क्या आप जानते हैं जब भी कोई प्लेन रनवे पर लैंड करता है तो उसके बाद उससे एक तार कनेक्ट कर दिया जाता है. कहा जाता है कि अगर ये तार कनेक्ट ना की जाए तो आग भी लग सकती है. तो समझते हैं कि आखिर ये तार किस चीज का होता है और किस वक्त इसे एयरक्राफ्ट से कनेक्ट करना जरूरी होता है.
क्या होता है वो तार?
जब भी कोई विमान रनवे पर लैंड करता है तो कुछ ही देर बाद ग्राउंड स्टाफ विमान से एक तार जोड़ देता है. पहली नजर में यह सामान्य केबल लगती है, लेकिन एविएशन की भाषा में यह अर्थिंग (Grounding/Earthing) केबल होती है.
किस वक्त लगाया जाता है?
अर्थिंग केबल हर लैंडिंग के तुरंत बाद हर विमान में नहीं लगाई जाती. इसकी सबसे ज्यादा जरूरत ईंधन भरने से पहले होती है. जब विमान पार्किंग स्टैंड पर पहुंच जाता है और उसमें फ्यूल भरना होता है, तो सबसे पहले ग्राउंड स्टाफ विमान को अर्थिंग केबल से जोड़ता है. इसके बाद ही फ्यूल पाइप जोड़ा जाता है और ईंधन भरने की प्रक्रिया शुरू होती है. कुछ एयरपोर्ट पर विमान को ग्राउंड पावर यूनिट या अन्य ग्राउंड इक्विपमेंट से जोड़ने से पहले भी सुरक्षा प्रक्रिया के तहत अर्थिंग सुनिश्चित की जाती है.
क्यों लगाया जाता है?
इसका काम विमान और जमीन के बीच विद्युत (इलेक्ट्रिकल) पोटेंशियल को बराबर करना होता है. उड़ान के दौरान विमान हवा, धूल, बादलों और वातावरण के साथ लगातार घर्षण में रहता है. इसकी वजह से विमान की बाहरी बॉडी पर स्टैटिक इलेक्ट्रिसिटी जमा हो जाती है. लैंडिंग के बाद भी यह चार्ज पूरी तरह खत्म नहीं होता. अर्थिंग केबल विमान और जमीन के बीच मौजूद विद्युत अंतर को खत्म कर देती है. इससे अतिरिक्त चार्ज सुरक्षित तरीके से जमीन में चला जाता है और स्पार्क बनने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है.
नहीं लगाए तो क्या होगा?
अगर विमान की बॉडी पर स्टैटिक चार्ज जमा है और उसी समय फ्यूल नोजल या कोई धातु का उपकरण उससे संपर्क में आता है, तो दोनों के बीच स्पार्क (चिंगारी) पैदा हो सकती है. ईंधन भरते समय विमान के आसपास जेट फ्यूल के वाष्प मौजूद रहते हैं. अगर इस दौरान चिंगारी निकल जाए तो आग लगने या विस्फोट का खतरा पैदा हो सकता है.
सामान्य परिस्थितियों में हर बार ऐसा नहीं होता, लेकिन एविएशन में छोटी-सी चूक भी बड़ा हादसा बन सकती है. इसी वजह से दुनिया भर में विमानन सुरक्षा नियमों के तहत फ्यूलिंग से पहले अर्थिंग करना एक मानक सुरक्षा प्रक्रिया मानी जाती है.