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Beat Report: TMC में बगावत के बाद अब क्या होगा? जानें स्पीकर के पास क्या हैं विकल्प

टीएमसी में दोफाड़ की चर्चाओं के बीच बड़ा सवाल उठ रहा है कि अगर विधायक टूटते हैं तो स्पीकर क्या करेंगे? जानिए दलबदल कानून, दो-तिहाई नियम और चुनाव चिह्न पर किसका फैसला चलता है.

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टीएमसी में अंदरूनी कलह के बीच गहराया महाराष्ट्र जैसा सस्पेंस. (Photo: ITG)
टीएमसी में अंदरूनी कलह के बीच गहराया महाराष्ट्र जैसा सस्पेंस. (Photo: ITG)

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान के बीच अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि अगर पार्टी में बड़ी टूट होती है, तो विधानसभा स्पीकर की भूमिका क्या होगी. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुई टूट जैसे हालात की तुलना होने लगी है. ऐसे में नजर इस बात पर है कि दलबदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर किसे मान्यता देंगे. किसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.

पूरे गणित को एकदम आसान भाषा में समझें तो तृणमूल कांग्रेस के पास सदन में कुल 80 विधायक हैं. दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई से बचने के लिए किसी भी बागी गुट को कम से कम दो-तिहाई यानी 54 विधायकों का समर्थन दिखाना होगा. यदि 54 या उससे ज्यादा विधायक अलग होते हैं, तो वे एक नया गुट बना सकते हैं या किसी दूसरी पार्टी में अपना विलय कर सकते हैं. इस स्थिति में उनकी सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती. लेकिन संख्या कम हुई, तो मामला पूरी तरह बदल सकता है.

इन सवालों की चर्चा इसलिए तेज है, क्योंकि टीएमसी में अंदरूनी खींचतान की खबरों के बीच यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगर बड़ी संख्या में विधायक अलग होते हैं, तो मामला सीधे स्पीकर के पास पहुंचेगा. ऐसे में दलबदल कानून, विधायक संख्या और चुनाव चिह्न तक का सवाल खड़ा हो सकता है.

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सबसे पहले स्पीकर क्या देखेंगे?

अगर टीएमसी के विधायक अलग गुट बनाने का दावा करते हैं, तो सबसे पहले विधानसभा स्पीकर यह देखेंगे कि उनके साथ कितने विधायक हैं. दलबदल विरोधी कानून यानी संविधान की 10वीं अनुसूची के मुताबिक, किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक अलग होते हैं, तो उन्हें तुरंत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. टीएमसी के मामले में अगर 80 विधायकों में से कम से कम 54 विधायक अलग होते हैं, तो बागी गुट खुद को अलग समूह के तौर पर पेश कर सकता है. ऐसे में स्पीकर के सामने मामला थोड़ा बदल जाता है. बागी गुट यह भी दावा कर सकता है कि वही असली विधायी दल है.

दो-तिहाई से कम हुए तो मुश्किल बढ़ेगी

अगर टूट दो-तिहाई से कम रहती है, तब मामला पूरी तरह बदल जाएगा. ऐसी स्थिति में पार्टी नेतृत्व स्पीकर के पास जाकर बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकता है. स्पीकर सुनवाई के बाद उनकी सदस्यता रद्द करने का फैसला भी ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट में वकील और कानून विशेषज्ञ फ़ुजैल खान के मुताबिक, अगर बागी गुट के पास दो-तिहाई समर्थन होता है, तो स्पीकर उन्हें अलग समूह के रूप में मान्यता दे सकते हैं. लेकिन संख्या कम हुई तो दलबदल कानून का खतरा सामने आ जाएगा.

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पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किसके पास जाएंगे?

संवैधानिक संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञ वकील आरके सिंह ने एक बड़ा अंतर साफ किया है. उनका कहना है कि स्पीकर का अधिकार क्षेत्र केवल सदन के भीतर सदस्यों की सदस्यता व नए गुटों को मान्यता देने तक ही सीमित होता है, बल्कि सदन के भीतर सिर्फ स्पीकर का फैसला चलता है. लेकिन, जब लड़ाई पार्टी के नाम तथा उसके आधिकारिक चुनाव चिन्ह 'जोड़ा घास फूल' पर दावेदारी तक पहुंचती है, तो यह मामला सीधे भारत निर्वाचन आयोग के पाले में चला जाता है. ऐसी स्थिति में स्पीकर इस विवाद को अंतिम निर्णय के लिए चुनाव आयोग को भेज सकते हैं.

दलबदल के मामलों में सबसे दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा स्पीकर के लिए फैसला सुनाने की कोई तय समय-सीमा नहीं होती. वे चाहें तो दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के नाम पर पूरी प्रक्रिया को लंबा खींच सकते हैं. महाराष्ट्र के शिवसेना और एनसीपी विवाद के दौरान ऐसा देखा भी गया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट यह साफ कर चुका है कि स्पीकर को ऐसे संवेदनशील मामलों में पूरी तरह निष्पक्ष होकर फैसला लेना होगा. इसके बावजूद अगर किसी भी पक्ष को उनका निर्णय गलत लगता है, तो वह हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है.
 

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