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इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता क्यों हुई फेल? जानिए 5 बड़ी वजहें

अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली हाई-लेवल बातचीत से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन नतीजा शून्य रहा. सख्त शर्तें, ट्रंप की धमकियां, इजरायल-लेबनान संघर्ष, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज विवाद और गहरे अविश्वास ने इस बातचीत को पटरी से उतार दिया.

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यूएस-ईरान के बीच इस्लामाबाद में वार्ता हुई थी. (Photo: @PakPMO/X via PTI)
यूएस-ईरान के बीच इस्लामाबाद में वार्ता हुई थी. (Photo: @PakPMO/X via PTI)

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बहुप्रतीक्षित उच्च-स्तरीय वार्ता आखिरकार किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी. करीब 21 घंटे तक चली इस गहन बातचीत का उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी सीजफायर को स्थायी शांति में बदलना था, लेकिन जमीनी सच्चाई और कूटनीतिक जटिलताओं ने इस प्रयास को विफल कर दिया.

दुनिया में शांति के लिहाज से ये बातचीत बेहद अहम मानी जा रही थी. 1979 की इस्लामी क्रांति और तेहरान में अमेरिकी दूतावास संकट के बाद ये दोनों देशों के बीच सबसे उच्च-स्तरीय बातचीत थी. पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई और इस बैठक को संभव बनाया, लेकिन क्षेत्रीय समीकरणों के बीच सहमति बन पाना आसान नहीं था.

दरअसल, 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इज़रायल बनाम ईरान टकराव ने पहले ही वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर दिया था. पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया था. ऐसे में यह वार्ता केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता से भी जुड़ी हुई थी. आइए जानते हैं कि आखिर किन वजहों ने इसे असफल बना दिया.

1. अमेरिका और ईरान का अडिग रुख

इस्लामाबाद में बातचीत की मेज पर सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों का अडिग रुख रहा. अमेरिका ने साफ तौर पर मांग रखी कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तत्काल रोके. इसके साथ ही भविष्य में परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी दे. इसके जवाब में ईरान ने अपनी पुरानी बात दोहराई कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है.

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ईरान किसी भी तरह की पाबंदी या बाहरी दबाव को अस्वीकार कर दिया. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बातचीत के बाद कहा कि हम उस स्थिति तक ही नहीं पहुंच पाए, जहां ईरान हमारी शर्तों पर विचार करता. दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों को बहुत अनुचित बताया. ईरान खुद को रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में देख रहा था. 

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की 'वेट एंड वॉच' रणनीति ने उसे बातचीत में झुकने से रोके रखा, जबकि अमेरिका तत्काल परिणाम चाहता था. यही असंतुलन बातचीत की पहली बड़ी विफलता साबित हुआ.

2. शांति वार्ता पर भारी तनावपूर्ण माहौल

किसी भी शांति वार्ता के लिए अनुकूल माहौल और न्यूनतम भरोसा जरूरी होता है, लेकिन इस्लामाबाद में दोनों ही नदारद थे. डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत से ठीक पहले और उसके दौरान भी लगातार आक्रामक बयान दिए. उन्होंने यहां तक चेतावनी दी कि यदि समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से हमले शुरू करेगा. इस बार ईरान पर भीषण वार होगा.

इस तरह के बयान ईरान के लिए स्पष्ट संकेत थे कि बातचीत दबाव की रणनीति के तहत हो रही है. सीजफायर भी कड़े सैन्य दबाव के बाद लागू हुआ था, जिससे भरोसे की बजाय संदेह बढ़ गया. ईरान पूरी प्रक्रिया को रणनीतिक रूप में देख रहा था, जबकि अमेरिका कूटनीतिक अवसर पेश कर रहा था. इस विरोधाभास ने बातचीत को कमजोर कर दिया.

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3. लेबनान पर हमलों ने बिगाड़ा समीकरण

इस्लामाबाद में जब बातचीत जारी थी, उसी दौरान इजरायल ने लेबनान में अपने सैन्य अभियान जारी रखे. यह क्षेत्र हिज्बुल्लाह के प्रभाव में है, जिसे ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है. ईरान की स्पष्ट मांग थी कि किसी भी शांति वार्ता से पहले लेबनान में हमले रोके जाएं. लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया कि अमेरिका-ईरान सीजफायर उस पर लागू नहीं होता.

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के इस कड़े रुख ने वार्ता के माहौल को जटिल बना दिया. पाकिस्तान की ओर से भी बयानबाजी हुई, जिससे कूटनीतिक तनाव बढ़ा. नतीजतन, एक तरफ ईरान तनाव कम करने की बात कर रहा था, तो दूसरी तरफ जमीनी हालात बिल्कुल उलट थे. इस विरोधाभास ने समझौते की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया.

4. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर गतिरोध बना निर्णायक

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरी बातचीत का सबसे संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दा बनकर उभरा. यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है. 28 फरवरी के बाद से इसमें रुकावटें देखी जा रही थीं. अमेरिका चाहता था कि इसे तुरंत खोला जाए ताकि तेल आपूर्ति सामान्य हो सके. वहीं ईरान अपने दबाव के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा था.

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ईरान की मांग थी कि पहले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाए और सुरक्षा की गारंटी मिले. इसके बिना वह होर्मुज स्ट्रेट खोलने को तैयार नहीं था. दूसरी ओर, ट्रंप ने इस मुद्दे पर कोई समझौता न करने की बात कहते हुए कड़ा रुख अपनाया. यहां तक कि उन्होंने इस जलमार्ग पर नियंत्रण और टोल वसूली जैसे प्रस्ताव भी दिए, जिन्हें ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया.

5. भरोसे की कमी ने पूरी प्रक्रिया को किया खत्म

आखिरकार, इस पूरी वार्ता की सबसे बड़ी कमजोरी आपसी अविश्वास रही. दशकों से चले आ रहे टकराव ने दोनों देशों के बीच भरोसे की गुंजाइश लगभग खत्म कर दी है. ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाघर ग़ालिबाफ ने पहले ही साफ कर दिया था कि हमारे पास सद्भावना है, लेकिन भरोसा नहीं. यह बयान पूरी वार्ता की मानसिकता को दर्शाता है.

अमेरिका ने अपने प्रस्ताव को सर्वश्रेष्ठ बताया, जबकि ईरान ने उसे एकतरफा करार दिया. पहले के अनुभव, खासकर बातचीत के बाद हुए सैन्य हमले, ईरान के संदेह को गहरा कर चुके थे. ईरान के लिए हर प्रस्ताव एक जाल जैसा लग रहा था, जबकि अमेरिका त्वरित नतीजे चाहता था. इस बुनियादी असहमति ने समझौते की संभावना को खत्म कर दिया.

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इस्लामाबाद वार्ता की विफलता ने न केवल मौजूदा सीजफायर को और कमजोर बना दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का खतरा भी बढ़ा दिया है. पाकिस्तान ने मध्यस्थता की अपनी कोशिशें जारी रखने की बात कही है, लेकिन जब तक मूल मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तब तक किसी ठोस समाधान की उम्मीद करना मुश्किल ही नजर आता है.

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