मौत का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में डर और बेचैनी पैदा होने लगती है. कोई भी अपने किसी करीबी को आखिरी सांस लेते हुए नहीं देखना चाहता. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मौत के करीब पहुंचने पर इंसान के साथ क्या-क्या होता है? क्या उसे कुछ दिखाई देता है या वह किसी से बातें करने लगता है?
डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की एक नर्स ने अपने अनुभव के आधार पर ऐसी ही कुछ बातें साझा की हैं. उनका कहना है कि उन्होंने कई मरीजों को जिंदगी के आखिरी दिनों में ऐसी चीजें देखते हुए पाया है, जिन्हें देखकर उनके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि खुशी और मुस्कान होती है. नर्स ने इसे मौत के करीब होने का एक 'खूबसूरत' अनुभव बताया है.
कौन हैं ये नर्स, जो मौत के अनुभवों पर कर रही हैं बात?
अमेरिका के लॉस एंजिल्स में रहने वाली जूली मैकफैडेन एंड-ऑफ-लाइफ केयर यानी जीवन के आखिरी पड़ाव पर मरीजों की देखभाल करने वाली नर्स हैं. सोशल मीडिया पर वह 'हॉस्पिस नर्स जूली' के नाम से मशहूर हैं. टिकटॉक पर उनके करीब 17 लाख फॉलोअर्स हैं.
जूली का मकसद लोगों के बीच मौत को लेकर फैले डर को कम करना और इस विषय पर खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना है. वह अपने वीडियो में बताती हैं कि जब किसी व्यक्ति की जिंदगी के आखिरी दिन या हफ्ते चल रहे होते हैं, तो उसके व्यवहार और अनुभवों में किस तरह के बदलाव आ सकते हैं. अपने एक वीडियो में उन्होंने ऐसे दो अनुभवों के बारे में बताया है, जिन्हें वह अक्सर मरने के करीब पहुंचे मरीजों में देखती हैं.
पहला अनुभव- एकटक किसी चीज को देखते रहना
जूली के मुताबिक, मौत के करीब पहुंचने वाले कुछ मरीज अचानक कमरे के किसी एक हिस्से को लगातार देखने लगते हैं. उनकी नजर एक जगह टिक जाती है और वे वहां से आंखें नहीं हटाते. जूली इसे 'डेथ स्टेयर' यानी मौत के करीब होने पर एकटक देखने की स्थिति कहती हैं.
उन्होंने बताया कि कई बार आप मरीज के चेहरे के सामने उंगली चटकाते हैं या उसका ध्यान दूसरी तरफ खींचने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह अपनी नजर नहीं हटाता.
कुछ मरीज इस दौरान सिर्फ एकटक देखते रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जो कमरे में किसी ऐसे व्यक्ति से बातें करने लगते हैं, जो वहां मौजूद नहीं होता. कई बार उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान होती है, मानो वे अपने सामने कुछ ऐसा देख रहे हों, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिल रही हो.
दूसरा अनुभव- गुजर चुके अपनों को देखना
जूली ने मौत के करीब पहुंचने वाले मरीजों में एक और अनुभव का जिक्र किया है. इसे 'एंड-ऑफ-लाइफ विजनिंग' कहा जाता है. इसमें मरीज उन लोगों को देखने या उनसे बातचीत करने की बात करते हैं, जिनकी पहले ही मौत हो चुकी होती है.
मसलन, कोई व्यक्ति अपने गुजर चुके माता-पिता को देखने की बात कर सकता है, तो किसी को अपने पुराने दोस्त या परिवार के दूसरे सदस्य नजर आ सकते हैं. जूली के मुताबिक, कई बार मरीज कमरे में मौजूद लोगों के सामने ही किसी ऐसे व्यक्ति से बातचीत करने लगते हैं, जिसे बाकी लोग नहीं देख पाते.
उन्होंने एक ऐसे मरीज का अनुभव भी साझा किया, जिसके चेहरे पर बहुत बड़ी मुस्कान थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह कमरे के किसी दूसरे हिस्से में किसी को देख रहा हो. जूली चाहती थीं कि उस मरीज की पत्नी भी यह नजारा देखे, क्योंकि उनके मुताबिक ऐसे अनुभव परिवार को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि मरीज जिंदगी के आखिरी पड़ाव के कितने करीब है.
मौत से कुछ हफ्ते पहले शुरू हो सकते हैं ऐसे अनुभव
जूली बताती हैं कि उन्होंने अपने काम के दौरान ऐसे अनुभव कई बार देखे हैं. उनके मुताबिक, ये बदलाव किसी व्यक्ति की मौत से कुछ हफ्ते से लेकर करीब एक महीने पहले तक शुरू हो सकते हैं. हालांकि, हर मरीज का अनुभव एक जैसा नहीं होता. उन्होंने यह भी बताया कि मरीजों को क्या दिखाई देता है, यह उनके धर्म और धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है.
कुछ लोगों ने खूबसूरत बादल और फूल देखने की बात कही, तो कुछ ने जीसस, भगवान या फरिश्तों को देखने का अनुभव साझा किया. वहीं, कुछ लोगों को किसी देवी-देवता या धार्मिक शक्ति का कोई अनुभव नहीं होता. जूली के मुताबिक, इन अनुभवों के दौरान सबसे खास बात यह है कि कई मरीज डरे हुए नहीं, बल्कि खुश और मुस्कुराते हुए नजर आते हैं.
मौत के डर को कम करना चाहती हैं जूली
जूली का कहना है कि मौत और जिंदगी के आखिरी पड़ाव को लेकर लोगों के मन में बहुत डर है. वह अपने अनुभव साझा करके इस डर को कम करना चाहती हैं, ताकि लोग इस विषय पर खुलकर बात कर सकें और अपने करीबियों के आखिरी समय को बेहतर तरीके से समझ सकें.
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हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि जूली ने जो अनुभव बताए हैं, वे उनके नर्सिंग करियर के दौरान देखे गए मरीजों के व्यवहार पर आधारित हैं. हर व्यक्ति के साथ ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है. चिकित्सा विज्ञान में भी इन अनुभवों को लेकर अलग-अलग संभावनाओं पर विचार किया जाता है. इसलिए इन्हें मौत के समय होने वाली किसी निश्चित घटना या मृत्यु की सटीक भविष्यवाणी के तौर पर नहीं देखना चाहिए.