इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने एक बार फिर राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है. तीन दशक से ज्यादा के राजनीतिक करियर में कई बार मुश्किलों से निकल चुके नेतन्याहू इस बार भी सत्ता बचाने की कोशिश में जुटे हैं. चुनाव के शुरुआती नतीजों में उनकी लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन इस दक्षिणपंथी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिला है.
इजरायल की 120 सीटों वाली संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है. शुरुआती नतीजों में बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर, जबकि उनके प्रतिद्वंदी गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्ष 48 सीटों पर आगे है. ऐसे में अरब पार्टियों रा’आम और जॉइंट लिस्ट की 19 सीटें निर्णायक हो सकती हैं. इनके समर्थन से विपक्ष बहुमत के करीब पहुंच सकता है, लेकिन राह आसान नहीं है. विपक्ष में शामिल कुछ नेता अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने के खिलाफ हैं. आइसेनकोट के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन मतभेदों को दूर कर सभी दलों को एकजुट करना है.
इजरायल में अरब पार्टियों रा’आम और जॉइंट लिस्ट की कुल 19 सीटें सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं. अगर ये दोनों पार्टियां गादी आइसेनकोट के विपक्षी गठबंधन का समर्थन करती हैं, तो नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का रास्ता खुल सकता है. लेकिन विपक्ष के सभी नेता अरब पार्टियों का समर्थन लेने के पक्ष में नहीं हैं. यही वजह है कि 19 सीटें होने के बावजूद सरकार बनाना आसान नहीं होगा. इन पार्टियों का अंतिम फैसला बहुमत का पूरा समीकरण बदल सकता है. इसलिए इन्हें इजरायल की राजनीति में किंगमेकर, यानी सत्ता की चाबी तय करने वाला माना जा रहा है.
इजरायल के चुनाव में 90 फीसदी वोटों की गिनती के बाद सामने आए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 26 सीटों के साथ सबसे आगे है. वहीं, गादी आइसेनकोट की याशर पार्टी को 21 सीटें मिलती दिख रही हैं. बी'याचद और जॉइंट लिस्ट को 12-12 सीटें मिलने का अनुमान है. डेमोक्रेट्स को 8 सीटें, जबकि यिसरेल बेतेनु, शास, यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म, ओत्जमा येहुदित और राम पार्टी को 7-7 सीटें मिलने की संभावना है. धार्मिक जायनिज्म को 6 सीटें मिलती दिख रही हैं. हालांकि, ये रुझान हैं, अंतिम नतीजे नहीं.
कई मुश्किलों से उबर चुके हैं नेतन्याहू
बेंजामिन नेतन्याहू अब तक छह बार इजरायल के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. उनका पहला कार्यकाल 1996 से 1999 तक रहा. इसके बाद वे 2009 से 2021 तक लगातार चार कार्यकालों में प्रधानमंत्री रहे. 29 दिसंबर 2022 को उन्होंने छठी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. अक्टूबर 2026 में हुए इजरायली चुनावों के बाद अब उनकी नजर सातवीं बार प्रधानमंत्री बनने पर है.
आखिर, ये सत्ता में उनकी वापसी का रास्ता चुनावी नतीजों और सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत पर निर्भर करेगा. नेतन्याहू के सामने अब विपक्षी गठबंधन को सरकार बनाने से रोकने की चुनौती है. रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी पार्टी ने अरब दलों पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप भी लगाए हैं. वहीं, विपक्ष को आशंका है कि नेतन्याहू सुरक्षा संकट का इस्तेमाल करके सरकार गठन की प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं.
दूसरी ओर, गादी आइसेनकोट की सरकार बनाने क्षमता विपक्षी दलों की एकजुटता और अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर करेगी. उन्हें 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. हालांकि, अरब दलों के समर्थन को लेकर विपक्ष के कुछ नेताओं की असहमति उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है. अंततः राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका अहम होगी.
वोटों की गिनती के बाद इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग सभी राजनीतिक दलों से सलाह-मशविरा करेंगे. इसके बाद वह उस नेता को सरकार बनाने का मौका देंगे, जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अधिक संभावना होगी. चुने गए नेता को सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलेंगे.
जरूरत पड़ने पर यह अवधि 14 दिन और बढ़ाई जा सकती है. अगर कोई भी नेता सरकार बनाने में सफल नहीं होता है, तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है. इस स्थिति में नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं. फिलहाल, नेतन्याहू की राजनीतिक किस्मत गठबंधन के गणित और विपक्ष की एकजुटता पर निर्भर करती है. उन्होंने पहले भी कई मुश्किल हालात का सामना किया है, लेकिन इस बार सत्ता बचाने के लिए उन्हें बड़ी राजनीतिक चुनौती से गुजरना होगा.
(रिर्पोट: केशव गुप्ता)