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धरती के 'पाताल' में बसी अनोखी दुनिया... जहां की हवा फेफड़ों को एक्स्ट्रा आराम देती है!

धरती के इस सबसे गहरे और अनूठे कोने में भौगोलिक स्थिति और रोजमर्रा की जिंदगी बाकी दुनिया से बिल्कुल अलग है. यहां भरपूर ऑक्सीजन है और कुदरती 'सनस्क्रीन' भी है. यहां रहने वालों की जिंदगी बेहद शांत, अनुशासित और आधुनिक है, लेकिन इसमें बड़े शहरों वाली कोई तड़क-भड़क या शोर-शराबा नहीं है. ये जगह धरती की वो सबसे निचली जगह है जहां इंसान बसता है.

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धरती का पाताललोक. (Photo: ITG)
धरती का पाताललोक. (Photo: ITG)

जरा सोचिए, एक ऐसी जगह जहां आप पानी में उतरें तो चाहकर भी कभी डूब न सकें. जहां रेगिस्तान की कड़कड़ाती धूप में घंटों रहने के बाद भी आपकी त्वचा न झुलसे और जहां हवा में इतनी ताजगी हो कि सांस लेने के लिए फेफड़ों को मशक्कत नहीं, बल्कि 'एक्स्ट्रा' आराम मिले. ये कहानी है धरती के 'पाताल' में बसी दुनिया की सबसे निचली बस्ती की.

यहां का नजारा किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है. एक तरफ रेगिस्तान के सूखे, मटमैले और विशाल पहाड़ हैं, तो दूसरी तरफ नीले-फिरोजी रंग का फैला हुआ मृत सागर, जिसके किनारों पर रेत नहीं, बल्कि सफेद नमक की मोटी परतें जमी हुई हैं. इस रहस्यमयी शांत घाटी में कुदरत के भौतिक नियम बाकी दुनिया से काफी अलग काम करते हैं.

ये जगह है नेवे जोहर जो डेड सी के पास इजरायल में है. यहां जमीन नीचे धंसते हुए किसी 'पाताल' जैसी गहराई पर जाकर ठहरती है. यह जगह समुद्र तल से करीब 400 मीटर से भी ज्यादा नीचे बसी है. यानी इससे ज्यादा नीचे दुनिया में कोई और जगह नहीं है जहां इंसान रहता हो. नेवे जोहर इजरायल के दक्षिणी जिले में जॉर्डन रिफ्ट वैली के बीच, हाइवे 31 और हाइवे 90 के जंक्शन पर स्थित है.

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क्या खास है इस जगह में?

अत्यधिक गहराई में होने के कारण यहां वायुमंडलीय दबाव बहुत ज्यादा है. इस भारी दबाव की वजह से यहां की हवा में सामान्य दुनिया के मुकाबले 8% से 10% ज्यादा ऑक्सीजन मौजूद है. यहां सांस लेना बेहद आसान है, जिससे अस्थमा और दिल के मरीजों को राहत मिलती है.  सूरज की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणें प्राकृतिक रूप से फिल्टर हो जाती हैं. यानी यहां तेज धूप में भी सनबर्न का खतरा न के बराबर होता है.

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस अनोखे गांव की स्थायी आबादी केवल 166 है. छोटा होने के बावजूद यह इलाका प्रशासनिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 'तामार रीजनल काउंसिल' का मुख्यालय है. यहां एक छोटा सा प्राथमिक स्कूल, एक स्थानीय म्यूजियम और कुछ चुनिंदा रिहायशी घर हैं.

इस जगह का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. इसकी शुरुआत साल 1964 में हुई थी. शुरुआत में यह मृत सागर के पास काम करने वाले फैक्ट्री के मजदूरों के लिए बनाया गया एक छोटा सा वर्क-कैंप था. धीरे-धीरे समय बदला और यहां लोगों ने अपने स्थायी घर बना लिए. यहां से ठीक 3 किलोमीटर उत्तर में 'एन बोकेक' नाम का एक बड़ा होटल और रिसॉर्ट हब है, जहां दुनिया भर के अमीर पर्यटक आते हैं.

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लेकिन नेवे जोहर ने खुद को कमर्शियल होने से बचा कर रखा है. यहां के स्थानीय निवासियों ने अपने घरों के एक हिस्से को बेहद खूबसूरत जिमर्स यानी छोटे गेस्ट हाउस में बदल दिया है. यहां आने वाले बजट मुसाफिर और शांति पसंद लोग ठहरते हैं, जो कम पैसों में डेड सी के जादुई पानी में तैरने का आनंद लेना चाहते हैं.

नेवे जोहर के निवासियों को हर दिन कई अनोखी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. यहां झुलसा देने वाली गर्मी पड़ती है. गर्मियों के महीनों यानी जून से सितंबर में यहां का तापमान अक्सर 45°C से 47°C के पार चला जाता है. यहां की गर्मी बेहद शुष्क और भारी होती है, जिससे दोपहर के समय घरों से बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है. पूरे साल में यहां केवल 40-50 मिमी तक ही बारिश होती है.

यहां दुकान और बाजारों का अभाव है. इस गांव के भीतर कोई सुपरमार्केट, बड़ा रेस्टोरेंट या नाइटलाइफ नहीं है. अगर निवासियों को घर का राशन या बड़ी मेडिकल सुविधा चाहिए, तो उन्हें पहाड़ों पर चढ़कर 25 किलोमीटर दूर बसे 'अराद' शहर जाना पड़ता है. बिना निजी गाड़ी के यहां रहना बेहद कठिन है.

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डेड सी के पानी में अत्यधिक नमक की मात्रा होने के कारण लोग इसमें डूबते नहीं हैं. आम सागरों या समुद्रों के मुकाबले यहां का पानी लगभग 8.6 गुना ज्यादा खारा है. इसके पानी में करीब 34% लवणता पाई जाती है. इसका मतलब है कि इसके 1 लीटर पानी में लगभग 340 ग्राम नमक और अन्य खनिज घुले हुए हैं.

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यहां क्लाईमेट से जुड़ी चुनौतियां भी हैं. डेड सी को लेकर चिंता यह है कि उसका जलस्तर हर साल लगभग 1 मीटर की दर से सिकुड़ रहा है. पानी कम होने की वजह से आसपास की जमीन में खतरनाक सिंकहोल्स बन रहे हैं, जो भविष्य में इस बस्ती के भूगोल को बदल सकते हैं.

शांत माहौल, प्रदूषण मुक्त हवा और प्रकृति के इस अनूठे चमत्कार के बीच बसी यह बस्ती इस बात का जीता-जागता सबूत है कि इंसान धरती के किसी भी छोर को अपना 'प्यारा घर' बना सकता है.

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