इजरायल के आम चुनाव के आधिकारिक परिणाम बुधवार को केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट जस्टिस नोअम सोहलबर्ग ने राष्ट्रपति आइजैक हर्ज़ोग को सौंप दिए. इससे नई सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके सहयोगियों ने चुनावी धोखाधड़ी के आरोप लगाते हुए परिणामों के प्रकाशन को रोकने की मांग की थी. इस चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. इस लिहाज से राष्ट्रपति की भूमिका अहम हो जाती है.
राष्ट्रपति निवास में आयोजित समारोह में सोहलबर्ग ने चुनाव परिणामों पर संदेह जताने की कोशिशों को लोकतंत्र के लिए “वास्तविक खतरा” बताया. उन्होंने कहा, “हाल के दिनों में हमने ऐसी आवाजें सुनी हैं जो चुनाव परिणामों पर संदेह जता रही हैं और उनकी वैधता को कमजोर कर रही हैं. यह एक वास्तविक खतरा है. लोकतंत्र की नींव में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण शामिल है, जो मतदाताओं की इच्छा के सम्मान से आता है.”
सोहलबर्ग ने जोर दिया कि भले ही चुनावी धोखाधड़ी के संदेह साबित हों, उनका संभावित प्रभाव इतना सीमित है कि परिणामों को अमान्य नहीं किया जा सकता.
"हाल के दिनों में, हमने ऐसी बातें सुनी हैं जो चुनाव परिणामों पर संदेह पैदा करने और उनकी वैधता को कमजोर करने की कोशिश कर रही है. यह एक वास्तविक खतरा है," सोहलबर्ग ने राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास पर आयोजित एक समारोह में कहा.
उन्होंने कहा कि "लोकतंत्र के आधार स्तंभों में से एक है, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण. यह इस समझ से आता है कि मतदाताओं की इच्छा हम सभी के लिए बाध्यकारी है. "
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके गठबंधन सहयोगियों ने चुनावी धांधली का आरोप लगाया है और मांग की है कि चुनाव परिणामों को जारी करने पर रोक लगाई जाए.
सोहलबर्ग ने बताया कि बुधवार सुबह CEC सदस्यों के सामने आरोपों की चल रही जांच की समरी पेश की गई. उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संदेहों की पूरी तरह से जांच होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "फिलहाल ये सिर्फ संदेह हैं, लेकिन अगर ये सच भी साबित होते हैं, तो इनका असर काफी सीमित होगा. इसलिए, चुनाव नतीजों को जारी न करना और उस 'नेसेट' (संसद) का कार्यकाल बढ़ाना संभव नहीं है, जिसका कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका है."
सोहलबर्ग ने कहा, "इसलिए, हम अभी चुनाव नतीजे जारी कर रहे हैं. अगर आगे चलकर कोई सबूत मिलता है, तो चुनाव नतीजों को चुनौती देने के लिए कानून में तय प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा सकती है."
उन्होंने अरब समुदायों में हुई वोटिंग पर शक न करने की भी सलाह दी. उन्होंने कहा, "हमें अरब समाज में हुई वोटिंग पर कोई शक नहीं करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे हमें इजरायली समाज के किसी अन्य समूह की वोटिंग पर भी शक नहीं करना चाहिए."
सोलबर्ग ने कहा, "वोटों की गिनती खत्म होने के बाद भी मतभेद बने रह सकते हैं, लेकिन चुनाव नतीजे हम सभी पर लागू होते हैं और हमें उन्हें मानना होगा."
इस बीच, हर्ज़ोग ने कहा कि उन्हें 'शिन बेट' सुरक्षा एजेंसी, पुलिस और अन्य कानून लागू करने वाली एजेंसियों के काम पर 'पूरा भरोसा' है, जो चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच कर रही हैं.
उन्होंने धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा, "चुनाव नतीजों पर किसी भी बाहरी और नुकसानदेह दखल के संदेह की, 'शिन बेट' और पुलिस द्वारा पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए."
सोहलबर्ग ने कहा, "वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी असहमति खत्म नहीं होती, लेकिन नतीजे हम सभी पर लागू होते हैं."
वहीं हर्ज़ोग ने कहा कि उन्हें शिन बेट सुरक्षा एजेंसी, पुलिस और चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की जांच कर रही अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के काम पर "पूरा भरोसा" है.
उन्होंने धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा, "चुनाव नतीजों पर किसी भी बाहरी दखल के संदेह की शिन बेट और पुलिस द्वारा गहन जांच की जानी चाहिए."
हर्ज़ोग ने इजरायल के अरब समुदाय को "बदनाम" करने के खिलाफ भी चेतावनी दी. उन्होंने हाल ही में की गई नस्लवादी टिप्पणियों की निंदा करते हुए कहा, "सबको एक ही नजरिए से देखने से बचें. इजरायल के अरब समाज के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. देश के हर क्षेत्र में उनके योगदान और समाज में घुलने-मिलने की उनकी इच्छा की मैं कद्र करता हूं."
"चुनाव खत्म हो चुके हैं" हर्ज़ोग ने आगे कहा, "अब सच्चाई का सामना करने का समय आ गया है."
बता दें कि नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने अकेले अरब समुदायों के मतदान केंद्रों पर लगभग 1,200 शिकायतें दर्ज कराई थीं. इनकी जांच की जा रही है.
राष्ट्रपति, नेसेट के लिए चुने गए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करेंगे. इसके आधार पर वे तय करेंगे कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए.
हर्ज़ोग द्वारा चुने गए उम्मीदवार के पास गठबंधन सरकार बनाने के लिए 28 दिन होंगे. अगर राष्ट्रपति को लगता है कि और समय की जरूरत है, तो वे 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दे सकते हैं.
बता दें कि 27 अक्टूबर के चुनाव में किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। नेतन्याहू की 'लिकुड' पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उनके गुट को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर थोड़ी बढ़त तो मिली, लेकिन वे संसद में बहुमत हासिल करने से चूक गए.
चुनाव में न तो नेतन्याहू के गुट को और न ही उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी 'चेंज ब्लॉक' को संसद में बहुमत मिला. ऐसे में, सरकार बनाने के लिए अरब दलों सहित छोटी पार्टियों के साथ बातचीत की संभावना बढ़ गई है.
विपक्षी गुट ने इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया है.
अरब दलों ने नेसेट (इज़राइली संसद) की 120 में से 19 सीटें जीती हैं, जिससे वे इस बंटी हुई संसद में 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकते हैं.
अगर नेतन्याहू और आइसेनकोट में से कोई भी सरकार बनाने में सफल नहीं होता है, तो अगले साल की शुरुआत में इज़राइल में एक और चुनाव हो सकता है.