पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सियासी संकट लगातार गहराता दिखाई दे रहा है. फिलहाल पार्टी में खुली फूट तो नजर नहीं आ रही, लेकिन दो अलग-अलग गुट सामने आकर खुद को असली नेतृत्व का प्रतिनिधि बता रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं टीएमसी भी उसी रास्ते पर तो नहीं बढ़ रही, जिस पर पहले शिवसेना और एनसीपी जा चुकी हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ उठी बगावत के बाद क्या ममता बनर्जी पार्टी को एकजुट रख पाएंगी? बगावत करने वाले नेता यह दावा कर रहे हैं कि उनका विरोध ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ है. उनका कहना है कि ममता आज भी उनकी नेता हैं.
सुखेंदु शेखर रॉय का बड़ा दावा
इस बीच टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने दावा किया है कि विधायक दल के बाद अब पार्टी के संसदीय दल में भी दरार पड़ सकती है. उनका कहना है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में टीएमसी सांसदों के बीच असंतोष बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में इसका असर दिखाई दे सकता है.
सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि वह मानसिक रूप से अब पार्टी के साथ नहीं हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर वह अभी भी राज्यसभा सांसद हैं. उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में वह अपना रुख स्पष्ट करेंगे. साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि लोकसभा और राज्यसभा के कुछ सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं.
क्या विधानसभा वाला फॉर्मूला संसद में दोहराया जाएगा?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में जो घटनाक्रम देखने को मिला, उसका असर अब संसद में भी दिखाई दे सकता है. टीएमसी के पास लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 43 सांसद हैं. ऐसे में यदि कुछ सांसद अलग रास्ता चुनते हैं तो पार्टी के लिए नई चुनौती खड़ी हो सकती है.
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सूत्रों के मुताबिक, यदि सांसदों का एक समूह अलग होता है तो वह विधायकों के साथ मिलकर चुनाव आयोग के सामने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताने का दावा भी कर सकता है. हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया है.
नेता प्रतिपक्ष को लेकर जारी है विवाद
विवाद का एक बड़ा केंद्र ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने का मामला भी है. टीएमसी का दावा है कि ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है, इसलिए वह विधायक दल का नेतृत्व नहीं कर सकते.
दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष रूप में मान्यता दे दी है. उनका दावा है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय की चाबी भी सौंप दी गई है और वह अपना कामकाज शुरू कर चुके हैं.
स्पीकर की भूमिका पर उठ रहे सवाल
टीएमसी अब विधानसभा अध्यक्ष से यह स्पष्ट करने की मांग कर रही है कि किस कानूनी प्रावधान के तहत ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष माना गया. पार्टी का कहना है कि जब किसी नेता को संगठन से निष्कासित कर दिया गया है, तब वह 58 विधायकों के समर्थन का दावा कैसे कर सकता है.
हालांकि अब तक विधानसभा अध्यक्ष की ओर से इस पूरे मामले पर कोई विस्तृत सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की गई है. बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर लड़ाई आगे बढ़ सकती है.
टीएमसी के सामने बढ़ती चुनौती
विधायक दल में असंतोष, नेता प्रतिपक्ष को लेकर विवाद और अब संसदीय दल में संभावित टूट की चर्चा ने टीएमसी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट बनाए रखने की है.
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि असंतुष्ट नेता और सांसद किस दिशा में जाते हैं और क्या टीएमसी इस संकट को संभाल पाती है या पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है.