राम मंदिर दान चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में पाया कि सभी छह आरोपी अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे और रमाशंकर मिश्रा ट्रस्ट के पदाधिकारियों की सिफारिश पर भर्ती हुए थे.
इन सभी को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की आउटसोर्स एजेंसी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज के जरिए दान गणना स्टाफ में शामिल किया गया था. यह नियुक्तियां ट्रस्ट और एसबीआई द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए परिचालन दिशानिर्देशों की भावना के बिल्कुल विपरीत थीं. एसआईटी के मुताबिक नियमों की कमी नहीं थी, बल्कि स्थापित सुरक्षा प्रक्रियाओं को सही ढंग से लागू करने में विफलता के कारण यह चोरी हुई.
चाचा की रसूखदार सिफारिश पर मिला प्रवेश
एसआईटी की रिपोर्ट में विशेष रूप से आरोपी मनीष कुमार यादव की नियुक्ति का जिक्र है. मनीष की सिफारिश उसके चाचा रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू ने की थी, जिसका दान गणना प्रक्रिया पर काफी प्रभाव था. टिन्नू के निर्देश पर ही मनीष ने एसबीआई कर्मचारी रत्नेश चतुर्वेदी को दस्तावेज सौंपे और 15 अप्रैल 2026 को काउंटिंग रूम में एंट्री पाई.
सीसीटीवी फुटेज ने खोली चोरी की पोल
काउंटिंग रूम में एंट्री पाने के बाद आरोपी मनीष कुमार यादव की करतूतें ज्यादा दिन नहीं छिप सकीं. एसआईटी के अनुसार, 11 मई 2026 के बाद के सीसीटीवी फुटेज में मनीष को बार-बार दान के पैसे चुराते हुए साफ तौर पर देखा गया. इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए.
पहले से तय कड़े नियम किए गए नजरअंदाज
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और एसबीआई के बीच दान के प्रबंधन को लेकर बकायदा एमओयू (MoU) और एसओपी (SOP) तैयार थे. तत्कालीन एसबीआई शाखा प्रबंधक गोविंद मिश्रा और ट्रस्ट प्रतिनिधि डॉ. अनिल मिश्रा द्वारा हस्ताक्षरित इन नियमों के तहत बायोमेट्रिक हाजिरी, विशेष वर्दी, तलाशी और सीसीटीवी निगरानी अनिवार्य थी.
जांच में खुली सुरक्षा दावों की कलई
एसआईटी ने पाया कि फरवरी 2025 के एसओपी के तहत गणना कर्मियों की नियमित और औचक तलाशी (फ्रिस्किंग) का नियम था. पारदर्शिता बनाए रखने की जिम्मेदारी ट्रस्ट की होने के बावजूद, इन सुरक्षात्मक उपायों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया या बेहद खराब तरीके से लागू किया गया, जिससे आरोपियों को चोरी का मौका मिला.