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'यूपी में पंचायत चुनाव कब?', देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, निर्वाचन आयोग से पूछी तारीख

उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को ही समाप्त हो चुका है. प्रदेश सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर मौजूदा प्रधानों को ही पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक नियुक्त कर दिया था. सरकार के इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है.

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हाईकोर्ट में 10 जुलाई को होगी अगली सुनवाई (File Photo: ITG)
हाईकोर्ट में 10 जुलाई को होगी अगली सुनवाई (File Photo: ITG)

उत्तर प्रदेश में 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों के मुखिया यानी ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को ही समाप्त हो चुका है. प्रदेश सरकार ने 25 मई को ही एक नोटिफिकेशन जारी कर मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक नियुक्त कर दिया था. बतौर प्रशासक मौजूदा ग्राम प्रधानों की नियुक्ति अधिकतम छह महीने के लिए प्रभावी होगी. यह मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैं.

ग्राम प्रधानों की बतौर प्रशासक नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब सख्त रुख अख्तियार कर लिया है. जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने पंचायत चुनाव में देरी पर नाराजगी जताते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से तल्ख सवाल किए हैं. हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा है कि पंचायत चुनाव कब तक कराए जाएंगे, इसकी संभावित तारीख बताई जाए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को भी यह निर्देश दिया है कि 10 जुलाई को पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) की रिपोर्ट पेश की जाए. हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग से भी 10 जुलाई को ही पंचायत चुनाव के लिए संभावित तारीख बताने को कहा है. याचिकाकर्ता ओमप्रकाश प्रजापति की ओर से कोर्ट में यह दलील दी गई कि पंचायत राज अधिनियम के मुताबिक ग्राम प्रधान का कार्यकाल अधिकतम पांच वर्ष का होता है.

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याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि समय पर चुनाव नहीं कराकर प्रधानों को प्रशासक बनाया जाना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा है, जो नियमों के खिलाफ है. सरकार की ओर से यह कहा गया कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए गठित आयोग को रिपोर्ट देने में तीन से छह माह लग सकते हैं. हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि रिपोर्ट जल्द दी जाए.

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याचिकाकर्ता के वकील ने यह दलील दी कि पहले पंचायत चुनाव में देरी होने की स्थिति में एडीओ पंचायत या बीडीओ को प्रशासक बनाया जाता था. साल 2021 और 2000 में भी पंचायत चुनाव देर से हुए थे, तब अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया गया था. इस बार सरकार ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर ग्राम प्रधानों को ही प्रशासकीय जिम्मेदारी देने का फैसला किया.

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सरकार का तर्क है कि ग्राम प्रधान गांवों में विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और चुनावी प्रबंधन की अहम कड़ी होते हैं. विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधान की भूमिका को देखते हुए उनको ही प्रशासक बनाने का निर्णय लिया गया. प्रधान संगठन ने भी सरकार से यह मांग की थी कि जिम्मेदारी प्रशासनिक समिति या प्रधानों को ही दी जाए. इस मामले पर अगली सुनवाई अब 10 जुलाई को होगी.

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