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डॉक्टरों को लगा ब्रेन कैंसर है... लेकिन शख्स के दिमाग में पल रहा था सूअर वाला कीड़ा

सिर में लगातार दर्द हो रहा था. जांच हुई तो डॉक्टरों को लगा कि मामला बेहद गंभीर है. दिमाग की स्कैन रिपोर्ट देखकर ऐसा लग रहा था कि ब्रेन कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका है. लेकिन जब हाई-रेजोल्यूशन एमआरआई की गई तो डॉक्टर भी हैरान रह गए. दिमाग में कैंसर नहीं, बल्कि सूअर में पाया जाने वाला एक खतरनाक टेपवर्म पल रहा था.

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ब्रेन कैंसर नहीं,  शख्स के दिमाग में कीड़े ने बना लिया था घर (Photo - Pexels)
ब्रेन कैंसर नहीं, शख्स के दिमाग में कीड़े ने बना लिया था घर (Photo - Pexels)

एक शख्स सिर में तेज दर्द से परेशान था. उसकी नजर भी धुंधली हो गई थी. इसके साथ ही उसे तमाम तरह की ऐसी परेशानियां हो रही थी, जिसे देखकर डॉक्टरों को लगा कि उसे ब्रेन कैंसर हो गया है. जब दिमाग की स्कैनिंग की गई तो ब्रेन ट्यूमर जैसी समस्या ही सामने आई और डॉक्टरों को लगा कि ब्रेन कैंसर धीरे- धीरे फैल रहा है. फिर इलाज के दौरान ही जब हाई-रेजोल्यूशन एमआरआई की गई. इसमें जो दिखाई दिया, वो चौंकाने वाला था.

डॉक्टरों ने जब गहराई से जांच की तो पता चला कि कैंसर से भी भयावह समस्या शख्स के दिमाग में थी, लेकिन इसका इलाज संभव था. उस व्यक्ति के दिमाग में सूअरों में पाए जाने वाले टेपवर्म यानी एक तरह का कीड़ा पल रहा था. 

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला स्पेन के 60 साल के एक व्यक्ति का है, जिसकी रिपोर्ट मेडिकल जर्नल इमर्जिंग इंफेक्शियस डिजीज में प्रकाशित हुई है. अच्छी बात यह रही कि जिसे पहले लाइलाज बीमारी समझा जा रहा था, उसका इलाज दवाओं से संभव था.

डॉक्टर को ब्रेन कैंसर की थी आशंका
दरअसल, व्यक्ति लंबे समय से सिरदर्द से परेशान था. अस्पताल में शुरुआती स्कैन में उसके दिमाग में कुछ ऐसे धब्बे दिखाई दिए, जो आमतौर पर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में नजर आते हैं. डॉक्टरों को आशंका हुई कि यह ब्रेन कैंसर हो सकता है.

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लेकिन बीमारी की सही तस्वीर जानने के लिए जब हाई-रेजोल्यूशन एमआरआई की गई तो पूरा मामला बदल गया. जांच में कोई ट्यूमर नहीं मिला. उसकी जगह डॉक्टरों ने दिमाग के अंदर टायनिया सोलियम  यानी सूअर में पाया जाने वाला टेपवर्म का लार्वा देखा.

इसके बाद मरीज का विशेष ब्लड टेस्ट किया गया, जिसमें पुष्टि हुई कि वह न्यूरोसिस्टिसरकोसिस  नाम की परजीवी बीमारी से संक्रमित है. यह बीमारी तब होती है, जब टेपवर्म के अंडे किसी तरह इंसान के शरीर में पहुंच जाते हैं और बाद में उनका लार्वा दिमाग तक पहुंचकर सिस्ट बना लेता है.

दिमाग तक कैसे पहुंचता है यह कीड़ा?
डॉक्टरों के मुताबिक, लोग अक्सर सोचते हैं कि अधपका सूअर का मांस खाने से ही यह बीमारी होती है. लेकिन इस मरीज के मामले में समस्या अलग थी. असल में, जब टेपवर्म के बेहद सूक्ष्म अंडे मुंह के जरिए शरीर में चले जाते हैं, तो वे आंतों में पहुंचकर लार्वा में बदल जाते हैं. इसके बाद ये लार्वा खून के जरिए शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच सकते हैं.

अगर ये दिमाग में पहुंच जाएं तो वहां तरल पदार्थ से भरी छोटी-छोटी गांठें यानी सिस्ट बना लेते हैं. समय के साथ ये सिस्ट कठोर भी हो सकती हैं. यही स्थिति न्यूरोसिस्टिसरकोसिस कहलाती है.

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किन लक्षणों से हो सकती है पहचान?
इस बीमारी में मरीज को लगातार सिरदर्द, मिर्गी के दौरे, चक्कर आना, मांसपेशियों में कमजोरी, बोलने में दिक्कत और याददाश्त कमजोर होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अगर समय पर इलाज न मिले तो दिमाग के अंदर दबाव बढ़ सकता है, लगातार दौरे पड़ सकते हैं और स्थिति जानलेवा भी हो सकती है.

अच्छी बात यह रही कि इलाज संभव था
डॉक्टरों ने इस मरीज का इलाज एंटी-पैरासाइट दवाओं एल्बेंडाजोल और प्राजिक्वांटेल से किया. जरूरत पड़ने पर ऐसी बीमारी में सूजन कम करने वाली दवाएं और दौरे या सिरदर्द नियंत्रित करने वाली दवाएं भी दी जाती हैं.यानी जिस बीमारी को पहले ब्रेन कैंसर समझा जा रहा था, वह दरअसल एक पारासाइट इंफेक्शन निकला, जिसका इलाज संभव था.

दुनिया में कितने लोग होते हैं शिकार?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल दुनिया में करीब 28 लाख लोग ऐसे परजीवी संक्रमण से प्रभावित होते हैं. इसके मामले एशिया, दक्षिण अमेरिका और पूर्वी यूरोप में ज्यादा देखने को मिलते हैं, जबकि यूरोप में यह बीमारी अपेक्षाकृत दुर्लभ मानी जाती है.

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पिछले साल भी ऐसा ही एक मामला चर्चा में आया था, जब इमरजेंसी डॉक्टर सैम घाली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक मरीज का एक्स-रे साझा किया था. उस एक्स-रे में मरीज के शरीर के बड़े हिस्से में टेपवर्म के लार्वा फैले हुए दिखाई दिए थे. माना गया कि वह संक्रमण संक्रमित या अधपका सूअर का मांस खाने से हुआ था.

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यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि हर गंभीर दिखने वाली बीमारी कैंसर नहीं होती. कई बार असली वजह इतनी अप्रत्याशित होती है कि डॉक्टरों को भी उसका पता लगाने के लिए बेहद बारीकी से जांच करनी पड़ती है.

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