
जिंदगी कभी-कभी ऐसा घाव दे जाती है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल हो जाता है. कानपुर के दो घरों में ऐसा ही दर्द पसरा था. घर के आंगन में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे को चीरती माताओं की चीखें हर किसी की आंखें नम कर रही थीं. लखनऊ के भीषण अग्निकांड में जान गंवाने वाले संयम विज और सूरजभान सिंह के शव जब उनके घर पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे पूरे मोहल्ले का दिल एक साथ टूट गया हो.
गली में लोगों की भीड़ थी, लेकिन किसी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे. हर चेहरा गम में डूबा था. हर आंख नम थी. हर व्यक्ति बस यही सोच रहा था कि सुबह तक जिन बेटों के लौटने का इंतजार था, अब वे सफेद कपड़े में ढंककर घर क्यों लौटे हैं. जैसे ही दोनों का शव उनके मोहल्ले में पहुंचा, वहां मौजूद लोगों की सांसें थम सी गईं. परिवार के लोग दरवाजे पर खड़े थे. किसी को उम्मीद नहीं थी कि जिस बेटे के फोन का इंतजार हो रहा था, वह अब हमेशा के लिए खामोश होकर लौटेगा.
संयम का शव घर पहुंचा तो मां बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ीं. बहन की आंखों से आंसुओं की धार रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रिश्तेदार और पड़ोसी उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मां बार-बार एक ही बात दोहरा रही थीं हे भगवान... ये क्या कर दिया... मेरा बच्चा मुझे वापस कर दो... उधर सूरजभान के घर का दृश्य भी कम दर्दनाक नहीं था. जिस मां ने बेटे के घर लौटने की राह देखी थी, उसे जब सच्चाई पता चली तो घर में चीखें गूंज उठीं. कुछ देर तक किसी को समझ नहीं आया कि उन्हें कैसे संभाला जाए.
तेरहवीं वाले दिन उठी पोते की अर्थी
संयम विज के परिवार के लिए यह दुख शायद और भी बड़ा था. कुछ दिन पहले ही उनकी दादी का निधन हुआ था. मंगलवार को घर में उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम होना था. परिवार उसी की तैयारियों में लगा था. लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था. जिस दिन परिवार दादी की आत्मा की शांति के लिए पूजा की तैयारी कर रहा था, उसी दिन घर के युवा बेटे की अर्थी सजानी पड़ गई. परिजन बताते हैं कि एक दिन पहले तक घर में तेरहवीं की चर्चा थी, लेकिन शाम होते-होते अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई. एक ही परिवार में कुछ दिनों के भीतर दूसरी मौत ने हर किसी को अंदर तक तोड़ दिया.
मेरे लाल को मत ले जाओ...
जब अंतिम यात्रा शुरू होने का समय आया तो माहौल और भी भावुक हो गया. परिजन संयम के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने लगे. तभी मां अचानक अर्थी से लिपट गईं. उन्होंने बेटे के चेहरे को आखिरी बार देखा और फिर जोर-जोर से रोते हुए चिल्लाने लगीं कि मेरे लाल को मत ले जाओ... आ जाओ वापस... एक बार आंख खोल लो बेटा... मां की यह चीख सुनकर वहां मौजूद लोगों की आंखों से भी आंसू बह निकले. कई पुरुष, जो अब तक खुद को संभाले हुए थे, अपने आंसू नहीं रोक सके. महिलाएं रो रही थीं. बच्चे सहमे हुए थे. बुजुर्गों के चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दे रहा था. शायद ही वहां ऐसा कोई व्यक्ति रहा हो जिसकी आंखें नम न हुई हों.

हर रविवार घर आता था सूरजभान
25 वर्षीय सूरजभान सिंह नौकरी के सिलसिले में लखनऊ में रहते थे. उनकी जिंदगी का एक नियम था. हर सप्ताह काम खत्म होने के बाद वह घर जरूर आते थे. मां को इंतजार रहता था कि बेटा कब दरवाजे से अंदर आएगा. इस बार भी वह रविवार को घर से निकले थे. किसी ने नहीं सोचा था कि यह सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगा. सूरजभान के पिता पहले ही इस दुनिया से जा चुके हैं. घर में मां और छोटा भाई ही उनका सहारा थे. परिवार की उम्मीदें उन्हीं से जुड़ी थीं. लेकिन एक हादसे ने सब कुछ खत्म कर दिया.
भाई को फोन आया और दुनिया बदल गई
घटना के समय सूरजभान का छोटा भाई ऋषिकेश में था. उसे अचानक फोन पर हादसे की जानकारी मिली. पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ. लेकिन कुछ देर बाद सच्चाई सामने आ गई. वह तुरंत वापस लौटा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. जिस भाई के साथ उसने बचपन बिताया था, अब उसकी यादें ही बची थीं. संयम और सूरजभान सिर्फ सहकर्मी नहीं थे. दोनों एक ही एनीमेशन स्टूडियो में काम करते थे और समय के साथ उनकी दोस्ती गहरी हो गई थी. साथ काम करना, साथ सपने देखना और करियर में आगे बढ़ने की बातें करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. किसी ने नहीं सोचा था कि दोनों दोस्तों की अंतिम यात्रा भी लगभग साथ निकलेगी. मोहल्ले के लोग कहते हैं कि दोनों का स्वभाव बेहद मिलनसार था. वे हमेशा मुस्कुराकर बात करते थे और जरूरतमंदों की मदद के लिए तैयार रहते थे.
शादी के सपने भी अधूरे रह गए
संयम के परिवार ने बेटे के लिए कई सपने देख रखे थे. करियर अच्छा चल रहा था. घर वाले उसके विवाह की बात भी आगे बढ़ा रहे थे. रिश्तों पर चर्चा शुरू हो चुकी थी. मां चाहती थीं कि जल्द घर में बहू आए. लेकिन अब घर में शहनाई की जगह सिसकियां सुनाई दे रही हैं. जो मां बेटे की शादी की तैयारियों के सपने देख रही थी, उसे अब उसकी तस्वीर के सामने दीपक जलाना पड़ रहा है.
संयम के मामा की आंखों में भी दर्द के साथ गुस्सा दिखाई दिया. उन्होंने बताया कि जिस इमारत में दोनों काम करते थे, वहां ऑटोमैटिक सेंसर गेट लगे हुए थे. आग लगने के दौरान ये गेट समय पर नहीं खुले. अंदर मौजूद लोग बाहर निकलने के लिए संघर्ष करते रहे. धुआं तेजी से फैलता गया. लोग मदद के लिए पुकारते रहे. लेकिन कई लोग बाहर नहीं निकल सके. परिजनों का मानना है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होती और गेट समय पर खुल जाता तो शायद कई परिवार आज उजड़ने से बच जाते.
पूरे मोहल्ले ने दी नम आंखों से विदाई
अंतिम यात्रा के दौरान सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए. किसी ने फूल चढ़ाए. किसी ने हाथ जोड़कर अंतिम प्रणाम किया. कई लोग सिर्फ चुपचाप खड़े रहे. क्योंकि ऐसे दुख में शब्द अक्सर छोटे पड़ जाते हैं. जब अर्थी आगे बढ़ रही थी तो पीछे से रोने की आवाजें लगातार सुनाई दे रही थीं. हर किसी के मन में एक ही सवाल था कि आखिर उन परिवारों का क्या कसूर था, जिन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया, बड़ा किया और अच्छे भविष्य का सपना देखा?