महाराष्ट्र सरकार की बहुचर्चित मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहन योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है. सरकार द्वारा करीब 92 लाख महिलाओं के नाम योजना से हटाने की प्रक्रिया के बीच अब उन महिलाओं की नाराजगी भी सामने आने लगी है, जिनके खातों में पिछले दो-तीन महीनों से अचानक ₹1500 की मासिक सहायता आनी बंद हो गई है.
विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर शुरू की गई इस योजना को लेकर अब लाभार्थी महिलाएं सवाल पूछ रही हैं कि क्या चुनाव खत्म होते ही लाडकी बहनों की जरूरत भी खत्म हो गई? राखी का त्योहार नजदीक है और इसी बीच कई जरूरतमंद महिलाएं अपने बंद हुए लाभ को दोबारा शुरू करने की मांग कर रही हैं.
आजतक की टीम ने अकोला शहर के मारुति नगर स्लम इलाके में पहुंचकर जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की. यहां दो ऐसी महिलाओं से बातचीत हुई, जिनकी आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी है, लेकिन एक को आज भी योजना का लाभ मिल रहा है, जबकि दूसरी महिला के खाते में पिछले तीन महीनों से एक भी किस्त नहीं आई.
महिला ने कहा, '₹1500 से चलता है मेरा किचन'
अकोला के पुराने बालापुर नाका स्थित मारुति नगर में रहने वाली संगीता गेडाम एक गृहिणी हैं. उनके पति आरा मशीन पर मजदूरी करते हैं. संगीता बताती हैं कि योजना शुरू होने के बाद से उन्हें हर महीने ₹1500 मिल रहे हैं.
उनका कहना है कि यह राशि उनके परिवार के लिए बड़ी मदद साबित होती है. इसी पैसे से घर का राशन, रसोई का खर्च और छोटी-मोटी जरूरतें पूरी होती हैं. टीन की चादरों वाले छोटे से घर में रहने वाली संगीता कहती हैं कि इस योजना ने उनके परिवार को आर्थिक सहारा दिया है.
हालांकि, उन्होंने सरकार से एक और सवाल भी पूछा. उनका कहना है कि चुनाव के दौरान वादा किया गया था कि सहायता राशि ₹1500 से बढ़ाकर ₹2100 की जाएगी, लेकिन यह वादा अब तक पूरा नहीं हुआ.
उसी मारुति नगर की दूसरी गली में रहने वाली पूनम कौसकर की कहानी बिल्कुल अलग है. उनके पति ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं. पूनम भी कुछ महीनों तक इस योजना की लाभार्थी थीं, लेकिन पिछले तीन महीनों से उनके खाते में ₹1500 आना बंद हो गया.
पूनम बताती हैं कि उन्होंने कई बार महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यालय और बैंक के चक्कर लगाए. बैंक में कहा जाता है कि पैसा आया ही नहीं, जबकि विभाग में अलग-अलग जवाब मिलते हैं. किसी ने केवाईसी का हवाला दिया तो किसी ने कहा कि ऊपर से भुगतान ही बंद है.
पूनम कहती हैं कि उनके जैसे दिहाड़ी मजदूर परिवार के लिए ₹1500 भी बहुत बड़ी रकम है. इसी पैसे से गैस सिलेंडर भरवाया जाता था, बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी खर्च पूरे होते थे.
राखी से पहले भावुक अपील करते हुए पूनम ने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे उनकी सहायता दोबारा शुरू कराएं.
उनका कहना है कि उन्होंने केवाईसी भी कराई है, फिर भी पैसे क्यों बंद हुए, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है. पूनम का आरोप है कि चुनाव के समय योजना का खूब प्रचार किया गया, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद जरूरतमंद महिलाओं की सुध नहीं ली जा रही. उनका कहना है कि अगर सरकार वास्तव में गरीब महिलाओं की मदद करना चाहती है तो पात्र महिलाओं को योजना से बाहर नहीं किया जाना चाहिए.
महिला एवं बाल विकास विभाग का जवाब
इस पूरे मामले में जब आजतक ने अकोला के महिला एवं बाल विकास अधिकारी हनुमंत हगवाने से संपर्क किया तो उन्होंने सरकार द्वारा जारी पात्रता और अपात्रता संबंधी दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए.
इन निर्देशों के अनुसार जिन परिवारों की वार्षिक आय ढाई लाख रुपये से अधिक है, जिनके परिवार में आयकरदाता है, सरकारी या नियमित संविदा कर्मचारी हैं, पेंशनभोगी हैं, सांसद-विधायक या उनके परिवार के सदस्य हैं, अन्य सरकारी आर्थिक योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, पांच एकड़ से अधिक कृषि भूमि है या ट्रैक्टर को छोड़कर चार पहिया वाहन है, वे योजना के लिए अपात्र हैं.
सबसे बड़ा सवाल: दोनों की हालत एक जैसी, फिर एक को पैसा और दूसरी को क्यों नहीं?
ग्राउंड रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल यही सामने आया कि संगीता गेडाम और पूनम कौसकर दोनों की आर्थिक स्थिति लगभग समान है. दोनों मजदूर परिवार से हैं. किसी के पास चार पहिया वाहन नहीं है, कोई सरकारी नौकरी नहीं है और आय का बड़ा स्रोत भी नहीं है.
फिर भी एक महिला के खाते में हर महीने ₹1500 पहुंच रहे हैं, जबकि दूसरी महिला का भुगतान तीन महीने से बंद है. आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या पात्रता की जांच में कोई त्रुटि हुई है या भुगतान प्रणाली में कोई तकनीकी समस्या है? इसका स्पष्ट जवाब अब तक नहीं मिल पाया है.
राखी से पहले सरकार के सामने बड़ा सवाल
राखी का त्योहार नजदीक है. ऐसे समय में हजारों महिलाएं अपने बंद हुए भुगतान को लेकर परेशान हैं. उनका कहना है कि यह केवल ₹1500 की बात नहीं, बल्कि उनके घर के बजट और सम्मान से जुड़ा मुद्दा है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव से पहले शुरू हुई यह योजना सिर्फ वोट हासिल करने का जरिया थी, या सरकार वास्तव में जरूरतमंद महिलाओं तक इसका लाभ लगातार पहुंचाना चाहती है?
यही सवाल आज महाराष्ट्र की वे महिलाएं पूछ रही हैं, जिनके खाते में कभी हर महीने ₹1500 आते थे, लेकिन अब बिना स्पष्ट कारण के भुगतान रुक गया है. सरकार की ओर से इन महिलाओं को कब और क्या जवाब मिलता है, इस पर अब सभी की नजरें टिकी हैं.