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मिडिल ईस्ट युद्ध बना एनर्जी वॉर, ऊर्जा ठिकानों पर बढ़ते हमलों ने बढ़ाया संकट

वेस्ट एशिया संघर्ष अब एनर्जी वॉर बन गया है. 9 देशों में तेल-गैस ठिकानों पर हमलों से सप्लाई बाधित है. होर्मुज़ स्ट्रेट असुरक्षित है, ग्लोबल एनर्जी मार्केट और अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.

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खाड़ी में ऊर्जा स्थलों पर हमलों ने चिंता बढ़ा दी है. (Photo:Reuters)
खाड़ी में ऊर्जा स्थलों पर हमलों ने चिंता बढ़ा दी है. (Photo:Reuters)

जब ईरान युद्ध शुरू हुआ, तो इसकी जड़  में परमाणु मुद्दा था. बातचीत जल्द ही शाहेद ड्रोन और ईरान के विशाल मिसाइल भंडारों की ओर मुड़ गई. फिर फोकस हो गया सहने की ताकत से जुड़ी लड़ाई पर, कि पहले कौन थकेगा. ईरान की हमला करने की क्षमता, या अमेरिका, इज़रायल और उनके सहयोगियों की हमले रोकने की क्षमता, काफी हद तक लागत और उत्पादन की सीमाओं से प्रभावित थी. 

हालांकि, एक और कहानी हमेशा से इसके समानांतर चल रही थी और अब वह इस संघर्ष के बारे में आम धारणा पर हावी होती जा रही है, वह है एनर्जी वॉर यानी ऊर्जा युद्ध.

दोनों पक्षों ने शुरू से ही ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को लगातार निशाना बनाया, जब तक कि 23 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 'युद्ध विभाग' को यह निर्देश नहीं दे दिया कि वे ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे पर होने वाले सभी सैन्य हमलों को पांच दिनों के लिए टाल दें.

हालांकि, तब तक काफी नुकसान हो चुका था. जंग के बीच एक समानांतर युद्ध ने पूरे क्षेत्र में एनर्जी से जुड़ी अहम संपत्तियों को बाधित कर दिया था. ऐसा लगता है कि ईरान की रणनीति, क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा की आपूर्ति को ठप करने की उसकी क्षमता पर आधारित है. काफी हद तक, यह बात पहले ही साबित हो चुकी है. इसका मकसद उन अन्य देशों को भी इस संघर्ष की तपिश का एहसास कराना है, जो इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल भी नहीं हैं. आखिरकार, वॉशिंगटन पर चाहे सीधे तौर पर न सही, तो कम से कम अमेरिका के सहयोगियों के जरिए ही दबाव बनाना है, जिससे वह अपने रणनीतिक टार्गेट्स पर फिर से सोच-विचार कर सके.

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अब तक, नुकसान काफ़ी ज़्यादा हुआ है और इसका अंदाज़ा IEA के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. फतिह बिरोल के उसी दिन दिए गए बयान से लगाया जा सकता है, जब उन्होंने कहा था कि मिडिल ईस्ट खित्ते के करीब 40 एनर्जी एसेट्स नौ देशों में गंभीर रूप से या बहुत गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं."

इंडिया टुडे की ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने ईरान जंग से पैदा हुए एनर्जी संकट के पैमाने का एनालिसिस किया है. इसके लिए टीम ने नौ खाड़ी देशों में टारगेट की गई मुख्य एनर्जी साइट्स का विश्लेषण किया, होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाज़ों से जुड़ी घटनाओं पर नज़र रखी और यह इन्वेस्टिगेट की है कि क्या वैकल्पिक रास्ते भी खतरे में हैं. खाड़ी देशों की सरकारी प्रेस रिलीजों, मीडिया रिपोर्टों और UKMTO ऑपरेशंस सेंटर के डेटा के आधार पर, हमारा एनालिसिस है कि 28 फरवरी को जंग शुरू होने के बाद से बहुत बड़े पैमाने पर व्यवधान हुआ है.

हालांकि, यह डेटासेट अभी पूरा नहीं है. हमारे एनालिसिस से करीब 25 मुख्य एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर साइट्स की पहचान हुई है, जिन्हें इस क्षेत्र में टारगेट किया गया है. ईरानी हमलों के दायरे से गुज़रने की कोशिश कर रहे कम से कम 25 जहाज़ों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह की दुश्मनी जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा है. होर्मुज़ को बाईपास करने वाले कम से कम एक वैकल्पिक निर्यात गलियारे पर भी हमला हुआ है.

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Iran war

ईरान जंग में 9 देशों के ऊर्जा ठिकानों पर अटैक

28 फरवरी से अब तक नौ देशों में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले हुए हैं. यह सिलसिला कच्चे तेल के कुओं से लेकर निर्यात टर्मिनलों तक पूरे खाड़ी ऊर्जा नेटवर्क में फैला हुआ है.

ईरान को सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा है, जिसमें 'साउथ पार्स' गैस क्षेत्र पर हुए हमले भी शामिल हैं. इसके बाद, ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि IRGC ने चेतावनी दी है कि कतर, सऊदी अरब और UAE में मौजूद ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जा सकता है.

यह धमकी जल्द ही सच साबित हो गई. तेहरान ने पूरे पश्चिम एशिया में अपने हमलों का दायरा बढ़ा दिया और कई ऊर्जा ठिकानों पर हमले किए. इनमें सबसे अहम था कतर का 'रास लफ़ान', जो दुनिया का सबसे बड़ा LNG हब है. इस हमले से इतना ज़्यादा नुकसान हुआ है कि अधिकारियों को इसे 'सीधा खतरा' बताना पड़ा और उन्हें 'फोर्स मेज्योर' (आपातकालीन स्थिति) घोषित करना पड़ा.

ईरान का मुख्य कच्चा तेल निर्यात केंद्र 'खारग द्वीप', कुछ वक्त से चर्चा में रहा है. इसकी वजह यह चिंता है कि अमेरिका इस द्वीप पर ज़मीनी हमला कर सकता है. इस द्वीप पर न सिर्फ़ तेल से जुड़ा अहम इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, बल्कि यहां सेना से जुड़े कई अहम ठिकाने भी हैं. 13 मार्च को अमेरिकी सेना ने इस द्वीप पर मौजूद ठिकानों पर हमले किए. बाद में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों को 'पूरी तरह से तबाह' कर दिया है, जबकि एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को जान-बूझकर निशाना नहीं बनाया गया.

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अमेरिका का यह मैसेज तो सोच-समझकर दिया गया था, लेकिन ईरान की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी. ईरान के विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि अगर 'इस्लामिक रिपब्लिक' के खिलाफ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान ईरान की ऊर्जा सुविधाओं पर हमला किया गया, तो तेहरान पूरे खित्ते में मौजूद अमेरिकी कंपनियों को निशाना बनाएगा.

हालांकि, इस धमकी का असर सीमित ही रहा. इसके बाद हुए हमलों का दायरा और बढ़ गया और वे ईरान के मुख्य ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्रों के और भी अंदर तक पहुंच गए.

फिर भी, ईरान ने ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने से खुद को पीछे नहीं हटाया है. 'होरमुज़ स्ट्रेट' को बंद करने और जहाज़ों पर हमला करने से लेकर अहम ऊर्जा ठिकानों पर हमले करने तक, तेहरान ने इस संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ाया है. उसने निर्यात के वैकल्पिक रास्तों पर भी खतरा होने का संकेत दिया है. यह सिलसिला एक सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करता है. इस रणनीति का मकसद आर्थिक और रणनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाना है, जिससे अमेरिका, इजरायल और उनके सहयोगी देशों को युद्ध के मैदान से बाहर भी इस युद्ध की 'तपिश' महसूस हो सके.

सऊदी अरब का नेटवर्क भी दबाव में आ गया है. 'रास तनुरा' पर हमले हुए हैं, जहां दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरियों में से एक और सऊदी अरामको द्वारा संचालित प्रमुख निर्यात टर्मिनल मौजूद हैं. 'सफ़ानिया', 'मरजान' और 'ज़ुलुफ़' जैसे समुद्री तेल क्षेत्रों को भी ईरान के हमलों के बाद कुछ वक्त के लिए बंद करना पड़ा है, जिससे तेल उत्पादन में रुकावट आई है. UAE में हबशान और फुजैराह पर हुए हमलों ने प्रोसेसिंग और स्टोरेज दोनों ही केंद्रों की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया.

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कुवैत, बहरीन और ओमान में रिफाइनरी और टर्मिनल पर हमले हुए हैं, जबकि इराक के एरबिल क्षेत्र पर हुए हमले की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है. कुल मिलाकर ये घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि पूरे क्षेत्र में अहम ऊर्जा बुनियादी ढांचे को लगातार निशाना बनाया जा रहा है.

एनर्जी से जुड़े अन्य पहचानी गई जगहों में टोंडगोयान पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स और शाहरान ऑयल डिपो शामिल हैं. इसके साथ ही ईरान में तेहरान, करज और इस्फ़हान के आसपास के ईंधन डिपो और भंडारण सुविधाएं भी इसमें शामिल हैं. सऊदी अरब में सफानिया, मरजान, ज़ुलुफ़ और शयबा तेल क्षेत्र; UAE में हबशान गैस प्रोसेसिंग सुविधा और फुजैराह तेल उद्योग क्षेत्र; कतर में मेसाइद औद्योगिक शहर; कुवैत में मीना अल अहमदी और मीना अब्दुल्ला रिफाइनरियां; ओमान में सोहर रिफाइनरी और मीना अल फहल टर्मिनल; बहरीन के सित्रा में बाप्को रिफाइनरी; इराक के एरबिल में लानाज़ रिफाइनरी; और इज़रायल के हाइफ़ा में बाज़ान रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स शामिल हैं.

energy crisis 

होर्मुज़ से होकर जाने वाले रास्तों के निशाना बना रहा ईरान

होर्मुज़ में सिर्फ़ समुद्री रुकावट पर ध्यान देने के बजाय, ईरान अब उन मिडस्ट्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी दबाव बढ़ा रहा है, जो बाईपास मार्गों को तेल पहुंचाते हैं. ऐसा ही एक रास्ता हबशान-फुजैराह-अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (ADCOP) है, जिसे ईरानी रुकावट के ख़िलाफ़ एक रणनीतिक बचाव के तौर पर बनाया गया था, UAE को अपने निर्यात का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज़ के बाहर सुरक्षित रखने की सुविधा देता है. इस भी कथित तौर पर हमला हुआ है.

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साल 2012 में करीब $3.3 बिलियन की अनुमानित लागत से शुरू की गई 380 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन, होर्मुज़ स्ट्रेट को बाईपास करने के लिए डिज़ाइन की गई थी. इसके ज़रिए अबू धाबी से हर दिन 1.5–1.8 मिलियन बैरल कच्चा तेल सीधे ओमान की खाड़ी तक पहुंचाया जाता था. 

हालांकि, 30 मार्च की Soar Atlas सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित रिपोर्टों से पता चलता है कि अब यह सुरक्षा कवच भी काम नहीं कर रहा है. हबशान और स्वेहान में स्थित पंपिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले की ख़बरें आई हैं.

अंदरूनी इलाकों में स्थित पंपिंग स्टेशनों को निशाना बनाकर किए गए ये हमले यह साबित करते हैं कि तेल का रास्ता बदलने से ख़तरा पूरी तरह से टल नहीं जाता, बल्कि वह बस एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट हो जाता है.

India Today के एनालिसिस में दो और ऐसे निर्यात रास्तों की पहचान की गई है, जिनका इस्तेमाल होर्मुज़ स्ट्रेट में रुकावट होने पर वैकल्पिक रास्तों के तौर पर किया जा सकता है. अब तक इन रास्तों को सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाया गया है, लेकिन वैकल्पिक मार्गों के तौर पर इनकी रणनीतिक भूमिका इन्हें भी संभावित ख़तरे के दायरे में ला खड़ा करती है.

किरकुक-सेहान पाइपलाइन, इराक़ को तुर्की के भूमध्यसागरीय तट से जोड़ती है. इसकी क्षमता हर दिन 1.6 मिलियन बैरल तेल पहुंचाने की है, लेकिन फ़िलहाल इसके ज़रिए हर दिन करीब 200,000 बैरल तेल ही पहुंचाया जा रहा है.

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सऊदी अरब की 'ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन' भी एक और अहम पाइपलाइन है. इसकी क्षमता हर दिन 7 मिलियन बैरल तक तेल पहुंचाने की है और यह 1200 किलोमीटर का सफ़र तय करके लाल सागर के तट पर स्थित यानबू तक पहुंचती है. इसी वजह से रियाद के लिए यह होर्मुज़ का सबसे अहम विकल्प बन जाती है.

हालांकि, ये दोनों ही पाइपलाइनें ज़मीन पर बने लंबे और खुले रास्तों से होकर गुज़रती हैं. जैसे-जैसे अमेरिका, इज़रायल और उनके सहयोगी देश होर्मुज़ स्ट्रेट में मौजूद रुकावटों को बाईपास करने की कोशिशें तेज़ करेंगे, ये रास्ते भी तेहरान के संभावित निशानों की सूची में और ज़्यादा शामिल होते जाएंगे.

होर्मुज़ बना ख़तरनाक समुद्री रास्ता

जब से यह संघर्ष शुरू हुआ है, तब से होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले समुद्री यातायात पर लगातार दबाव बना हुआ है. अब तो ख़तरे सिर्फ़ इक्का-दुक्का घटनाओं तक ही सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इनका दायरा काफ़ी बढ़ गया है. यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) के मुताबिक, अरब खाड़ी, होर्मुज स्ट्रेट और ओमान की खाड़ी में वाणिज्यिक जहाजों और अपतटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी कम से कम 25 समुद्री सुरक्षा घटनाएं दर्ज की गई हैं.

यह पैटर्न छिटपुट व्यवधान से कहीं ज्यादा गंभीर है. एनर्जी से जुड़े कई जहाजों पर पारगमन और स्थानांतरण के अहम क्षणों में हमले हुए, जो तेल प्रवाह को जानबूझकर निशाना बनाने की ओर इशारा करते हैं. हरक्यूलिस स्टार और एमकेडी वीवाईओएम जैसे टैंकरों पर चलते समय प्रक्षेपास्त्रों से हमला किया गया, दोनों ने ही जहाज पर आग लगने की सूचना दी.

इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि जहाज से जहाज स्थानांतरण संचालन के दौरान हमले दर्ज किए गए, जहां जहाज सबसे ज्यादा असुरक्षित होते हैं. टैंकर ज़ेफिरोस और एसएवीफेसा विष्णु पर ट्रांसफर के दौरान हमला हुआ, जिससे आग लग गई और ऑपरेशन बाधित हुआ. माल को सबसे सीधा नुकसान सोनंगोल नामिबे जहाज पर हुआ, जहां जहाज पर हुए विस्फोट से कार्गो होल्ड क्षतिग्रस्त हो गया और तेल का रिसाव हुआ, जिससे एक्टिव पेट्रोलियम शिपमेंट प्रभावित हुए.

 
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(विजयेश तिवारी के इनपुट के साथ)
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