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न मूर्ति, न कोई प्रतिमा... इस मंदिर में पालने में विराजती हैं मां अलोप शंकरी, नवरात्रि में उमड़ते हैं भक्त

प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित मां अलोप शंकरी मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है. यहां माता की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि दिव्य पालने की पूजा होती है. मान्यता है कि यहां माता सती के हाथ का पंजा गिरकर अदृश्य हो गया था. वहीं, लोगों का मान्यता है कि मनोकामना पूरी होने पर भक्त पवित्र कुंड में दूध, दही और मेवे चढ़ाते हैं.

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मनोकामना पूरी होने पर कुंड में चढ़ाते हैं दूध-दही और मेवे.(Photo: Pankaj Srivastava/ITG)
मनोकामना पूरी होने पर कुंड में चढ़ाते हैं दूध-दही और मेवे.(Photo: Pankaj Srivastava/ITG)

प्रयागराज को तीर्थराज के साथ-साथ आस्था और श्रद्धा की नगरी भी कहा जाता है. यहां स्थित मां अलोप शंकरी देवी मंदिर की मान्यता देश के 51 शक्तिपीठों में होती है. इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां माता की कोई मूर्ति या प्रतिमा नहीं है, बल्कि गर्भगृह में विराजमान दिव्य पालने की पूजा की जाती है. मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में मांगी गई मुराद पूरी होती है. यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

प्रयागराज के अलोपीबाग में स्थित इस मंदिर का धार्मिक महत्व सदियों पुराना माना जाता है. पौराणिक कथा के मुताबिक, माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने से व्यथित होकर योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे. इसके बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. सृष्टि को इस स्थिति से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग अलग किए.

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धार्मिक मान्यता है कि माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. माना जाता है कि प्रयागराज के इसी स्थान पर माता सती के हाथ का पंजा गिरा था, जो यहां आकर अदृश्य यानी अलोप हो गया. इसी मान्यता के चलते इस धाम का नाम मां अलोप शंकरी पड़ा. भक्त इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में पूजते हैं और यहां पहुंचकर माता का आशीर्वाद लेते हैं.

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प्रयागराज​

न मूर्ति, न प्रतिमा, पालने की होती है पूजा

मां अलोप शंकरी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यहां स्थापित दिव्य पालने से जुड़ी है. मंदिर के गर्भगृह में माता की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है. श्रद्धालु पालने के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं मां के सामने रखते हैं. भक्तों का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा से की गई प्रार्थना मां तक जरूर पहुंचती है.

मंदिर परिसर में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के अलावा काल भैरव, मां शीतला और भगवान हनुमान के भी दर्शन किए जा सकते हैं. इस वजह से यहां आने वाले श्रद्धालु पालने में विराजमान मां अलोप शंकरी की पूजा के साथ अन्य देवी-देवताओं का आशीर्वाद भी लेते हैं. नवरात्रि के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है और दूर-दराज से लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

मनोकामना पूरी होने पर कुंड में चढ़ाते हैं दूध-दही और मेवे

मंदिर परिसर में एक पवित्र कुंड भी स्थित है. मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी हो जाती है, वे इस कुंड को दूध, दही और मेवों से भरवाकर माता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं. यह परंपरा भक्तों की आस्था और विश्वास से जुड़ी हुई है. यहां लोग अपनी मुराद पूरी होने पर विशेष पूजा-अर्चना भी करते हैं.

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प्रयागराज​

नई शादी के बाद नवदंपती मां के दरबार में वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचते हैं. वहीं, परिवार में पहली संतान के जन्म के बाद बच्चे का मुंडन संस्कार कराने की भी परंपरा है. नवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु मां के पालने के दर्शन करते हैं और चुनरी, नारियल, फूल तथा फल अर्पित कर आशीर्वाद मांगते हैं.

नवरात्रि में उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु

मां अलोप शंकरी मंदिर श्रद्धा, विश्वास और धार्मिक मान्यताओं का प्रमुख केंद्र है. भक्तों का मानना है कि जो भी व्यक्ति अटूट विश्वास के साथ यहां अपनी प्रार्थना लेकर आता है, मां उसकी मनोकामना पूरी करती हैं. इसी आस्था के कारण सामान्य दिनों में भी यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं, जबकि नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर में विशेष रौनक रहती है.

नवरात्रि के दौरान हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए आते हैं. भक्त पालने की पूजा करते हैं, चुनरी और नारियल चढ़ाते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. मां अलोप शंकरी के इस अनोखे धाम की विशेषता यही है कि यहां माता के दिव्य स्वरूप के रूप में पालने की पूजा होती है और इसी परंपरा से मंदिर की अलग पहचान बनी हुई है.
 

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