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विधायकों की बगावत के बाद अब सांसदों में टूट की बारी... क्या होगा ममता की 'टीम दिल्ली' का?

पश्चिम बंगाल की सियासत में सियासी तूफान खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. टीएमसी विधायकों की बागवत के बाद सांसदों के टूट पर खतरा मंडराने लगा है, क्योंकि बागी नेताओं की नजर टीएमसी के कन्ट्रोल को पूरी तरह से अपने हाथ में लेने की है.

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ममता बनर्जी का तख्तापलट करने वाले ऋतब्रत बनर्जी (Photo-ITG)
ममता बनर्जी का तख्तापलट करने वाले ऋतब्रत बनर्जी (Photo-ITG)

पश्चिम बंगाल की सियासत में  24 घंटे के भीतर ऐसा सियासी बवंडर आया कि ममता बनर्जी अपने विधायकों का समर्थन गंवा बैठी. ममता बनर्जी ने जिस बागी विधायक को टीएमसी से बाहर का रास्ता दिखाया, वो टीएमसी के विधायकों का समर्थन जुटाकर नेता प्रतिपक्ष बना गया. अब ममता के हाथ से टीएमसी के निकलने का संकट गहरा गया है, क्योंकि विधायकों की बगावत के बाद टीएमसी सांसदों पर टूट का खतरा मंडरा रहा है? 

15 सालों तक ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री रही, लेकिन सत्ता से बेदखल होते ही टीएमसी ताश के पत्ते की तरह बिखरती जा रही है. चुनाव में टीएमसी के 80 विधायक जीतकर आए, लेकिन एक महीने के भीतर ममता बनर्जी को बगावत की आग झेलनी पड़ी कि टीएमसी ही उनके हाथ से निकलती जा रही है. 

बंगाल विधानसभा में विधायकों की बगावत और दलबदल के सिलसिले के बाद, अब सियासी गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा हा. क्या अब ममता की 'टीम दिल्ली' (सांसदों) में टूट की बारी है? अगर टीएमसी विधायकों की तरह सांसद सियासी पाला बदलते हैं तो दिल्ली के सियासी अखाड़े में ममता बनर्जी की ताकत और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को एक गहरा झटका लग सकता है? 

विधायकों से शुरू हुआ सिलसिला, अब संसद तक?
सत्ता बदलते ही बंगाल में टीएमसी के भीतर असंतोष उभरकर सामने आ गया. स्थानीय स्तर पर नेताओं की नाराजगी और सियासी मतभेद ने कई विधायकों को बागी रुख अपनाने पर मजबूर किया. टीएमसी से विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर करना ममता के लिए महंगा पड़ा. इस तरह विधायक ऋतब्रत बनर्जी बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, क्योंकि उन्हें टीएमसी ने 60 विधायकों का समर्थन है. 

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सत्ताधारी भाजपा और अन्य विरोधी दलों ने इस स्थिति का पूरा फायदा उठाया. विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी विधायकों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार करते हुए विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी. ऋतब्रत ने पत्रकारों से कहा कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले दो-तिहाई विधायक एकजुट हैं और हमें 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. विधायकों की इस बगावत ने टीएमसी के भीतर एक ऐसी असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है, जिसका असर अब लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों पर भी पड़ सकता है. 

टीएमसी के सांसद भी क्या ममता का साथ छोड़ेंगे? 
टीएमसी के बागी नेता को बंगाल विधानसभा में प्रतिपक्ष का पद मिल गया और अब खतरा टीएमसी के हाथ से निकलने का है. बागियों की अगली कोशिश टीएमसी के सांसदों को तोड़ने की होगी.  टीएमसी के जिन नेताओं ने बगावत का बिगुल फूंका है, उनके निशाने पर अभिषेक बनर्जी मुख्य रूप से थे. सूत्रों की माने तो अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और कार्यशैली से कई मौजूदा सांसद खुद को असहज महसूस करते हैं. बागी नेताओं की नजर इन्हीं सांसदों पर है. 

टीएमसी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि पार्टी में अब उनकी सलाह को वह तवज्जो नहीं मिलती है.  इस तरह 'इग्नोर' किए जाने का अहसास अब सांसदों को पाला बदलने या कम से कम बगावती सुर अख्तियार करने के लिए उकसा रहा है. बागी नेताओं की नजर पार्टी का नाम और सिंबल हासिल करने की होगी. ऋतब्रत बनर्जी ने ममता को बागी चीफ एडवाइजर का पद ऑफर कर साफ कर दिया है कि उनका सियासी काफी अलग है. 

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एक सवाल ये भी है कि क्या बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह मिल सकता है, जैसी मांग उन्होंने विधानसभा स्पीकर से की है, जवाब ये है कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर बागी गुट का दावा तब मजबूत होगा, जब 80 में से 60 विधायकों की तरह लोकसभा के 28 में से 19-20  सांसद भी बागियों से हाथ मिला लें. एक तरह से बागी सांसदों के साथ आ जाएं. 

ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी टीएमसी
टीएमसी के विधायकों को समर्थन हासिल कर नेता प्रतिपक्ष बने ऋतब्रत बनर्जी की नजर टीएमसी को अपने कब्जे में लेने की है. इसके लिए लगता है ये लड़ाई महाराष्ट्र की तर्ज पर आगे लड़ने की है. अगर फैसला उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टियों की तरह से ही हुआ तो फिर अहम हो जाएगा कि किसके पास ज्यादा विधायक, सांसद और संगठन का समर्थन है,
 
तृणमूल कांग्रेस तभी ममता के हाथ से जाएगी जब विधायकों की तरह सांसद और पार्टी पदाधिकारी भी बड़े पैमाने पर बगावत कर दें . बागियों के नेता ऋतब्रत बनर्जी की ये सलाह जो उन्होंने ममता बनर्जी को दी है कि ममता चीफ एडवाइजर बन जाएं. असली तृणमूल कांग्रेस पार्टी कौन सी है? इसका जवाब ये है कि विधायक दल और सियासी दल अलग अलग होते हैं. स्पीकर सिर्फ विधायक दल को मान्यता दे सकते हैं, पर राजनीतिक दल के तौर पर टीएमसी पर कब्जे का फैसला चुनाव आयोग करता है.
 

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