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इंडियंस के मुकाबले अमेरिकन इतने कॉन्फिडेंट होकर क्यों बोलते हैं? भारतीय महिला ने बताया

इंडियंस के मुकाबले अमेरिकन इतने कॉन्फिडेंट क्यों होते हैं? भारतीय महिला ने बताई वजह. ऑफिस मीटिंग में जहां भारतीय अपनी बात रखने से झिझकते हैं, वहीं अमेरिकन बिना पूरी तरह आश्वस्त हुए भी अपनी राय खुलकर रखते हैं.

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हरिणी के मुताबिक, वर्कप्लेस में विचारों पर बातचीत होती है (Photo: Instagram/harini_nagireddi)
हरिणी के मुताबिक, वर्कप्लेस में विचारों पर बातचीत होती है (Photo: Instagram/harini_nagireddi)

अमेरिका में काम कर रहीं भारतीय प्रोफेशनल हरिणी ने दफ्तर के माहौल को लेकर अपना अनुभव शेयर किया है. उन्होंने बताया कि अमेरिका आने के बाद उन्हें कॉन्फिडेंट को लेकर अपनी सोच बदलनी पड़ी. पहले उन्हें लगता था कि मीटिंग में तभी बोलना चाहिए, जब उन्हें किसी सवाल का पूरा और सही जवाब पता हो. लेकिन अपने अमेरिकी कलिग को देखकर उन्हें समझ आया कि आत्मविश्वास का मतलब हर बात का जवाब जानना नहीं है.

हरिणी ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो में बताया कि उनके ऑफिस में वह इकलौती भारतीय थीं. शुरुआत में उन्हें लगता था कि उनके अमेरिकी सहकर्मी शायद उनसे ज्यादा जानते हैं. इसकी वजह यह थी कि वे मीटिंग में काफी आसानी से अपनी बात रख देते थे और सवालों पर खुलकर बोलते थे.लेकिन कुछ समय बाद हरिणी को महसूस हुआ कि असली फर्क जानकारी का नहीं, बल्कि अपनी बात रखने के तरीके का था.

अमेरिकी सहकर्मी बिना पूरी जानकारी के भी बोलते थे

हरिणी के मुताबिक, उनके सहकर्मी किसी मुद्दे पर पूरी जानकारी होने का इंतजार नहीं करते थे. अगर उनके मन में कोई विचार आता था तो वे उसे मीटिंग में रख देते थे. उन्हें यह डर नहीं रहता था कि उनकी बात पूरी तरह सही है या नहीं.इसके उलट हरिणी खुद तब तक चुप रहती थीं, जब तक उन्हें अपनी बात पर पूरा भरोसा न हो जाए. उन्हें लगता था कि पहले जवाब को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए और फिर ही उसे दूसरों के सामने रखना चाहिए.धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि इसी वजह से वह कई बार मीटिंग में अपनी बात रखने का मौका गंवा देती थीं.

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भारत में सीखी आदत अमेरिका में बनी रुकावट

हरिणी ने बताया कि भारत में पढ़ाई के दौरान उन्हें सही जवाब देने पर काफी जोर दिया गया. बचपन से ही उन्हें यह आदत रही कि बोलने से पहले अच्छी तरह सोचो और तभी जवाब दो, जब तुम्हें पूरा यकीन हो.स्कूल में यह तरीका उनके लिए काम करता था, क्योंकि वहां सही जवाब देना सबसे जरूरी था. लेकिन नौकरी और मीटिंग के माहौल में हर बात का बिल्कुल सही जवाब पहले से तैयार होना जरूरी नहीं होता.

हरिणी के मुताबिक, वर्कप्लेस में विचारों पर बातचीत होती है. अगर कोई व्यक्ति अपनी बात सिर्फ इसलिए नहीं रखता क्योंकि उसे लगता है कि वह अभी पूरी तरह तैयार नहीं है, तो संभव है कि बातचीत आगे बढ़ जाए और कोई दूसरा व्यक्ति वही बात पहले कह दे.

आत्मविश्वास जन्म से नहीं, सीखा भी जा सकता है

हरिणी ने बताया कि पहले वह मानती थीं कि आत्मविश्वास किसी व्यक्ति में जन्म से होता है. यानी कोई व्यक्ति स्वभाव से आत्मविश्वासी है तो है, वरना नहीं.लेकिन अमेरिका में काम करने के अनुभव ने उनकी सोच बदल दी. अब उनका मानना है कि आत्मविश्वास एक ऐसी क्षमता है, जिसे सीखा और धीरे-धीरे मजबूत किया जा सकता है.

उनके मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि बिना जानकारी के किसी भी बात को पूरे भरोसे के साथ सही बताना शुरू कर दिया जाए. असली बात यह है कि अगर किसी मुद्दे पर आपकी कोई राय है तो उसे रखने से डरना नहीं चाहिए, भले ही वह राय अभी पूरी तरह तैयार न हुई हो.यानी आत्मविश्वास का मतलब हर सवाल का जवाब जानना नहीं, बल्कि अपनी बात रखने की हिम्मत भी है.

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क्या कहते हैं करियर एक्सपर्ट

स्टैनफोर्ड के कम्युनिकेशन एक्सपर्ट मैट अब्राहम्स भी मीटिंग से पहले सवालों पर तैयारी करने और शुरुआत में ही लोगों को बातचीत में शामिल करने की सलाह देते हैं. उनके मुताबिक, मीटिंग की शुरुआत सीधे किसी सवाल या चर्चा से करना लोगों को ज्यादा सक्रिय कर सकता है. साथ ही, नियमित अभ्यास से बोलने का तरीका और आत्मविश्वास दोनों बेहतर किए जा सकते हैं.

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