
मिसाइलों के बीच चल रहे हैं रमजान... सहरी-इफ्तार के बाद मिसाइलों के गिरने का इंतजार भी रहता है, सुबह वाली तो गिर गई अब दोपहर वाली आएगी. पूरे दिन में तीन बार खड़ाक से होता है. (हंसते हुए ये बताना फिर खामोश हो जाना) ये कहना है कतर के सेंट्रल में रह रहे उस तौसीफ अनवार का.
दोपहर के वक्त में उनसे बात हुई. उन्होंने एक लाइन में सारा हाल बता दिया, जिसे सुनकर सिहरन सी पैदा हुई. बस एक ही बात दिमाग में चल रही थी कैसे कोई इस हाल में रहता होगा. उनकी बातें सुनकर मेरे अंदर एक बेचैनी थी. उस बेचैनी में मैंने कई सवाल कर दिए. लेकिन पूरी कोशिश थी कि उन्हें ये एहसास नहीं हो कि उनकी बातों का कितना गहरा असर मेरे अंदर हुआ है. बस शुरू हुआ बातों का सिलसिला...
मैंने पूछा कि आप तो कई सालों से रहते हैं, ये मिसाइल का मसला तो पहली बार देखा होगा? बोले- हां ये सब तो पहली बार है. अभी ऑफिस में हूं. इसके बाद नमाज पढ़ने जाना है. हालात ठीक तो नहीं हैं मगर कतर गवर्नमेंट ने बहुत पुख्ता सुरक्षा के इंतजाम किए हैं. शुरुआत के दिनों में 3 दिन तक काम पर जाने को मना कर दिया गया था. यहां सरकार ने साफ कहा था कि सुरक्षा को देखते हुए आप लोग घर से मत निकलिए. लेकिन फिर काम शुरू हो गया. काम कहां रुकता है. सब चलता है...
अच्छा तो डर नहीं लगता, मलाल नहीं होता कि घर से दूर क्यों आ गए? डर तो लगता है हर मिसाइल के गिरने के साथ, कई बार तो खिड़की से मिसाइल को गिरते हुए भी देखता हूं. कई बार उसकी आवाज बस सुनाई दे जाती है. थोड़ी देर के लिए डर जाता हूं लेकिन फिर आस-पास देखता हूं. सब एक साथ हैं. जहां मैं एक घर में रहता हूं यहां अपने वतन के ही लोग तो रहते हैं सब. एक ही नेशनेलटी है. ऑफिस जाता हूं तो दूसरे मुल्क के लोग भी हैं. तकरीबन 100 देशों के लोग होंगे आस-पास. सब काम करने घर छोड़कर आए हैं. सब एक दूसरे को देखते हैं, फिर काम पर चल पड़ते हैं. बात करें मलाल कि तो शाम को बैठकर सोचता हूं तो लगता है क्यों आ गए इतनी दूर कमाने. कई बार किसी गम में घर नहीं पहुंच पाने पर तकलीफ होती है. फिर सोचता हूं अपने मुल्क में ये सब पाना आज भी आसान कहां है. अगर कमाने का अच्छा जरिया कहीं दूर मुनासिब है तो यही सही.

'अजान और मिसाइल दोनों की आवाजें साथ सुनाई देती हैं'
यहां पर सभी लोग साथ रहते हैं रमजान का महीना चल रहा है. सहरी-अफ्तारी बनानी होती है, सब मिल बांटकर बनाते हैं. इन बातों के बीच अजान की आवाज सुनाई देती है... अच्छा अब मैं नमाज पढ़कर आता हूं फिर हाल बताउंगा. नमाज का वक्त हो गया है. लेकिन फिक्र मत करो. यहां कि सरकार ने सारे इंतजाम किए हैं. जब भी मिसाइल गिरने वाली होती है वो लोग मोबाइल पर अलार्म देते हैं. इसका मतलब होता है अंदर चले जाओ. फिर दोबार अलार्म या मैसेज आता है जब सब सुरक्षित हो जाता है. मतलब अब निकल सकते हैं. सबके फोन में अलार्म बजता है ये थोड़ा चौंका देता है. लेकिन अब इसका भी आदत हो रही है.

काफी देर बाद फोन आता है, मैंने पूछा कि क्या हुआ सब ठीक तो है? बोले अरे वो अलार्म बज गया था. अब सब ठीक है. फिर आगे की बातचीत होती है... शाम को इफ्तारी के वक्त सारे लोग इकट्ठे होते हैं, उस वक्त बस यही बातें होती हैं कि कब रुकेगा ये सब, कब होगा टेंशन खत्म. फ्लाइट्स कब खुलेंगी. घरवालों से जाकर मिल सकेंगे. इस टेंशन के बीच इस बार ईद पर भी घर जाना नहीं होगा, इंशाअल्लाह बकरीद पर घर जाउंगा.
कई बार तो अजान के बीच मिसाइल की आवाज सुनी है. पहले दिन धमाका हुआ था, उस दिन तो मस्जिद में नमाज अदा करने गया था. लेकिन जिका अकीदा दुरुस्त है उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है. जैसे सब हैं वैसे मैं हूं. यहां सरकार ने जबरदस्त इंतजाम किए हैं. यहां के शॉपिंग मॉल को डेली जरूरत की चीजों से इस तरह फुल किया गया है कि कोई परेशानी नहीं है. खासतौर से इस बात का इंतजाम भी सख्त है कि कोई कालाबाजारी नहीं हो.
घरवाले तो परेशान होते होंगे... हां बहुत होते हैं, लेकिन जब फोन पर बात होती है. तो तसल्ली हो जाती है. घर पर अम्मी अब्बू हैं, बीवी और बच्चे हैं. सबको फिक्र रहती है. आजकल बस फोन पर यही बातें होती रहती हैं. ऑफिस पहुंचने पर तो सबसे पहले आधा घंटा इसी में गुजरता है कि कल का धमाका सुना था? डरे थे कि नहीं डरे थे. जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं धमाकों कि आवाजों के आदी हो रहे हैं. अब लगता है कि चलो ठीक है, हो गया धमाका, सब ठीक भी हो जाएगा आखिर में.