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जिस देश से 8 साल युद्ध लड़ा ईरान, उसी मुल्क में ले जाया जाएगा खामेनेई का शव

ईरान ने अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को मुस्लिम दुनिया की एकजुटता और अपने शक्ति प्रदर्शन का जरिया बनाने की कोशिश की है. 8 जुलाई को अली खामेनेई का शव अपने देश की सरहदों को पार करते हुए उस देश में पहुंचेगा जिसके खिलाफ ईरान ने 8 साल तक लड़ाई लड़ी थी. लेकिन अब इतिहास की सच्चाइयों पर वर्तमान की हकीकत भारी पड़ रही है.

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तेहरान से गुजरता अली खामेनेई का जनाजा. (Photo: Reuters)
तेहरान से गुजरता अली खामेनेई का जनाजा. (Photo: Reuters)

इतिहास को नजरअंदाज करते हुए वर्तमान कभी-कभी ऐसे दृश्य रचता है, जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है. जिस इराक के साथ ईरान ने आठ साल तक खूनी युद्ध लड़ा, लाखों लोगों की जान गई और दोनों देशों की पीढ़ियां उस संघर्ष की कीमत चुकाती रहीं, अब उसी इराक की धरती पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के शव को ले जाने की चर्चा दुनिया भर में सुर्खियां बना रही है. 

1980 से 1988 तक चला ईरान-इराक युद्ध पश्चिम एशिया के इतिहास के सबसे विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है. 1980 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला कर दिया था इसकी सबसे बड़ी वजह 1979 की ईरानी क्रांति थी. सद्दाम को डर था कि क्रांति की विचारधारा इराक के शिया बहुल इलाकों में फैल सकती है.

ईरान की क्रांति से डरे सद्दाम हुसैन

ईरान शिया बहुल देश था और सद्दाम को इस क्रांति की चिंगारी की चिंता अपने इलाके में फैलने का डर सता रहा था. इसके अलावा दोनों देशों के बीच शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा विवाद भी लंबे समय से चल रहा था.

तब ईरान की सर्वोच्च सत्ता रुहोल्लाह खामेनेई के हाथ में थी. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वे ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने थे और देश की सेना, विदेश नीति तथा सरकार पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उन्हीं के पास था. उस समय ईरान के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति अब्दुल हसन थे, जिन्होंने फरवरी 1980 में पद संभाला था. युद्ध के शुरुआती महीनों में वे सेना के कमांडर-इन-चीफ भी थे, लेकिन 1981 में उनके और खामेनेई के बीच मतभेद बढ़ गए. इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया और वे फ्रांस निर्वासित चले गए.

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आठ वर्षों तक दोनों देशों के सैनिक मोर्चों पर लड़ते रहे. रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल आरोप लगे, शहर तबाह हुए और लगभग दस लाख लोगों की जान गई. युद्ध समाप्त तो हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास और दुश्मनी की गहरी खाई छोड़ गया. 

लेकिन चार दशक बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. सद्दाम हुसैन का शासन और जीवन दोनों ही खत्म हो चुका है और इराक की राजनीति में ईरान का प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत माना जाता है. 

आज धार्मिक शहर कोम में रस्म

मंगलवार यानी कि 7 जुलाई को खामेनेई का शव अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्मों के लिए ईरान में शिया धर्मगुरुओं के मुख्य केंद्र धार्मिक शहर 'कोम' ले जाया जाएगा. 

इसके बाद बुधवार यानी कि 8 जुलाई को  इराक के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला में रस्में होंगी, जिनमें ईरान के क्षेत्रीय शिया प्रॉक्सी नेटवर्क के प्रमुख लोग शामिल होंगे. 

तेहरान में खामेनेई के जनाजे में उमड़ी भीड़ (Photo: Reuters)

गुरुवार को एक और जुलूस के बाद उन्हें ईरान में बेहद श्रद्धा के पात्र माने जाने वाले इमाम रजा के मक़बरे के पास मशहद में दफ़नाया जाएगा. 

नजफ और कर्बला तक खामेनेई का शव ले जाने का क्या महत्व है?

बगदाद से लेकर नजफ और कर्बला तक ईरान समर्थक शिया संगठनों और राजनीतिक दलों की मजबूत मौजूदगी है. यही वजह है कि आज इराक ईरान का केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि ईरान के धार्मिक और रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र का अहम हिस्सा माना जाता है. 

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यही वजह है कि शियाओं के सबसे बड़े नेता का शव इराक के नजम और कर्बला में ले जाया जा रहा है. इराक के पवित्र शिया शहर नजफ और कर्बला दुनिया भर के शिया मुसलमानों के लिए आस्था के सबसे बड़े केंद्र हैं.

नजफ और कर्बला में शव ले जाना यह संकेत देता है कि मृत शख्सियत को शिया इतिहास, शहादत और इमामों की विरासत से जोड़ा जा रहा है. इससे अंतिम संस्कार सिर्फ निजी या राष्ट्रीय रस्म नहीं रहता, बल्कि एक व्यापक शिया-धार्मिक अनुष्ठान बन जाता है. इससे अली खामेनेई के दुनिया भर के शियाओं का नेता होने के दावे को ताकत मिलती है. 

इसका एक राजनीतिक संदेश भी है. यह कदम ईरान की शिया दुनिया में नेतृत्व-भूमिका को भी दिखाता है. साथ ही यह घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर यह संदेश देता है कि खामेनेई की विरासत सिर्फ ईरानी नहीं बल्कि पूरे शिया समुदाय से जुड़ी हुई मानी जा रही है.  

यह केवल एक शव यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति, बदलते समीकरणों और इतिहास के अप्रत्याशित मोड़ों की कहानी भी है. कभी युद्ध का मैदान रहे ईरान और इराक के रिश्ते आज इस मुकाम पर पहुंच गए हैं कि दुश्मनी की स्मृतियों के बीच धार्मिक जुड़ाव और राजनीतिक हितों ने एक नया अध्याय लिख दिया है. 
 

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