सरकारी स्कूल का निरीक्षण आमतौर पर कक्षाओं, व्यवस्थाओं और रिकॉर्ड की जांच तक सीमित रहता है. लेकिन फर्रुखाबाद के राजकीय मूक-बधिर विद्यालय में नजारा कुछ अलग था. जिलाधिकारी अंकुर लाठर निरीक्षण के लिए पहुंचीं तो कुछ देर बच्चों के बीच बैठीं, उनकी पढ़ाई और दिनचर्या के बारे में जाना और फिर खुद उनके साथ क्रिकेट खेलने मैदान में उतर गईं.
डीएम के हाथ में बल्ला देखकर बच्चों का उत्साह देखते ही बन रहा था. कुछ देर पहले तक जहां कक्षा में पढ़ाई और बातचीत चल रही थी, वहीं इसके बाद मैदान में क्रिकेट शुरू हो गया. बच्चों के लिए यह किसी रोजमर्रा के स्कूल के दिन जैसा नहीं था.
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने स्कूल की व्यवस्थाओं का जायजा लिया. उन्होंने बच्चों से उनकी पढ़ाई, दिनचर्या और स्कूल में मिलने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की. मूक-बधिर बच्चों के साथ सामान्य बातचीत का तरीका अलग होता है. ऐसे में इशारों, संकेतों और चेहरे के भावों के जरिए संवाद किया गया. डीएम ने बच्चों के साथ समय बिताते हुए उनकी बात समझने की कोशिश की. बच्चों के बीच कुछ समय बिताने के बाद उन्होंने कक्षा में पढ़ाने की भूमिका भी निभाई. उन्होंने बच्चों को पढ़ाया और पढ़ाई से जुड़े सवाल-जवाब किए. इस दौरान स्कूल के शिक्षक भी मौजूद रहे.
फिर अचानक क्रिकेट खेलने पहुंचीं डीएम
कक्षा में समय बिताने के बाद माहौल उस समय बदल गया जब जिलाधिकारी बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने के लिए पहुंचीं. बच्चों के लिए शायद यह सबसे खास पल था. डीएम ने बल्ला हाथ में लिया और बच्चों के साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया. मैदान में मौजूद बच्चे उत्साहित नजर आए. किसी सरकारी अधिकारी को इस तरह अपने बीच खेलते देखना उनके लिए सामान्य अनुभव नहीं था. यही वजह रही कि क्रिकेट शुरू होते ही बच्चों का उत्साह बढ़ गया. किसी ने ताली बजाई तो कोई मुस्कुराता हुआ नजर आया. खेल के दौरान इशारों में एक-दूसरे को समझाने और उत्साह बढ़ाने का सिलसिला भी चलता रहा.
यहां शब्द कम, इशारे ज्यादा काम आए
मूक-बधिर बच्चों के साथ संवाद का माध्यम अलग होता है. इस मुलाकात में भी बातचीत केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही. चेहरे की मुस्कान, हाथों के इशारे और खेल के दौरान होने वाली छोटी-छोटी प्रतिक्रियाएं ही बच्चों और जिलाधिकारी के बीच संवाद का माध्यम बनीं. क्रिकेट के दौरान यह बात और साफ नजर आई. गेंद आई तो बच्चे संकेतों से बताते दिखे, किसी अच्छे शॉट पर खुशी जताई और खेल में अपनी बारी का इंतजार भी करते रहे. डीएम भी बच्चों के साथ उसी सहजता से जुड़ती नजर आईं.
पढ़ाई के साथ खेल भी जरूरी
डीएम का कहना है कि स्कूल में पढ़ाई के साथ खेल और बच्चों की अन्य गतिविधियां भी उनके विकास का हिस्सा हैं. मूक-बधिर बच्चों के लिए खेल का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि खेल के जरिए वे बिना बोले भी एक-दूसरे के साथ सहजता से जुड़ सकते हैं. क्रिकेट के दौरान बच्चों में टीम भावना, एक-दूसरे को समझने और साथ खेलने का भाव दिखाई दिया.
डीएम ने बच्चों को समझने की कोशिश की
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने केवल स्कूल की व्यवस्था देखने के बजाय बच्चों के अनुभव को भी समझने की कोशिश की. उनकी पढ़ाई कैसी चल रही है, स्कूल में उनका दिन किस तरह गुजरता है और उन्हें किन चीजों की जरूरत होती है, इन पहलुओं को जानने का प्रयास किया गया. विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए केवल सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होता. उनके साथ संवाद और उनकी जरूरत को समझना भी जरूरी है. इसी वजह से बच्चों के बीच बैठकर समय बिताने और उनसे उनकी सहज भाषा में जुड़ने का यह प्रयास खास रहा.