नेपाल की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक विवाद गहराता दिखाई दे रहा है. राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने प्रधानमंत्री बालेन शाह नेतृत्व वाली प्रचण्ड बहुमत की दो-तिहाई सरकार द्वारा भेजे गए संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश को मंजूरी देने से इनकार करते हुए पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस लौटा दिया है.
राष्ट्रपति कार्यालय शीतल निवास की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, अध्यादेश में संवैधानिक परिषद की बैठक, गणपूरक संख्या (कोरम) और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों पर राष्ट्रपति ने गंभीर असहमति जताई है. राष्ट्रपति का कहना है कि संविधान में बहुमत आधारित निर्णय प्रणाली को किसी अध्यादेश या कानून के माध्यम से कमजोर नहीं किया जा सकता.
सरकार ने दावा किया था कि संवैधानिक निकायों में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, प्रभावकारी और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से यह अध्यादेश लाया गया है. अध्यादेश में 6 सदस्यीय संवैधानिक परिषद में सिर्फ सीमित सदस्यों की उपस्थिति में भी निर्णय लेने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी. हालांकि राष्ट्रपति ने इसे संवैधानिक भावना के विपरीत माना.
यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रपति और सरकार के बीच इस विषय पर टकराव हुआ हो. इससे पहले भी संवैधानिक परिषद संबंधी विधेयक राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटाया जा चुका था. उस समय भी राष्ट्रपति ने केवल प्रधानमंत्री और एक अन्य सदस्य की उपस्थिति में निर्णय लेने की व्यवस्था और संसदीय सुनवाई को कमजोर करने वाले प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज कराई थी.
विपक्ष ने लगाए आरोप
वर्तमान अध्यादेश में सरकार ने कुछ संशोधन करते हुए अध्यक्ष सहित कम से कम चार सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य करने का प्रावधान जोड़ा था. साथ ही 3-3 मत विभाजन की स्थिति में प्रधानमंत्री के मत को निर्णायक मानने की व्यवस्था भी शामिल की गई थी. बावजूद इसके राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी नहीं दी.
इस घटनाक्रम ने सरकार की कार्यशैली पर भी व्यापक राजनीतिक बहस छेड़ दी है. विपक्षी दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों का आरोप है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार संसद को दरकिनार कर अध्यादेश के जरिए शासन चलाने की कोशिश कर रही है.
विशेष रूप से आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि सरकार ने संसद का अधिवेशन बुलाने के मात्र 24 घंटे के भीतर उसे स्थगित कर दिया और उसके बाद लगातार आठ अध्यादेश जारी किए. विपक्ष इसे संसदीय प्रक्रिया और लोकतांत्रिक परंपराओं पर सीधा प्रहार बता रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश लौटाया जाना सरकार के लिए बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक झटका माना जा रहा है. अब सरकार के सामने या तो अध्यादेश में संशोधन कर दोबारा भेजने या फिर संसद के माध्यम से नया विधेयक लाने का विकल्प रहेगा.
प्रधानमंत्री बालेन के द्वारा यह अध्यादेश संसद अधिवेशन को स्थगित कर लाए जाने से विपक्षी दल अपनी आपत्ति जता रहे हैं. नेपाल के राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने सरकार की सिफारिश पर नेपाल की संघीय संसद के दोनों सदनों का अधिवेशन 30 अप्रैल 2026 के लिए बुलाया था.
राष्ट्रपति पौडेल ने 22 अप्रैल को हुए मंत्रिपरिषद की सिफारिश के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 93(1) के तहत 30 अप्रैल 2026 को दोपहर 2 बजे संसद अधिवेशन बुलाया था, लेकिन 24 अप्रैल को बालेन की कैबिनेट ने राष्ट्रपति को संसद का अधिवेशन स्थगित करने की सिफारिश कर दी.
संसद का सबसे महत्वपूर्ण माना जाने वाला बजट सत्र को स्थगित कर बालेन्द्र शाह की सरकार ने राष्ट्रपति के पास एक साथ आठ अध्यादेश जारी करने की सिफारिश की. इनमें से राष्ट्रपति ने सात अध्यादेश तो जारी कर दिया पर एक अध्यादेश को नामंजूर करते हुए उसे सरकार को लौटा दिया है.
विपक्षी दल सरकार पर संसद को दरकिनार कर अध्यादेशों के माध्यम से शासन चलाने का आरोप लगा रहे हैं.