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दोस्ती के नाम पर धोखा? ट्रंप का 'G2' अलायंस क्या भारत के लिए खतरे की घंटी है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार 'G2' यानी अमेरिका-चीन की नई साझेदारी की बात कर रहे हैं. इसी बीच अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक का नाम बदल दिया है. भारत का गलत मैप शेयर किया है. क्या यह सिर्फ शब्दों का खेल है या फिर भारत को लेकर अमेरिका की रणनीति बदल रही है? आईये समझते हैं.

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राष्ट्रपति ट्रंप कई बार शी जिनपिंग की तारीफ करते भी दिखे हैं. (Photo- ITG)
राष्ट्रपति ट्रंप कई बार शी जिनपिंग की तारीफ करते भी दिखे हैं. (Photo- ITG)

कुछ साल पहले तक भारत और अमेरिका की दोस्ती को 21वीं सदी की सबसे अहम रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता था. अमेरिका खुलकर कहता था कि चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करने में भारत उसके सबसे अहम साझेदारों में एक है. QUAD को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का नया सुरक्षा कवच बताया जाता था. अमेरिकी अधिकारी बार-बार "इंडो-पैसिफिक" शब्द का इस्तेमाल करते थे और भारत को इस पूरी रणनीति का केंद्र बताया जाता था. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार एक नए शब्द 'G2' का इस्तेमाल कर रहे हैं. यानी दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियां, अमेरिका और चीन. पहली नजर में यह एक सामान्य कूटनीतिक शब्द लग सकता है. लेकिन भारत के लिए रणनीतिक रूप से यह सिरदर्दी बन सकती है.

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इस सिरदर्दी की वजह सिर्फ 'G2' नहीं है. इसके साथ कई दूसरी घटनाएं भी जुड़ी हैं जिससे लाजमी सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या अमेरिका की चीन नीति बदल रही है? और अगर ऐसा है तो भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?

ट्रंप ने जिसका जिक्र किया वो 'G2' है क्या?

'G2' का मतलब है ग्रुप ऑफ टू यानी आसान भाषा में कहें तो दो देशों की आपसी साझेदारी. यह कोई आधिकारिक संगठन नहीं है, न ही संयुक्त राष्ट्र या G20 जैसी कोई संस्था है. यह एक विचार है जिसके तहत अमेरिका और चीन दुनिया की दो प्रमुख शक्तियों के रूप में वैश्विक मुद्दों पर मिलकर फैसले करें. और आसान शब्दों में समझें तो इसका मतलब ये होगा कि दुनिया के बड़े फैसले अमेरिका और चीन आपसी बातचीत से करेंगे.

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पिछले कई दशकों से अमेरिका की नीति यही थी कि चीन उसका सबसे बड़ा रणनीतिक दुश्मन है. लेकिन ट्रंप हाल के महीनों में कई बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी करीबी बातचीत का जिक्र कर चुके हैं. उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर 'G2' का जिक्र भी किया है. यहां तक हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत के दौरान भी ट्रंप ने इस 'G2' का जिक्र किया. यही बात भारत को परेशान कर रही है. 

ट्रंप के 'G2' से भारत को क्या नुकसान?

भारत की विदेश नीति पिछले कई वर्षों से एक सिद्धांत पर आधारित रही है. मल्टीपोलर वर्ल्ड-मल्टीपोलर एशिया यानी बहुध्रुवीय दुनिया और बहुध्रुवीय एशिया. भारत नहीं चाहता कि एशिया में सिर्फ एक ताकत हावी हो. भारत का मानना है कि अगर चीन अकेला क्षेत्रीय महाशक्ति बन गया, तो उसका असर भारत की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा.

यही वजह है कि भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर QUAD को मजबूत किया. इसे अन्य मुल्कों को शामिल कर इसे QUAD प्लस भी बनाने की कवायद चल रही थी. लेकिन अगर अमेरिका और चीन आपस में समझौते करने लगें, तो भारत की पूरी रणनीतिक गणित बदल सकती है.

ये भी बड़ा सवाल है कि ट्रंप आखिर 'G2' की बात क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं. पहला तो अर्थव्यवस्था है. अमेरिका और चीन के बीच वर्षों से चल रहा ट्रेड वॉर दोनों देशों को नुकसान पहुंचा रहा था. ट्रंप अब टकराव की जगह समझौते की राजनीति अपनाते दिखाई दे रहे हैं.

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दूसरी तरफ घरेली राजनीति भी एक वजह है, जहां ट्रंप खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं जो बड़े-बड़े वैश्विक विवादों को बातचीत से सुलझा सकता है. ट्रंप की विदेश नीति हमेशा से पारंपरिक अमेरिकी रणनीति से अलग रही है. वह संस्थागत गठबंधनों की बजाय व्यक्तिगत रिश्तों और सीधे सौदों पर ज्यादा भरोसा करते हैं.

QUAD पर क्या असर पड़ सकता है?

QUAD का जन्म ही चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए हुआ था. अगर अमेरिका चीन के साथ किसी तरह की रणनीतिक समझ बना लेता है, तो QUAD की अहमियत कम हो सकती है. भारत के लिए यह बड़ी चुनौती होगी क्योंकि QUAD सिर्फ एक सैन्य मंच नहीं है. यह तकनीक, समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन और क्षेत्रीय संतुलन का भी एक अहम ढांचा है. अगर अमेरिका का ध्यान QUAD से हटता है, तो भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है.

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पैसिफिक कमांड वाला विवाद क्या है?

भारत की चिंता को और बढ़ाने वाला एक दूसरा फैसला भी सामने आया. अमेरिका ने अपने सबसे बड़े सैन्य कमांड यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड कर दिया है. पहली नजर में यह सिर्फ नाम बदलने जैसा लगता है लेकिन इसके पीछे का प्रतीकात्मक संदेश काफी बड़ा माना जा रहा है.

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वो डोनाल्ड ट्रंप ही थे जिन्होंने 2018 में पहली बार पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था. उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने कहा था कि यह भारत की बढ़ती भूमिका को सम्मान देने के लिए किया गया है. यानी "इंडो" शब्द भारत की अहमियत का प्रतीक माना गया था. अब उसी शब्द को हटाना कई विशेषज्ञों को अलग संदेश देता दिखाई दे रहा है.

अमेरिका ने भारत का मैप गलत दर्शाया

भारत-अमेरिका के बीच हालात तब और विवादित हो गए जब पेंटागन के आधिकारिक ऐलान के साथ जारी किए गए एक नक्शे में भारत की सीमाओं को गलत तरीके से दर्शाया गया. नक्शे में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिसे भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का गंभीर उल्लंघन माना जाता है.

नाम बदलने के फैसले से पैदा हुए तनाव के बीच मैप से संबंधित गलती ने विवाद को और बढ़ा दिया. भारतीय राजनयिकों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे दोहरी चूक बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह न सिर्फ भारत की संवेदनशील क्षेत्रीय स्थिति की अनदेखी है, बल्कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश भी जा रहा है.

क्या भारत-अमेरिका की दोस्ती खत्म हो रही है?

इस सवाल का सीधा जवाब अभी "नहीं" है. अमेरिका और भारत के बीच रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी, सैन्य अभ्यास और तकनीकी सहयोग अभी भी जारी है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार शब्द भी रणनीति का हिस्सा होते हैं. जब एक तरफ 'G2' की बात हो रही हो और दूसरी तरफ 'इंडो' शब्द हटाया जा रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं.

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पिछले कुछ वर्षों में भारत ने "चीन प्लस वन" रणनीति का सबसे बड़ा लाभ उठाने की कोशिश की. दुनिया भर की कंपनियों को चीन के विकल्प के रूप में भारत में निवेश के लिए आकर्षित किया गया. एपल से लेकर कई वैश्विक कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाने लगीं. लेकिन अगर अमेरिका और चीन के रिश्ते सामान्य हो जाते हैं, तो कई कंपनियों के लिए चीन छोड़ने का दबाव कम हो सकता है. इसका असर भारत में आने वाले विदेशी निवेश पर पड़ सकता है.

हालांकि, भारत का विशाल बाजार और युवा आबादी अभी भी उसकी ताकत बनी रहेगी. रणनीतिक विशेषज्ञों की अगर मानें तो भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा "यूनिपोलर एशिया" यानी एकध्रुवीय एशिया है. अगर अमेरिका चीन को एशिया में ज्यादा रणनीतिक जगह देने लगता है, तो बीजिंग का दबाव दक्षिण चीन सागर से लेकर हिमालय तक बढ़ सकता है.

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भारत ने भी अपनी रणनीति में किया बदलाव

भारत पहले से ही वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ तनाव झेल चुका है. ऐसे में भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिका क्षेत्रीय संतुलन से पीछे हटे. मसलन, यही वजह है कि भारत ने अब यूरोप की तरफ देखना शुरू कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल में कई यूरोपीय देशों का दौरा किया है और कई मुल्कों संग फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भी हुए हैं. यानी भारत का फोकस अब सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने की बजाय बहुस्तरीय कूटनीति पर है.

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भारत यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, खाड़ी देशों और ग्लोबल साउथ के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है. साथ ही नौसेना, रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर भी जोर दिया जा रहा है. मसलन, फिलहाल 'G2' कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है. न ही अमेरिका ने भारत के साथ अपने रिश्ते खत्म किए हैं. लेकिन राजनीति में कई बार आने वाले बदलावों की शुरुआत संकेतों से होती है.

ट्रंप का बार-बार 'G2' का जिक्र करना, QUAD को कम महत्व देना और इंडो-पैसिफिक कमांड से 'इंडो' हटाना ऐसे संकेत हैं जिन्हें भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता. भारत के लिए यह सिर्फ अमेरिका और चीन की दोस्ती का सवाल नहीं है. यह उस वैश्विक व्यवस्था का सवाल है जिसमें नई दिल्ली खुद को एक उभरती महाशक्ति के रूप में देखती है.

अगर दुनिया दो महाशक्तियों 'अमेरिका और चीन' के बीच सिमटने लगती है, तो भारत के सामने आने वाली चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती हैं. ऐसे में भारत को अमेरिका से बदलते सुरक्षा घेरे पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने के बजाय हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी देसी नेवल पॉवर को तेज करने की जरूरत होगी.

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