अमेरिका और ईरान के प्रस्तावित शांति समझौते की कीमत 300 अरब डॉलर आंकी जा रही है. इस समझौते के ड्राफ्ट फ्रेमवर्क के मुताबिक, ईरान की मांग है कि लंबे समय से चल रही इस जंग को खत्म करने के बदले उसे रिकंस्ट्रक्शन के लिए आर्थिक गारंटी पैकेज दिया जाए. ना सिर्फ पैकेज बल्कि प्रतिबंधों में राहत और फ्रीज की गई संपत्तियों को अनफ्रीज किया जाए.
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी से शुरू इस जंग ने वैश्विक तेल बाजारों को प्रभावित किया है. ऐसे में यह समझौता एक संभावित राजनीतिक और आर्थिक समाधान के रूप में सामने आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है. उन्होंने इसे एक बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है, जो ऊर्जा बाजारों को स्थिर कर सकता है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से सामान्य व्यापार के लिए खोल सकती है. हालांकि, इस समझौते के ब्योरे ने अमेरिका के लिए कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं.
अमेरिका इस पूरे पैकेज को निवेश और रिकंस्ट्रक्शन की योजना के रूप में पेश कर रहा है, जबकि ईरान इसे सीधे तौर पर युद्ध से हुए नुकसान के बदले मुआवजे के रूप में देखता और पेश करता है. इस बीच इस 300 अरब डॉलर के फंड पर ट्रंप ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ईरान तैयार हो गया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं रखेगा. इसके साथ ही अमेरिक 30 करोड़ डॉलर का भुगतान करनेगा ये फेक न्यूज है, जिसे डेमोक्रेट्स ने फैलाया है.
दोनों पक्षों द्वारा इस समझौते को अलग-अलग तरीके से पेश करना यह दिखाता है कि बातचीत केवल शांति तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें राजनीतिक संदेश और आर्थिक हित भी गहराई से जुड़े हुए हैं. इस शुरुआती प्रारंभिक मसौदा दस्तावेज पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में साइन किए जाने हैं.
ईरान की न्यूज एजेंसी मेहर के मुताबिक, ईरान की वार्ता टीम ने एक महत्वपूर्ण शर्त रखी है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश कम से कम 300 अरब डॉलर का एक व्यापक रिकंस्ट्रक्शन प्लान पेश करें. इसके अलावा ईरान ने यह भी मांग की है कि 60 दिनों की बातचीत अवधि के दौरान उसकी लगभग 24 अरब डॉलर की फ्रीज की गई संपत्तियों को रिलीज किया जाए, जिसमें से आधी राशि तुरंत उपलब्ध कराई जाए. साथ ही ईरान ने तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और अपने वित्तीय संसाधनों तक पूर्ण पहुंच की भी मांग की है.
ईरानी मीडिया इस पूरे पैकेज को युद्ध से हुए नुकसान के मुआवजे के रूप में पेश कर रहा है. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अगर आर्थिक राहत और ठोस गारंटी नहीं दी जाती, तो कोई भी शांति समझौता टिकाऊ नहीं होगा और वह जल्द ही टूट सकता है. दूसरी ओर, पश्चिमी मीडिया खासकर न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट्स में इस 300 अरब डॉलर को अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड या पुनर्निर्माण कार्यक्रम के रूप में बताया गया है, जिसे अमेरिका निजी क्षेत्र की भागीदारी से आगे बढ़ा सकता है.
यह अंतर यह दिखाता है कि दोनों पक्ष एक ही आर्थिक पैकेज को अलग-अलग नजरिए से पेश कर रहे हैं. ईरान इसे अपने नुकसान की भरपाई मानता है, जबकि अमेरिका इसे भविष्य के विकास और स्थिरता के लिए निवेश के रूप में दिखाता है. इसी कारण यह समझौता केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी बन गया है।
अमेरिकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह समझौता राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया जा सकता है, जिसमें युद्ध में कमी, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और तेल की कीमतों में संभावित गिरावट शामिल है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इसे सकारात्मक रूप में पेश करते हुए तेल को स्वतंत्र रूप से फ्लो करते रहने की बात कही है.
लेकिन इस पूरे मामले की तस्वीर उतनी सरल नहीं है. भले ही अमेरिका इसे मुआवजा शब्द से बचकर निवेश कहे, फिर भी युद्ध के बाद इतने बड़े आर्थिक पैकेज की बात यह संकेत देती है कि अमेरिका को परिस्थितियों के अनुसार अपने रुख में लचीलापन दिखाना पड़ रहा है. ईरान, भले ही सैन्य और आर्थिक दबाव में रहा हो लेकिन उसने बातचीत में अपनी मजबूत स्थिति का उपयोग करके प्रतिबंधों में राहत और रिकंस्ट्रक्शन सहायता जैसी बड़ी मांगें रख दी हैं.
हालांकि, इस समझौते को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है. लंदन स्थित मीडिया नेटवर्क ईरान इंटरनेशनल के अनुसार, इस ड्राफ्ट फ्रेमवर्क की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी अधिकारियों ने कई अहम विवरणों विशेष रूप से 300 अरब डॉलर के आंकड़े को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है. पहले भी कुछ रिपोर्टों को अमेरिका ने भ्रामक या बढ़ा-चढ़ाकर बताया है.
ईरान के भीतर भी इस समझौते को लेकर मतभेद हैं, जहां कुछ कट्टरपंथी तत्व इसे समझौते में ढील मानते हैं. वहीं, इजरायल ने भी इस क्षेत्रीय व्यवस्था पर आपत्ति जताई है. कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि लेबनान जैसे क्षेत्र इस समझौते की पहली परीक्षा बन सकते हैं, जहां प्रॉक्सी संघर्ष फिर से तनाव पैदा कर सकते हैं.
कुल मिलाकर, यह समझौता अभी केवल एक प्रारंभिक फ्रेमवर्क है, कोई अंतिम शांति संधि नहीं है. जब तक 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज और अन्य शर्तों की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था तय नहीं होती, तब तक इस समझौते की स्थिरता पर सवाल बने रहेंगे. मध्य पूर्व के इतिहास को देखते हुए यह भी संभव है कि अगर राजनीतिक दबाव या प्रॉक्सी संघर्ष बढ़े, तो यह पूरा ढांचा कमजोर पड़ सकता है और तनाव फिर से लौट सकता है.