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इस अकेली कंपनी ने इजरायल को दिया बेतहाशा फंड, नेतन्याहू के वॉर गेम पर बड़ा खुलासा

गाजा युद्ध के दौरान दुनिया की कई सरकारें इजरायल की कार्रवाई पर सवाल उठा रही थीं. अंतरराष्ट्रीय अदालत में नरसंहार के आरोपों पर सुनवाई चल रही थी. लेकिन इसी बीच कुछ बड़ी वित्तीय कंपनियां अरबों डॉलर के इजरायली बॉन्ड खरीदे जिससे इजरायल को वॉर करने में मदद मिली.

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गाजा में जंग के बीच इजरायल को कॉर्पोरेट फंड मिला. (Photo- ITG)
गाजा में जंग के बीच इजरायल को कॉर्पोरेट फंड मिला. (Photo- ITG)

जब गाजा में युद्ध चल रहा था, तब पैसा कहां से आ रहा था? अक्टूबर 2023 के बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया. हजारों लोगों की मौत हुई, लाखों लोग विस्थापित हुए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इजरायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर तीखी बहस भी हुई. इसी दौरान एक बड़ा सवाल भी उठने लगा था. इतना लंबा युद्ध चलाने के लिए इजरायल को पैसा कहां से मिल रहा था? 

युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ा जाता. उसके लिए अरबों डॉलर की जरूरत होती है. सेना की तैनाती, हथियार खरीदना, मिसाइल डिफेंस सिस्टम चलाना, सैन्य अभियान जारी रखना और युद्ध से प्रभावित अर्थव्यवस्था को संभालना, इन सबके लिए सरकारों को भारी फंडिंग चाहिए होती है. यहीं से शुरू होती है इजरायली सरकारी बॉन्ड्स की कहानी.

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जब किसी देश की सरकार को बड़ी रकम की जरूरत होती है, तो वह बॉन्ड जारी करती है. आसान भाषा में समझें तो यह सरकार द्वारा लिया गया एक तरह का कर्ज होता है. निवेशक सरकार को पैसा देते हैं और बदले में सरकार उन्हें निश्चित ब्याज के साथ पैसा लौटाने का वादा करती है.

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कॉर्पोरेट का निवेश के नाम पर 'वॉर फंड'

गाजा, लेबनान और बाद में ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों के दौरान इजरायल ने बड़े पैमाने पर सरकारी बॉन्ड जारी किए. युद्ध के दौरान इन बॉन्ड्स की बिक्री रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई. रिपोर्ट में किस कंपनी का नाम सबसे ऊपर आया? एम्स्टर्डम स्थित रिसर्च फर्म के आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध के दौरान सबसे बड़ा विदेशी निवेशक कोई देश नहीं बल्कि एक कॉर्पोरेट समूह था.

यह समूह था जर्मनी की बीमा और वित्तीय सेवा कंपनी एलियांज और उसकी अमेरिकी सहायक कंपनी PIMCO (पैसिफिक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी). मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 तक एलियांज -PIMCO समूह के पास लगभग 2.67 अरब डॉलर के इजरायली सरकारी बॉन्ड थे.

यह आंकड़ा इतना बड़ा था कि उस समय के डेटा में मौजूद सभी विदेशी निवेशकों की कुल हिस्सेदारी का लगभग 51.8 फीसदी इसी समूह के पास था. दूसरे शब्दों में कहें तो एलियांज -PIMCO के पास इजरायली बॉन्ड्स में उतना निवेश था जितना दुनिया के बाकी सभी विदेशी निवेशकों को मिलाकर भी नहीं था.

युद्ध के दौरान क्यों बढ़ गया निवेश?

युद्ध शुरू होने से पहले इजरायली बॉन्ड्स पर औसत ब्याज दर करीब 1.4 फीसदी थी. लेकिन युद्ध के दौरान जारी बॉन्ड्स पर यह बढ़कर लगभग 5.56 फीसदी पहुंच गई. वित्तीय बाजार में इसे अक्सर "वॉर प्रीमियम" कहा जाता है. यानी जोखिम ज्यादा है, लेकिन मुनाफा भी ज्यादा है. हालांकि इसी दौरान इजरायल की क्रेडिट रेटिंग को दुनिया की प्रमुख एजेंसियों ने डाउनग्रेड भी किया था, फिर भी निवेशकों का पैसा लगातार आता रहा.

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यही वजह है कि मानवाधिकार समूहों ने इस निवेश पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि जब किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय अदालत में नरसंहार जैसे गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो, तब उसे आर्थिक मदद देना सिर्फ वित्तीय फैसला नहीं बल्कि नैतिक और कानूनी सवाल भी पैदा करता है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2024 में विदेशी निवेशकों के पास कुल लगभग 1.16 अरब डॉलर के इजरायली बॉन्ड थे. मार्च 2026 तक यह बढ़कर 4.91 अरब डॉलर हो गए. यानी सिर्फ डेढ़ साल में विदेशी निवेश लगभग चार गुना बढ़ गया. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी रकम का लगभग 90 फीसदी सिर्फ दो देशों अमेरिका और जर्मनी से आया. मार्च 2026 तक विदेशी निवेश का लगभग 4.45 अरब डॉलर हिस्सा इन दोनों देशों से जुड़ा हुआ था. बाकी दुनिया की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम रही.

PIMCO आखिर है क्या है?

अगर दुनिया के बॉन्ड बाजार की बात करें तो PIMCO सबसे बड़ी कंपनियों में से एक मानी जाती है. 1971 में कैलिफोर्निया में स्थापित यह कंपनी 2026 की शुरुआत तक करीब 2.27 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन कर रही थी. इसमें से लगभग 1.86 ट्रिलियन डॉलर बाहरी ग्राहकों की संपत्तियां थीं. इन ग्राहकों में पेंशन फंड, बीमा कंपनियां, सरकारी निवेश फंड और बड़े संस्थागत निवेशक शामिल हैं.

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PIMCO साल 2000 से एलियांज की सहायक कंपनी है और इस कंपनी का मालिकाना हक में इसी के पास है. यही वजह है कि एलियांज और PIMCO के निवेश को एक साथ देखा जाता है. अमेरिका की भूमिका सबसे बड़ी क्यों मानी जा रही है? पहली नजर में आंकड़े जर्मनी को सबसे बड़ा निवेशक दिखाते हैं. लेकिन कहानी थोड़ी अलग है.

रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी के नाम पर दिख रहे निवेश का लगभग 94 फीसदी हिस्सा PIMCO द्वारा प्रबंधित किया जा रहा था, जो अमेरिका में स्थित है. यानी टेक्निकली यह काफी हद तक अमेरिकी फंड्स की कहानी भी है. मार्च 2026 तक अमेरिकी निवेशकों के पास लगभग 2.02 अरब डॉलर के इजरायली बॉन्ड थे.

इनमें दुनिया की सबसे बड़ी इंडेक्स फंड कंपनियों में शामिल वैनगार्ड भी थी, जिसने पहली बार इजरायली बॉन्ड्स में अपना निवेश 1 अरब डॉलर के पार पहुंचा दिया. दिलचस्प बात यह है कि जहां कुछ अमेरिकी और जर्मन संस्थान निवेश बढ़ा रहे थे, वहीं यूरोप के कई बड़े निवेश फंड इजरायल से दूरी बनाने लगे थे.

यूरोप की कई कंपनियों ने इजरायल पर एक्शन भी लिया

जैसे कि डेनमार्क के AkademikerPension ने सितंबर 2025 में इजरायल को अपने निवेश पोर्टफोलियो से बाहर कर दिया था. आयरलैंड के आयरिश स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट फंड ने इजरायली सरकारी बॉन्ड बेच दिए. नॉर्वे के संप्रभु निवेश फंड ने 11 इजरायली कंपनियों से निवेश वापस लिया और पांच बैंकों को बाहर कर दिया. यानी पश्चिमी दुनिया के भीतर भी दो अलग-अलग रुझान दिखाई देने लगे.  

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PIMCO का आधिकारिक तर्क यह रहा कि इजरायली बॉन्ड मजबूत आर्थिक आधार और आकर्षक रिटर्न की वजह से खरीदे गए. लेकिन आलोचकों का कहना है कि मामला सिर्फ मुनाफे का नहीं हो सकता. क्योंकि गाजा युद्ध और अंतरराष्ट्रीय अदालत में चल रही कार्यवाही के बावजूद निवेश लगातार बढ़ता रहा.

कुछ मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि ऐसे निवेश युद्ध जारी रखने की आर्थिक क्षमता को मजबूत करते हैं. हालांकि कंपनियों ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है. गाजा युद्ध के दौरान यूरोप में कई फिलिस्तीन समर्थक समूहों ने एलियांज के खिलाफ प्रदर्शन भी किए.

लंदन और गिल्डफोर्ड स्थित कंपनी के कार्यालयों पर विरोध प्रदर्शन हुए. कुछ कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कंपनी इजरायल से जुड़े सैन्य और वित्तीय नेटवर्क को इनडायरेक्टली समर्थन दे रही है. बीमा कंपनी एलियांज (Allianz) ने इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ करीब 3 लाख पाउंड (लगभग 3.5 करोड़ रुपये) के हर्जाने का मुकदमा भी दायर कर दिया है. लंदन की एक अदालत में मामले की इस सप्ताह सुनवाई भी हो सकती है. इस बीच कंपनी पर आरोप लग रहे हैं कि यह मुकदमा विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश है

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