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कहानी मेरी जुबानी: लेबनान में ड्रोन हमलों के खतरे के बीच हिज्बुल्लाह कमांडर का हाई-रिस्क इंटरव्यू

मिडिल ईस्ट में भीषण युद्ध जारी है. यह संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है. हमलों में अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है. युद्ध के कारण यहां मौजूद पत्रकार भी कई बार हमलों की चपेट में आ रहे हैं.

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लेबनान में पत्रकार भी कई बार हमलों की चपेट में आ रहे हैं. (Photo: ITG)
लेबनान में पत्रकार भी कई बार हमलों की चपेट में आ रहे हैं. (Photo: ITG)

दक्षिणी लेबनान के युद्धग्रस्त इलाकों में, जहां एक पत्रकार और निशाने के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है, एक इंटरव्यू करना केवल पेशेवर चुनौती नहीं बल्कि जानलेवा जोखिम बन जाता है. ऐसे हालात में हिज़्बुल्लाह के एक कमांडर तक पहुंचना और उनसे बातचीत करना बेहद कठिन और खतरनाक काम है.

मार्च की शुरुआत से जारी संघर्ष में स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इजरायली सेना लगातार हिज़्बुल्लाह से जुड़े लोगों को निशाना बना रही है, और कई बार पत्रकार भी हमलों की चपेट में आ चुके हैं. ऐसे माहौल में किसी स्रोत से मिलना ऐसा है जैसे आप खुद को संभावित हमले के दायरे में खड़ा कर रहे हों.

संघर्ष क्षेत्रों में काम करने वाले अनुभवी पत्रकारों के लिए भी यह स्थिति असाधारण है. अशरफ वानी जैसे पत्रकार, जिन्होंने पहले पाकिस्तान में हाफिज सईद और सईद सलाहुद्दीन जैसे बड़े उग्रवादी नेताओं के इंटरव्यू किए हैं, उनके लिए भी दक्षिणी लेबनान का यह मिशन अलग और ज्यादा जोखिम भरा था.

इस बार कोई फोन कॉल, सोशल मीडिया या डिजिटल संपर्क का इस्तेमाल नहीं किया गया. पूरी प्रक्रिया एक स्थानीय “ओवर ग्राउंड वर्कर” के जरिए संचालित हुई, जो पत्रकार और कमांडर के बीच एकमात्र कड़ी था.कई दिनों के इंतजार के बाद संदेश मिला, तैयार रहें, निर्देशों का सख्ती से पालन करें.

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पत्रकार और उनके ड्राइवर को एक मोटरसाइकिल का पीछा करने के लिए कहा गया. रास्ता सीधा नहीं था, बल्कि घुमावदार और सावधानीपूर्वक चुना गया, ताकि किसी भी संभावित निगरानी से बचा जा सके.

अंततः, होटल के पास एक स्थान पर मुलाकात हुई. एक कार आकर रुकी, जिसमें “हसन” नाम से पहचाने जाने वाले हिज़्बुल्लाह कमांडर मौजूद थे. बातचीत शुरू करने से पहले उन्होंने पत्रकार की पहचान और उनके मीडिया नेटवर्क की जानकारी अपने फोन पर जांची. भरोसा यहां तुरंत नहीं मिलता, उसे साबित करना पड़ता है.

इंटरव्यू का स्थान एक खुला मैदान था. पूरी तरह असुरक्षित और खुला. कोई सुरक्षा नहीं, कोई बचाव नहीं. बस कैमरा, कमांडर और आसमान की ओर टिकी नजरें, जहां किसी भी समय ड्रोन हमला हो सकता था.

भाषा भी एक चुनौती थी. पत्रकार अरबी नहीं जानते थे, इसलिए एक स्थानीय अनुवादक की मदद ली गई. इसके बावजूद बातचीत जारी रही, हर सवाल और जवाब के बीच एक अनकहा दबाव मौजूद था.

ऐसे मिशन को खतरनाक बनाता है इसकी अनिश्चितता. यहां कोई सुरक्षा की गारंटी नहीं होती, न ही किसी पक्ष से संरक्षण का भरोसा. एक छोटी सी गलती, समय, स्थान या हरकत जानलेवा साबित हो सकती है.

आखिरकार इंटरव्यू पूरा हुआ. लेकिन यह अनुभव एक सच्चाई को उजागर करता है. आज के संघर्ष क्षेत्रों में पत्रकारिता सिर्फ खबरें जुटाने का काम नहीं है, बल्कि यह हर पल अपनी जान जोखिम में डालकर सच सामने लाने की कोशिश है.

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गौरतलब है कि शनिवार को दक्षिणी लेबनान में हुए एक इजरायली एयरस्ट्राइक में तीन पत्रकारों की मौत हो गई. ये पत्रकार हिज़्बुल्लाह और इजरायल के बीच जारी संघर्ष की रिपोर्टिंग कर रहे थे. इजरायली सेना के अनुसार, वरिष्ठ संवाददाता अली शोएब की इस हमले में मौत हो गई. हमलों में एक रिपोर्टर फातिमा फतूनी के मारे जाने की भी पुष्टि हुई है. 

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