यूएस-इजरायल और ईरान के बीच हफ्ते भर से चल रही जंग अब सिर्फ इन तीन देशों के बीच नहीं रहेगी. ये जंगी आग अब काफी भड़क चुकी है, और इसकी लपटों ने पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी जद में लेना शुरू कर दिया है. कायदे से देखें तो इन सात दिनों में अब तक लगभग 15 देश सीधे-सीधे इस जंग से प्रभावित हुए हैं. गुरुवार को इस लिस्ट में नया नाम अजरबैजान का जुड़ा. इससे पहले तुर्की ने भी ईरान पर हमले का आरोप लगाया था.
यानी ईरान की जंग में तुर्की और अजरबैजान भी चपेटे में आ गए हैं और इसका असर दूर बैठे एशियाई देश पाकिस्तान पर पड़ा है. भारत के नजरिए से देखें तो जंग ने तु्र्की-अजरबैजान और पाकिस्तान इन तीनों की खुराफाती तिकड़ी को हैरान-परेशान कर दिया है. मगर कैसे?
असल में बीते कुछ वर्षों में इन तीनों देशों ने खुद को एक तरह की रणनीतिक साझेदारी के रूप में पेश किया. रक्षा सहयोग, साझा सैन्य अभ्यास और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थ, इससे ये तिकड़ी काफी चर्चा में रही, लेकिन मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्षों और जियो पॉलिटिकल टेंशन ने अब इस गठजोड़ की जो अपनी लिमिट थी, उसे भी उभार दिया.
थ्री ब्रदर्स मिलिट्री अभ्यास
तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान के बीच सहयोग का प्रतीक बना था 'थ्री ब्रदर्स मिलिट्री अभ्यास' 2021 में अज़रबैजान की राजधानी बाकू में हुए इस अभ्यास को इन तीनों देशों ने एक मजबूत रक्षा साझेदारी के रूप में पेश किया था. तीनों देशों के बीच रक्षा उद्योग, सैन्य प्रशिक्षण और कूटनीतिक समर्थन बढ़ा. पाकिस्तान को कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की का समर्थन हासिल हुआ और जबकि तुर्की और पाकिस्तान ने कॉकस एरिया में अजरबैजान का खुलकर साथ दिया.
इस सहयोग की झलक 2020 में ही दिख गई थी. जब नागोर्नो काराबाख संघर्ष में तुर्की ने अज़रबैजान को मिलिट्री हेल्प भेजी थी. उस दौरान पाकिस्तान ने भी कूटनीतिक स्तर पर बाकू का समर्थन किया थी.

भारत के लिए क्यों चुनौती बन रही थी तिकड़ी
दरअसल पिछले कुछ वर्षों में यह तिकड़ी भारत के लिए भी कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती बनती जा रही थी. पाकिस्तान तो बनने के साथ ही भारत से दुश्मनी करता रहा है, लेकिन तुर्की और अजरबैजान ने भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया. कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने कई बार पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिया है.
इसके अलावा इन तीनों देशों के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग और संयुक्त अभ्यास भी भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाने वाला था. यही वजह है कि नई जियो पॉलिटिकल सिचुएशन में इस तिकड़ी पर पड़ रहा दबाव भारत की कूटनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
तुर्की लंबे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया की राजनीति में एक इफेक्ट पॉवर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. राष्ट्रपति एर्दोगन की विदेश नीति में यह महत्वाकांक्षा साफ दिखाई देती है, लेकिन तुर्की की समस्या यह है कि वह एक तरफ पश्चिमी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा भी है. वह NATO का मेंबर है और यूरोप तथा अमेरिका के साथ उसके आर्थिक और सैन्य संबंध गहरे हैं.
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव जैसे इजरायल-हमास वॉर और ईरान-इज़रायल के बीच बढ़ते टकराव ने तुर्की की कूटनीति को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है. उसे एक साथ कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ रहा है.

अजरबैजान के लिए ऊर्जा और सुरक्षा का सवाल
कॉकस एरिया में अजरबैजान की ताकत पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है. लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है. यूरोप तक तेल और गैस पहुंचाने वाले बड़े प्रोजेक्ट—जैसे बाकू त्बिलिसी सेहान पाइपलाइन और साउदर्न गैस कॉरिडोर उसके लिए बेहद जरूरी हैं. अगर मिडिल ईस्ट की ये जंग आगे और बढ़ती है तो ऊर्जा बाजार, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण पर असर पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में अझरबैजान के लिए अपनी रणनीति को बैलेंस रखना चुनौती बन रही है. इसके अलावा अज़रबैजान को अपने पड़ोसी ईरान और रूस से भी सावधान-संबंध यानी कि चौकन्ना और दोस्ताना संबंध बनाए रखने पड़ते हैं. लेकिन गुरुवार से यह स्थिति बिगड़ने लगी है. ईरान की ओर से अजरबैजान पर ड्रोन अटैक की बात सामने आई है.
पाकिस्तान के लिए भी क्यों है संकट
इस तिकड़ी का तीसरा सदस्य पाकिस्तान है. पाकिस्तान लंबे समय से खुद को इस्लामी दुनिया की राजनीति में एक्टिव दिखाने की कोशिश करता रहा है. प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती देश की अर्थव्यवस्था है. पाकिस्तान को खाड़ी देशों से आर्थिक मदद, निवेश और ऊर्जा सहयोग की जरूरत है. ऐसे में वह किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में खुलकर पक्ष लेने की स्थिति में नहीं है. अगर मध्य पूर्व का संकट बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना और मुश्किल हो सकता है.
तुर्की-अज़रबैजान-पाकिस्तान की यह साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में एक उभरती रणनीतिक धुरी के रूप में देखी गई थी. लेकिन मिडिल ईस्ट की अस्थिरता ने यह दिखा दिया है कि क्षेत्रीय गठबंधन कितने नाजुक होते हैं. ऊर्जा मार्ग, कूटनीतिक संतुलन, आर्थिक हित और सुरक्षा चिंताएं—इन सबके बीच अब इस तिकड़ी को पहले से ज्यादा सावधानी से कदम उठाने पड़ रहे हैं.

दरअसल मिडिल ईस्ट का संकट सिर्फ स्थानीय संघर्ष नहीं है. इसका असर कॉकस, दक्षिण एशिया और यूरोप तक महसूस किया जा रहा है. इसी वजह से तुर्की, अज़रबैजान और पाकिस्तान की यह रणनीतिक ‘तिकड़ी’ भी अब उस जियो-पॉलिटिकल प्रेशर के घेरे में आ गई है, जिसने पूरे क्षेत्र की पॉलिटक्स को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू कर दिया है.
कुल मिलाकर बात ये है कि अजरबैजान और तुर्की ने ईरान पर हमले के आरोप लगाए हैं, लेकिन ईरान ने इन हमलों से इनकार किया है और जिम्मेदारी नहीं ली है. इस वजह से पड़ोसियों के बीच तो टेंशन पनप ही रही है, दूर बैठे पाकिस्तान के भी हाथ-पांव फूलने की नौबत है. क्योंकि अगर ये टेंशन बढ़ी कौन किसके कितने साथ होगा ये बड़ी समस्या होगी? यही वजह है कि एक जंग तो अपनी जगह चल ही रही है, लेकिन इस जंग ने 'खुराफाती तिकड़ी' को अलग परेशानी में डाल दिया है.