ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बीच पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है. ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और मध्य पूर्व के देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं. इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव है और क्या अमेरिका इस्लामी शासन को हटाने में सफल हो पाएगा?
इस मुद्दे पर पूर्व भारतीय राजनयिक अचल मल्होत्रा ने कहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन न तो आसान है और न ही यह अमेरिका के बस की बात है. अचल मल्होत्रा के मुताबिक, अगर हम कुछ देर के लिए यह मान भी लें कि ईरान में मौजूदा धर्म आधारित शासन व्यवस्था खत्म हो जाती है, तब भी ऐसा कोई विश्वसनीय विकल्प नहीं दिखता जो उस राजनीतिक वैक्यूम को भर सके. उन्होंने कहा कि चर्चा बार-बार रजा पहलवी के नाम पर आकर टिक जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि खुद अमेरिका के भीतर भी इस बात पर एकराय नहीं है कि उन्हें ईरान की सत्ता सौंपी जाए.
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उन्होंने यह भी माना कि ईरान में मौजूदा शासन को लेकर जनता में नाराजगी है. आर्थिक संकट, शासन की सख्ती और नीतियों के खिलाफ ईरानी नागरिक सड़कों पर उतरे हैं. बावजूद इसके, ईरानी समाज कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि कोई बाहरी ताकत आकर उनके देश की सत्ता तय करे. खासतौर पर अमेरिका द्वारा यह तय करना कि ईरान कैसे चलेगा, ईरानियों को मंजूर नहीं होगा. अचल मल्होत्रा ने बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अमेरिका ने मोहम्मद यूनुस को पैराशूट करके सत्ता में बिठाया, जो करीब 18 महीने सरकार चलाने के बाद सत्यानाश करके चले गए.
पूर्व राजनयिक अचल मल्होत्रा के मुताबिक, ईरान बांग्लादेश नहीं है और वहां ऐसा प्रयोग दोहराया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि अगर इजरायल, अमेरिका और उनके सहयोगी ईरान में जमीनी सैन्य कार्रवाई कर इस्लामी शासन के पूरे ढांचे को नष्ट कर दें, तभी सत्ता परिवर्तन संभव हो सकता है. लेकिन उन्हें नहीं लगता कि पश्चिमी देश ईरान जैसे बड़े और जटिल देश में ग्राउंड ऑपरेशन का जोखिम उठाएंगे. अचल मल्होत्रा के अनुसार, चाहे हालात कितने भी तनावपूर्ण क्यों न हों, ईरान में सत्ता का भविष्य अंततः आंतरिक राजनीतिक प्रक्रियाओं और जनता की इच्छा से ही तय होगा, न कि बाहरी सैन्य दबाव से.