दिल्ली के कालकाजी इलाके में स्थित लोटस टेंपल हर साल लाखों पर्यटकों और आस्था रखने वालों को आकर्षित करता है. सफेद कमल की आकृति वाला यह भव्य मंदिर शांति, एकता और सार्वभौमिक प्रेम का प्रतीक है. यहां कोई मूर्ति नहीं, कोई खास पूजा-पाठ नहीं, सिर्फ ध्यान और प्रार्थना के लिए खुला स्थान. दुनिया भर के लोग यहां आकर बहाई विश्वास की मूल भावना महसूस करते हैं.
लेकिन हजारों किलोमीटर दूर, बहाई धर्म की जन्मभूमि ईरान (तत्कालीन फारस) में यही समुदाय आजकल सबसे भयानक उत्पीड़न का शिकार है.
पेयवंद नईमी छह महीने से ज्यादा समय से ईरानी जेल में बंद हैं. उन पर कुछ महीने पहले ईरान राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकारी सुरक्षा एजेंटों की हत्या का आरोप है, हालांकि उनके खिलाफ अबतक कोई सबूत पेश नहीं किया गया है. उनकी कानूनी स्थिति अनिश्तित है. पेयवंद के परिवार को सरकारी वकील ने बताया है कि बहाई अभी रिहा नहीं होंगे.
19वीं सदी में ईरान में स्थापित बहाई धर्म के अनुयायी देश में सबसे बड़े गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, फिर भी लगभग हर संकट के समय उन्हें निशाना बनाया जाता है. इस साल बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों और अमेरिका-इजरायल के साथ युद्ध की स्थिति के बीच इस्लामिक रिपब्लिक ने बहाई समुदाय पर अभूतपूर्व दमन तेज कर दिया है.
जनवरी से दर्जनों बहाई भेजे गए जेल
जनवरी से अब तक दर्जनों बहाई केवल अपने धर्म के कारण जेल भेजे जा चुके हैं. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार उनके घरों पर छापों के दौरान पवित्र किताबें और धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया गया जो साफ तौर पर सांप्रदायिक दुर्भावना को दर्शाता है.
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि गिरफ्तार किए गए लोगों को तरह तरह से यातना दी जाती है, जैसे हिरासत में बिजली के झटके, नकली रूप से फांसी की घटनाएं और जबरन कबूलनामे.
एपी की एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान सरकार का यह अभियान पूरे देश में चल रहे व्यापक दमन का हिस्सा है. दिसंबर के अंत से शुरू हुए राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई की है. आरोप है कि इसमें हजारों लोग मारे गए कई हजार गिरफ्तार हुए.
ईरान के विदेश मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रवक्ता ने बहाई मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
ईरान की कुल आबादी में बहाई एक प्रतिशत से भी कम हैं, फिर भी सरकार उन्हें खुलेआम निशाना बनाती है. सरकारी टीवी और सोशल मीडिया पर उन्हें जासूस करार दिया जाता है और देश की आर्थिक समस्याओं का दोष उन पर डाला जाता है.
हर मुश्किल के दौरान बनाया जाता है निशाना
अंतरराष्ट्रीय बहाई समुदाय के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि सिमिन फहंदेज कहती हैं, “हर सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक संकट के समय बहाइयों को निशाना बनाया जाता है. इस बार भी ऐसी ही स्थिति है.
ईरानी जनता को पड़ोसियों पर नजर रखने और बहाई होने पर रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. ईरान का रुलिंग क्लास इस 'धर्म' को इस्लामी ईरान की मान्यताओं के मुताबिक नहीं मानता है. बिंगहैमटन में न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में मिडिल ईस्ट स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफ़ेसर ओमिद घाएम्माघामी कहते हैं, "इस तरह की ज़्यादातर बातें धार्मिक दुश्मनी से पैदा होती हैं."
उन्होंने और दूसरे एक्सपर्ट्स ने कहा कि बहाई लोगों को बलि का बकरा बनाने से दूसरे ईरानियों में डर और 'आज्ञाकारिता' की भावना भी पैदा होती है.
पेयवंद नईमी के परिवार के अनुसार 8 जनवरी की दोपहर को ईरान के इंटेलिजेंस मंत्रालय के एजेंटों ने नईमी को उनके काम की जगह से गिरफ़्तार किया था. परिवार का कहना है कि उन्होंने सरकार-विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा नहीं लिया था.
फर्जी मुकदमों में गिरफ्तारियां
एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि करमान में 8 जनवरी के प्रदर्शनों के दौरान तीन बासिज एजेंटों की कथित हत्याएं नईमी की गिरफ़्तारी के बाद हुई थीं.
सरकार ने इन कथित हत्याओं के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की है. 1 फरवरी को ईरान के सरकारी टीवी ने उनका एक क्लिप दिखाया जिसमें वे प्रदर्शनों में हिस्सा लेने की बात स्वीकार कर रहे थे, हालांकि उनके परिवार का कहना है कि यह कबूलनामा दबाव में लिया गया था.
बहाई इंटरनेशनल कम्युनिटी के अनुसार अधिकारियों ने नईमी पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने जेल से ही सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का "जश्न" मनाया था.
समूह ने कहा कि उस समय नईमी के पास संचार का कोई साधन नहीं था और उन्हें खामेनेई की मौत के बारे में "कोई जानकारी" नहीं थी. तो फिर वे जश्न कैसे मनाते. रिपोर्ट के अनुसार नईमी ने फ़ोन पर अपने परिवार को बताया कि उन्हें करमान सेंट्रल जेल में दो महीने से ज़्यादा समय तक अकेले सेल (सॉलिटरी कन्फाइनमेंट) में रखा गया था.
नईमी की चचेरी बहन एमिलिया नज़ारी ने बताया कि एक जज ने 7 मार्च को नैमी को रिहा करने का आदेश दिया था, लेकिन वे जेल में ही रहे.
इसके तुरंत बाद परिवार के सदस्य उनकी रिहाई की मांग के लिए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय तक हर दिन सरकारी वकील के दफ़्तर जाते रहे, परिवार का कहना है कि तभी वकील ने उनसे कहा कि ऐसा कभी नहीं होगा.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 'द प्लुरलिज़्म प्रोजेक्ट' के अनुसार दुनिया भर में 50 लाख से ज़्यादा बहाई हैं. इनमें से ज़्यादातर एशिया में रहते हैं और सबसे बड़ा समुदाय भारत में है.
रिपोर्ट के अनुसार मिस्र, कतर और यमन में भी बहाइयों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. लेकिन सबसे बुरा बर्ताव ईरान में होता है, जहां शिया मुस्लिम धर्मगुरु शुरू से ही इसे अपने धर्म के खिलाफ मानते रहे हैं.