का कहना है कि यह एक नियमित मिशन पर था, लेकिन एक पूर्व सीआईए अधिकारी ने दावा किया कि यह जमीनी हमले की तैयारी कर रहा था.
सीआईए के पूर्व अधिकारी लैरी जॉनसन ने एक पॉडकास्ट में कहा कि ऐसा लग रहा है कि ईरान में गिरा F-15E वास्तव में नतांज परमाणु फैसिलिटी पर बड़े हमले की तैयारी कर रहा था.
एक अन्य एक्सपर्ट ने सवाल उठाया कि क्या F-15E किसी पहले से चल रहे स्पेशल फोर्स ऑपरेशन को कवर दे रहा था? हालांकि, तीन अप्रैल को ईरान ने इस विमान को मार गिराया. यह दो दशकों में पहली बार था जब किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन ने गिराया. इस घटना ने ट्रंप के उस दावे को भी चुनौती दी कि अमेरिका का ईरान के आसमान पर पूरा नियंत्रण है.
यहीं से अमेरिकी कहानी दिलचस्प हो जाती है. बताया गया कि गंभीर रूप से घायल होने और टखना मुड़ जाने के बावजूद उस एयरमैन ने जाग्रोस पर्वत में 7000 फीट ऊंची चढ़ाई की और छिप गया. हैरानी की बात यह है कि केवल एक हैंडगन के साथ उसने ईरानी सैनिकों से खुद को बचाए रखा.
कुछ विशेषज्ञों ने इतनी कठिन चढ़ाई पर शक जताया, लेकिन यह भी गौर करने लायक है कि अमेरिकी सैनिकों को ऐसी परिस्थितियों के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है.
एयरस्ट्रिप को लेकर थ्योरी
इस रेस्क्यू ऑपरेशन में 155 विमान शामिल थे. इसमें 4 बॉम्बर, 64 फाइटर जेट, 48 ईंधन टैंकर, 13 रेस्क्यू विमान थे. MQ-9 रीपर ड्रोन एयरमैन को सुरक्षा दे रहे थे, जबकि अमेरिकी बलों ने दक्षिणी इस्फहान प्रांत में एक हवाईपट्टी पर कब्जा कर लिया, जो वीरान थी.
यह भी सभी को मालूम है कि इस्फहान में ईरान का प्रमुख यूरेनियम भंडार मौजूद है. ऐसे में इस जगह अमेरिकी एयरमैन के छिपा होना संदेह को और बढ़ाता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि एयरस्ट्रिप पर कब्जा करना किसी साधारण रेस्क्यू मिशन से ज्यादा पहले से की गई योजना का संकेत देता है. इजरायली विशेषज्ञ सॉल साडका का कहना है कि दूसरे एयरमैन को रेस्क्यू करने की पूरी कहानी अजीब लगती है. उसे जिस अस्थायी अमेरिकी एयरबेस से निकाला गया, वह इस्फहान साइट से सिर्फ 20 मील दूर था, जहां ईरान का यूरेनियम रखा है.
अमेरिका ने अपने ही विमान क्यों नष्ट किए?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कल रात प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जानकारी दी कि रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान दो MC-130 विमान, जो लगभग 100 अमेरिकी विशेष बलों को लेकर आए थे. वे रेतीली जमीन में फंस गए थे. कमांडो को बाद में अन्य विमानों से निकाला गया, लेकिन इससे पहले उन्हें दुश्मन क्षेत्र में कई घंटे बिताने पड़े.
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, निकलने से पहले इन विमानों को नष्ट कर दिया गया ताकि वे दुश्मन के हाथ न लगें, जो युद्ध क्षेत्रों में आम प्रक्रिया है. हालांकि, रिटायर्ड स्पेशल ऑपरेशंस अधिकारी एंथनी एगुइलर ने इस दावे पर संदेह जताया. उनका कहना है कि MC-130 जैसे विमान कठिन से कठिन जमीन पर उतरने में सक्षम होते हैं.
कुछ विशेषज्ञों ने यह भी सवाल उठाया कि इतने बड़े और जोखिम भरे ऑपरेशन के बावजूद कोई अमेरिकी हताहत नहीं हुआ. दूसरी ओर, ईरान का दावा है कि उसने दो MC-130 और दो ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर नष्ट कर दिए और इस पूरे भ्रम फैलाने वाले मिशन को नाकाम कर दिया. हालांकि, व्हाइट हाउस ने इन दावों को खारिज किया है.