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लखनऊ बना सोलर कैपिटल: योगी सरकार में सूरज की तपिश से कैसे गरीब और अमीर को हो रहा फायदा

आज देश के कुल मासिक सोलर इंस्टॉलेशन में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है. योगी सरकार ने सौर ऊर्जा की इस मुहिम को एक थकाऊ सरकारी योजना की तरह नहीं, बल्कि एक आक्रामक 'कंज्यूमर कैंपेन' की तरह चलाया है.

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योगी सरकार सोलर पैनल सब्सिडी योजना (Photo-ITG)
योगी सरकार सोलर पैनल सब्सिडी योजना (Photo-ITG)

साल 2023 के आसपास लखनऊ में सोलर डिस्ट्रिब्यूशन की कंपनी चलाने वाले मेरे भाई के एक दोस्त ने हमें छत पर सोलर पैनल लगाने का आइडिया दिया. मेरे पिता, जो पुराने जमाने के बेहद हिसाब-किताब रखने वाले इंसान हैं, उन्होंने वही किया जो कोई भी समझदार मुखिया करता, उन्होंने तुरंत कैलकुलेटर निकाल लिया. कुल खर्च ₹2.4 लाख आ रहा था. केंद्र और राज्य सरकार की सब्सिडी को जोड़ने के बाद (जिससे कीमत घटकर करीब ₹1.4 लाख रह गई), उन्होंने हिसाब लगाया कि अगर बिजली बिल में हर महीने ₹1,500 से ₹2,000 की भी बचत होती है, तो तीन से चार साल में लागत वसूल हो जाएगी. उन्होंने दलील देते हुए कहा, "अगर तीन-चार साल में हमारी लागत निकल आती है, तब तो यह बहुत बढ़िया आइडिया है, लेकिन इसमें 10 साल नहीं लगने चाहिए, क्योंकि तब इस आइडिया का कोई मतलब नहीं रह जाएगा.'

आज हमारे बिजली के बिल पहले के मुकाबले बहुत कम हो गए हैं और हम लागत वसूलने वाले उस मुकाम के काफी करीब हैं, मेरे पिता सही थे, लेकिन जिसे हमने एक स्मार्ट पारिवारिक निवेश के तौर पर अनुभव किया, वह असल में पूरे उत्तर प्रदेश में बहुत बड़े और क्रांतिकारी स्तर पर हो रहा है.

पैनल इंस्टॉलेशन का आंकड़ा 1,02,000 पार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में, उत्तर प्रदेश ने खामोशी से रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति ला दी है. साल 2026 के मध्य तक, लखनऊ सूरत को पछाड़कर भारत की निर्विवाद 'रूफटॉप सोलर कैपिटल' बन चुका है, जहां सोलर पैनल इंस्टॉलेशन का आंकड़ा 1,02,000 को पार कर गया है. अब देश के कुल मासिक सोलर इंस्टॉलेशन में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से अधिक है, सवाल अब यह नहीं है कि यूपी सौर ऊर्जा को अपना रहा है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि बुनियादी ढांचे की कमियों और प्रशासनिक सुस्ती के लिए बदनाम रहने वाले इस राज्य ने इतना बड़ा चमत्कार आखिरकार कैसे कर दिखाया?

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इसका जवाब यहां के गवर्नेंस मॉडल में छिपा है, जिसने सोलर अपनाने की मुहिम को एक सुस्त सरकारी योजना की तरह नहीं, बल्कि एक आक्रामक और नतीजे देने वाले 'कंज्यूमर कैंपेन' की तरह चलाया. योगी सरकार ने डिसेंट्रलाइज्ड इम्प्लीमेंटेशन, सेंट्रलाइज्ड मॉनिटरिंग की रणनीति अपनाई. जमीनी स्तर पर, सक्रिय अधिकारियों ने लखनऊ को व्यावहारिक अर्थशास्त्र की एक प्रयोगशाला में बदल दिया.

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अधिकारियों ने केवल इस बात का इंतजार नहीं किया कि लोग अखबारों में सौर ऊर्जा के बारे में पढ़ें, बल्कि वे खुद उन लोगों तक पहुंचे. जब राज्य ने अनिवार्य स्मार्ट मीटर लगाने की शुरुआत की, तो अधिकारियों ने तुरंत उन्हीं घरों से संपर्क साधा ताकि उन्हें सोलर पैनल लगाने के लिए राजी किया जा सके. उन्होंने 700 से अधिक रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन्स को इस मुहिम से जोड़ा, स्कूली बच्चों को शामिल किया ताकि वे अपने माता-पिता को प्रभावित कर सकें और सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि लखनऊ नगर निगम ने सोलर पैनल लगवाने वालों को प्रॉपर्टी टैक्स में 10 प्रतिशत की छूट की पेशकश की.

इसके अलावा, राज्य सरकार ने वेंडर इकोसिस्टम की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया. IIT कानपुर जैसे संस्थानों में सेमिनार आयोजित करके और रोजाना व्हाट्सएप के जरिए वेंडर्स की ट्रैकिंग करके, यूपी ने अपने सोलर वेंडर नेटवर्क को महज 600 से बढ़ाकर 6,000 के आक्रामक स्तर पर पहुंचा दिया, ये वेंडर्स इस क्रांति के जमीनी सिपाही बन गए, जिन्होंने घर-घर जाकर लोगों के दरवाजे खटखटाए और डील्स फाइनल कीं. 

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लेकिन प्रशासनिक भाग-दौड़ भी तभी काम करती है जब उसके पीछे का गणित सही बैठ रहा हो, एक ऐसी सच्चाई जिसे मेरे पिता ने सहज रूप से समझ लिया था, 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के वित्तीय ढांचे को जब राज्य सरकार की ₹30,000 तक की अतिरिक्त सब्सिडी का साथ मिला, तो सोलर पैनल लगवाना एक बेहद फायदे का सौदा बन गया. एक 3 किलोवाट के सिस्टम के लिए सब्सिडी ही लागत के ₹1 लाख से अधिक हिस्से को कवर कर लेती है.

इसके साथ बैंक से मिलने वाले 6 प्रतिशत के रियायती लोन को जोड़ दें, तो निवेश की वसूली घटकर ठीक उतनी ही रह जाती है जितनी मेरे पिता ने भविष्यवाणी की थी, तीन से चार साल,  जो सिस्टम 25 साल तक चलता है, उसके लिहाज से यह दो दशकों तक 'मुफ्त बिजली' मिलने जैसा है. खैर, अगर 'पूरी तरह से मुफ्त' नहीं भी कहें, तो भी यह निश्चित रूप से उस व्यक्ति के मुकाबले बहुत कम खर्च है जो उतनी ही बिजली का इस्तेमाल करता है लेकिन जिसके पास ये सोलर पैनल नहीं हैं.

कैसे बदली लोगों की जिंदगी

इस फ़ायदेमंद आर्थिक पहलू ने लखनऊ में सोलर एनर्जी को आम लोगों की पहुंच में ला दिया है. अब यह सिर्फ गोमती नगर के उन अमीर वकीलों तक सीमित नहीं है जो लगभग जीरो बिजली बिल पर तीन-तीन एसी चला रहे हैं, बल्कि हजरतगंज या अमीनाबाद का वह पान वाला भी इसे अपना रहा है जिसने ₹3,000 का एक पोर्टेबल सोलर पैनल सिर्फ इसलिए खरीद लिया क्योंकि अपनी दुकान के लिए बैटरी किराये पर लेने में उसे रोज के ₹30 खर्च करने पड़ते थे. सोलर अब अमीर लोगों का कोई पर्यावरण-प्रेमी दिखने वाला 'स्टेटस सिंबल' नहीं रह गया है, बल्कि यह रोजी-रोटी कमाने और आर्थिक आजादी पाने का एक व्यावहारिक जरिया बन चुका है.

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हालांकि, यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि मिशन पूरा हो चुका है. योगी सरकार को अब उन कमियों पर ध्यान देना होगा जो अभी तक छूट गई हैं. जहां एक तरफ घरों की छतों पर सोलर पैनल तेजी से चमक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कमर्शियल क्षेत्र में इसे अपनाए जाने की रफ्तार काफी धीमी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि उत्तर प्रदेश व्यवसायों के लिए 'नेट फीड सिस्टम' का इस्तेमाल करता है, न कि घरों को मिलने वाला फायदेमंद 'नेट मीटरिंग' सिस्टम. इसकी वजह से दुकानों और फैक्ट्रियों के लिए सोलर पैनल लगवाना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदे का सौदा नहीं रह जाता.

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इसके अलावा, इसमें भौगोलिक स्तर पर भी एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है, जहां लखनऊ में एक लाख से अधिक सोलर पैनल लग चुके हैं, वहीं श्रावस्ती जैसे जिलों में यह आंकड़ा एक हजार से भी कम है. लखनऊ का यह मॉडल शहरी आबादी के घनत्व और वेंडर्स के मजबूत नेटवर्क पर टिका है, जो फिलहाल राज्य के गरीब और ग्रामीण इलाकों में मौजूद नहीं है.

इन चुनौतियों के बावजूद, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सौर ऊर्जा की इस रफ्तार को नकारा नहीं जा सकता. केंद्र सरकार की सब्सिडी और स्थानीय स्तर पर इसके जबर्दस्त क्रियान्वयन के बेहतरीन तालमेल से, राज्य ने अपनी शासन व्यवस्था की पूरी परिभाषा ही बदल दी है. इसने साबित कर दिया है कि जब सरकारी नीतियां एक आम आदमी के व्यावहारिक गणित से मेल खाती हैं, तो यूपी की तपती धूप को भी ग्रिड से जोड़कर एक खामोश और चमकती हुई क्रांति लाई जा सकती है.

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