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भव्य मेहराबें, शानदार नक्काशी... 1645 में बने संभल के किले की बदली तस्वीर, 29 लाख का आया खर्च

कभी इसकी टूटी दीवारें बीते दौर की बेबसी बयां करती थीं, तो कभी जर्जर दरवाजा अपनी खोई हुई शान पर खामोश आंसू बहाता था. लेकिन अब वक्त ने करवट ली है. संभल का 400 साल पुराना सौंधन किला फिर से अपनी उसी राजसी ठाठ के साथ खड़ा है. 29 लाख रुपये की लागत से संवारा गया यह ऐतिहासिक किला अब न सिर्फ पर्यटकों को आकर्षित करेगा, बल्कि इसकी भव्य मेहराबों के बीच प्री-वेडिंग शूट और शॉर्ट फिल्में भी शूट हो सकेंगी.

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1936 में पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया था संभल का किला. (Photo: ITG)
1936 में पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में लिया था संभल का किला. (Photo: ITG)

उत्तर प्रदेश का संभल जिला अब अपनी ऐतिहासिक विरासत को नए अंदाज में दुनिया के सामने पेश कर रहा है. यहां के तीर्थ, प्राचीन कूप और ऐतिहासिक धरोहरें फिर से जीवंत हो रही हैं. इसी कड़ी में मोहम्मदपुर सौंधन स्थित लगभग 400 वर्ष पुराने एएसआई संरक्षित किले की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. 

कभी इसकी दीवारों पर वक्त की धूल जमी थी. मेहराबों में खामोशी का डेरा था. टूटा हुआ दरवाजा मानो आने-जाने वालों से अपनी पुरानी शान की कहानी कहता था. सदियों तक इतिहास की परतों में दबा यह किला अब फिर दमक उठा है. 

जनवरी 2025 की एक सुबह संभल प्रशासन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम इस किले तक पहुंची. जो नजारा सामने था, वह अब से बहुत अलग था. मुख्य द्वार टूट चुका था. दीवारों पर समय के घाव साफ दिख रहे थे. किले के भीतर अवैध कब्जों ने जगह बना ली थी. कहीं गोबर सूख रहा था, तो कहीं कंडों के ढेर लगे थे. तभी तय हुआ कि इस धरोहर को मिटने नहीं दिया जाएगा. पुरातत्व विभाग ने इसे संवारने की तैयारी की.

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किले को नया जीवन देने के लिए राजस्थान और झांसी से विशेष कारीगर बुलाए गए. उनका काम सिर्फ पत्थर जोड़ना नहीं था, बल्कि सदियों पुरानी आत्मा को फिर से जागृत करना था. इस कार्य में आधुनिक निर्माण सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया. इसकी बजाय पारंपरिक मिश्रण- डस्ट, चूना, सुर्खी, बेलगिरी और गुड़ का उपयोग किया गया. 

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यही वह तकनीक है, जिससे सदियों पहले भारत की भव्य इमारतें तैयार होती थीं. करीब एक साल की मेहनत और 29 लाख रुपये की लागत के बाद फरवरी 2026 में किले का मुख्य द्वार फिर से उसी शान के साथ खड़ा हो गया. अब यह द्वार फिर से उसी शान के साथ खड़ा है, जैसी शायद 17वीं शताब्दी में हुआ करता था.

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आज जब आप इस किले के सामने खड़े होते हैं, तो विशाल मेहराबें, सजी हुई नक्काशी और मजबूत पहरेदार कक्ष- हर पत्थर अपनी कहानी कहता है. मेहराब वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह दरवाजों, खिड़कियों या गलियारों के ऊपर बनी हुई घुमावदार या अर्धवृत्ताकार संरचना होती है. 1645 में बना यह किला अब फिर से अपने गौरवशाली अतीत की झलक दिखा रहा है. 

3600 वर्ग मीटर जमीन होगी कब्जामुक्त

किला लगभग 3600 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. फिलहाल मुख्य प्रवेश द्वार और पहरेदार कक्ष का जीर्णोद्धार किया गया है. अब प्रशासन का लक्ष्य है कि किले के अंदर बने अवैध मकानों और पशुबाड़ों को हटाया जाए. जिन लोगों ने यहां मकान बनाए हैं, उन्हें दूसरी जगह बसाने की योजना बनाई जा रही है.

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डीएम डॉ. राजेंद्र पेंसिया और एसपी ने हाल ही में पहरेदार कक्ष की ऊंचाई से पूरे परिसर का निरीक्षण किया. ऊपर से साफ दिखाई दे रहा था कि 3600 वर्ग मीटर में फैले इस ऐतिहासिक परिसर को अभी पूरी तरह मुक्त कराना बाकी है. प्रशासन ने साफ कर दिया है कि किले की ऐतिहासिकता लौटाने के लिए अवैध कब्जे हटाए जाएंगे.

1645 में बना था यह ऐतिहासिक किला

इतिहासकारों के अनुसार, मोहम्मदपुर सौंधन का यह किला वर्ष 1645 में बनवाया गया था. यह सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उस दौर की वास्तुकला, संस्कृति और सामरिक महत्व का प्रतीक है. 1936 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपने संरक्षण में लिया था. बावजूद इसके, समय के साथ यह उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार होता चला गया.

यह किला अब सिर्फ पुरानी यादों का संग्रहालय नहीं रहेगा. संभल प्रशासन ने इसे पर्यटन के नए केंद्र के रूप में विकसित करने का फैसला किया है. कल्पना कीजिए- शाम की सुनहरी रोशनी, ऐतिहासिक मेहराबें, पारंपरिक परिधान और कैमरे की चमक... यहां प्री-वेडिंग शूट हो सकते हैं. शॉर्ट फिल्में शूट हो सकती हैं. जो स्थान कभी वीरान था, वह अब खुशियों का मंच बनेगा.

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प्रशासन यहां गार्डन विकसित करेगा, आकर्षक लाइटिंग लगाई जाएगी और सीसीटीवी कैमरे लगेंगे. इतिहास प्रेमियों, फोटोग्राफरों, फिल्म निर्माताओं और पर्यटकों के लिए यह जगह शानदार है. स्थानीय ग्रामीण भी इस बदलाव से बेहद खुश हैं. उनका कहना है कि उन्होंने पहली बार किले को इतनी शानदार हालत में देखा है.

जिलाधिकारी बोले- एक और स्मारक हो रहा है तैयार

डीएम डॉ. राजेंद्र पेंसिया ने बताया कि हम पहली बार 5 जनवरी 2025 को किले के प्रवेश द्वार और ऊपरी हिस्से में गए थे. इसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग को पत्र लिखा गया और मेरठ के अधिकारियों से संपर्क किया गया. जून 2025 से इसके लिए संवारने का काम शुरू हुआ. फरवरी 2026 में इस किले का कार्य पूर्ण हुआ है.

कुल 29 लाख का खर्चा आया है. डीएम ने बताया कि संभल ऐसा स्थान है, जहां पर कुल 9 पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारक हैं, जिसमें एक विवादित स्थल है और आठ आविवादित स्थल हैं. एक और पुरातत्व विभाग का संरक्षित स्मारक तैयार हो रहा है.

सदियों की खामोशी के बाद सौंधन किला फिर चमकने लगा है. इसकी दीवारें फिर कहानियां सुनाएंगी. इसके आंगन में फिर रौनक होगी. इतिहास जब संवरता है, तो वह सिर्फ अतीत को नहीं बचाता- वह भविष्य को भी सुंदर बना देता है.

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