एक तरफ ईरान और अमेरिका-इजरायल की जंग चल रही है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच भी सैन्य टकराव चल रहा है. इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का एक सोशल मीडिया पोस्ट अचानक चर्चा में आ गया. इस पोस्ट में उन्होंने खुलकर अफगानिस्तान का शुक्रिया अदा तो किया है, साथ ही खामोशी के साथ अफगानिस्तान का समर्थन भी कर दिया. उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी हमले की आलोचना कर दी.
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में लगा है. हर देश का रुख अब ईरान के लिए मायने रखता है. ऐसे में अब्बास अराघची ने रमजान के मौके पर एक संदेश जारी किया, जिसमें उन्होंने खास तौर पर अफगानिस्तान की सरकार और वहां के लोगों का धन्यवाद किया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान ने "आक्रामकता के खिलाफ मजबूती से खड़े होकर" ईरान का साथ दिया.
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अफगानिस्तान इस समय तालिबान के नियंत्रण में है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके शासन को स्वीकार्यता नहीं मिली है. इसके बावजूद ईरान ने खुलकर उसका धन्यवाद किया. यह सिर्फ एक औपचारिक बयान नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था, जो देश ईरान के साथ खड़े हैं, वही उसके असली साझेदार हैं. इसी पोस्ट में पाकिस्तान का नाम लिए बिना अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी हमले की निंदा करना एक बड़ा संदेश था. खासकर तब, जब पाकिस्तान ने भी आधिकारिक तौर पर अमेरिका-इजरायल के हमलों का विरोध किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ईरान पाकिस्तान से नाराज है?
अब्बास अराघची ने अपने ताजा पोस्ट में कहा, "रमजान के इस मुबारक महीने में, मैं अफगानिस्तान की सरकार और लोगों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूं. उन्होंने अमेरिका और इजरायली सरकार के हमले की बुराई की है, और ईरान के लोगों और सरकार के लिए एकजुटता और सपोर्ट दिखाया है. अल्लाह पर भरोसा रखते हुए, हम हर हमले के खिलाफ़ मज़बूती से खड़े हैं. मुझे उम्मीद है कि अफ़गानिस्तान में भी शांति और सुकून बना रहेगा."
ईरान जंग में पाकिस्तान की रणनीतिक चाल
असल में, इस कहानी की परतें थोड़ी गहरी हैं. एक तरफ पाकिस्तान ने बयानबाजी में ईरान का समर्थन किया, वहीं दूसरी तरफ उसकी रणनीतिक चालें कुछ और संकेत दे रही हैं. पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग इस पूरे समीकरण को बदल रहा है. हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब का दौरा किया. वहां सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान के साथ हुई बातचीत में ईरान के हमलों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा हुई.
सऊदी अरब पहले से ही ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है. यही नहीं, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने संसद में साफ कहा कि सऊदी अरब के साथ उनका रक्षा समझौता पूरी तरह लागू है और यह किसी भी खतरे की स्थिति में लागू हो सकता है. यानी अगर सऊदी अरब पर हमला होता है, तो पाकिस्तान उसके साथ खड़ा होगा.
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यहीं से ईरान की चिंता शुरू होती है क्योंकि हाल के दिनों में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया है, जिनमें सऊदी अरब की तेल सुविधाएं भी शामिल रही हैं. ऐसे में पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ खड़ा होना, ईरान के लिए एक संभावित खतरे के रूप में देखा जा सकता है.
पाकिस्तान की दोहरी नीति पर ईरान की नजर!
अब वापस आते हैं अब्बास अराघची के सोशल मीडिया पोस्ट पर. ईरानी विदेश मंत्री के पोस्ट की बात करें तो यह सिर्फ एक धन्यवाद संदेश नहीं था, बल्कि एक "डिप्लोमैटिक सिग्नल" था. उन्होंने उन देशों को प्राथमिकता दी, जिन्होंने बिना किसी शर्त के ईरान का समर्थन किया. अफगानिस्तान का नाम लेकर उन्होंने यह दिखाया कि ईरान अपने "क्लियर सपोर्टर्स" को पहचान रहा है. इसके उलट, पाकिस्तान के प्रति खामोशी को "सॉफ्ट वॉर्निंग" के रूप में देखा जा रहा है. यह सीधा आरोप नहीं है, लेकिन एक संकेत जरूर है कि ईरान पाकिस्तान की दोहरी भूमिका को नोटिस कर रहा है.
जब अब्बास अराघची ने दी शांति कराने की सलाह!
ईरान और इजरायल-अमेरिका की जंग के बीच अफगानिस्तान-पाकिस्तान में भी सैन्य टकराव हो रहा है. वे एक-दूसरे पर हमले भी कर रहे हैं. दिलचस्प बात है कि कुछ ही समय पहले, अब्बास अराघची ने एक और पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों से अपील की थी कि वे अपने मतभेद बातचीत से सुलझाएं. उन्होंने यहां तक कहा था कि ईरान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने के लिए तैयार है. लेकिन अब उनके ताजा पोस्ट में यह संतुलन गायब दिखता है. अब वह एक पक्ष को खुलकर सराह रहे हैं और दूसरे का नाम लेने से भी बच रहे हैं. यही बदलाव इस कहानी को अहम बनाता है.
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दरअसल, यह पूरा मामला सिर्फ एक पोस्ट का नहीं, बल्कि इस जंग में भू-राजनीतिक समीकरण भी बदल रहे हैं. ईरान इस वक्त कौन हमारे साथ है और कौन नहीं के सिद्धांत पर चल रहा है. वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति थोड़ी मुश्किल है. एक तरफ उसे ईरान जैसे पड़ोसी के साथ संतुलन बनाए रखना है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब जैसे करीबी सहयोगी के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को भी मजबूत रखना है, जहां से उसे आर्थिक मदद भी मिलती है. यही "दोहरी संतुलन नीति" अब उसके लिए चुनौती बनती जा रही है.