पश्चिम एशिया का युद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां दुनिया की नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं. अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन के मुताबिक, अमेरिकी सेना ईरान के भीतर हफ्तों तक चलने वाले 'जमीनी सैन्य अभियानों' की रूपरेखा तैयार कर चुकी है.
यह केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसमें ईरानी जमीन पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी और सीधी छापेमारी शामिल हो सकती है. पेंटागन ने ऐसे सैन्य विकल्पों पर काम शुरू कर दिया है. यह कोई पूर्ण पैमाने का युद्ध नहीं होगा, बल्कि विशेष बलों और तेज कार्रवाई करने वाली सेना के जरिए अहम ठिकानों पर हमला कर तुरंत वापस लौटने की रणनीति पर विचार हो रहा है.
सूत्रों के मुताबिक, यह अभियान “महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ्तों” का हो सकता है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है. अमेरिका पहले ही हजारों सैनिकों और मरीन कमांडो को मध्य पूर्व में तैनात कर चुका है, जिससे जरूरत पड़ने पर तुरंत ऑपरेशन शुरू किया जा सके.
पूरा हमला नहीं, टारगेटेड स्ट्राइक की रणनीति
अमेरिकी योजना का मुख्य उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना है. इसके तहत मिसाइल लॉन्च सिस्टम, एयर डिफेंस सिस्टम और समुद्री ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट्स के लिए खतरा माने जाते हैं.
सबसे अहम टारगेट माना जा रहा है खार्ग आइसलैंड, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल निर्यात केंद्र है. अगर इस द्वीप पर कब्जा कर लिया जाता है या इसे ब्लॉकेड कर दिया जाता है, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है और इससे बातचीत में अमेरिका को बढ़त मिल सकती है.
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इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास ईरानी सैन्य ठिकानों पर रेड की योजना भी शामिल है, ताकि जहाजों को निशाना बनाने की ईरान की क्षमता को कम किया जा सके. अमेरिका जिन विकल्पों पर विचार कर रहा है, उनमें चार बड़े सैन्य ऑपरेशन शामिल बताए जा रहे हैं:
1- खार्ग द्वीप पर कब्जा: ईरान की आर्थिक कमर तोड़ना.
2- होर्मुज जलमार्ग का नियंत्रण: लारक द्वीप पर हमला कर समुद्री रास्ते को सुरक्षित करना.
3- परमाणु ठिकानों पर छापेमारी: अबू मौसा और आसपास के द्वीपों पर कब्जा करना. ईरान के संवर्धित यूरेनियम को जब्त करने के लिए जमीनी दस्ता भेजना.
4- समुद्री इंटरसेप्शन: ईरानी तेल ले जा रहे जहाजों को बीच समुद्र में रोकना.
कुछ और आक्रामक योजनाओं में ईरान के अंदर जाकर परमाणु ठिकानों से उच्च संवर्धित यूरेनियम को कब्जे में लेने जैसे विकल्प भी शामिल हैं, हालांकि इसके साथ बड़े पैमाने पर हवाई हमले भी एक विकल्प बने रहेंगे.
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट ने कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो स्थिति और बढ़ सकती है और अमेरिका कड़ा कदम उठा सकता है.
जमीनी अभियान में बड़ा जोखिम
विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी अभियान आसान नहीं होगा. ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) मजबूत स्थिति में है और ड्रोन, मिसाइल और समुद्री हमलों के जरिए जवाब दे सकता है. खासकर खार्ग आइलैंड जैसे रणनीतिक ठिकानों पर कब्जा करना जितना मुश्किल नहीं होगा, उससे ज्यादा मुश्किल वहां लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना होगा. इसलिए अमेरिकी सेना तेज, छोटे और सटीक ऑपरेशन की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि लंबे युद्ध से बचा जा सके.
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मध्य पूर्व में बढ़ रही अमेरिकी सैन्य मौजूदगी
अमेरिका ने तेजी से अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ाई है. तैयारियां केवल कागजों पर नहीं हैं. अमेरिकी मरीन और 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों कमांडो पहले ही मध्य पूर्व में अपनी पोजीशन ले चुके हैं. 'USS त्रिपोली' जैसे घातक युद्धपोत अत्याधुनिक F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स के साथ समुद्र में तैनात हैं. ये सेनाएं वॉशिंगटन को यह ताकत देती हैं कि वह जरूरत पड़ने पर युद्ध की तीव्रता को तुरंत बढ़ा या घटा सके.
बढ़ता तनाव, अनिश्चित भविष्य
हालांकि एक तरफ सैन्य तैयारी तेज हो रही है, दूसरी तरफ कूटनीतिक स्तर पर भी कोशिशें जारी हैं. लेकिन ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर उसके क्षेत्र पर हमला हुआ तो वह बिना सीमा के जवाब देगा. ऐसे में अगर जमीनी ऑपरेशन शुरू होता है, तो यह संघर्ष को सीमित रखने के बजाय पूरे क्षेत्र में बड़े युद्ध में बदल सकता है.
फिलहाल अमेरिकी योजनाएं कागज पर हैं, लेकिन जिस तरह से सैन्य तैनाती और रणनीतिक विकल्प तैयार किए जा रहे हैं, उससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले कुछ हफ्ते इस युद्ध की दिशा तय कर सकते हैं.