
दुनिया घूमने का सपना बहुत से लोग देखते हैं, मगर बहुत कम लोग इस सपने को पूरा कर पाते हैं. लेकिन अगर कोई इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी के 28 साल लगा दे, तो यह किसी हैरान करने वाली कहानी से कम नहीं है. ब्रिटेन के रहने वाले कार्ल बुशबी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है, जो साल 1998 में दुनिया का चक्कर लगाने के लिए पैदल निकले थे और अब करीब तीन दशक बाद अपने देश लौट आए हैं.
उनका यह सफर बहुत मुश्किलों भरा रहा, इस दौरान उन्होंने 29 देशों से गुजरते हुए करीब 36 हजार मील यानी लगभग 58 हजार किलोमीटर का सफर तय किया. इस सफर में उन्हें कई बार जानलेवा हालात का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला. अब उनकी जर्नी का आखिरी पड़ाव उनकी मां का घर है.
फ्रांस से इंग्लैंड तक तैरकर पहुंचे कार्ल
57 साल के ब्रिटिश एडवेंचरर कार्ल बुशबी ने अपनी इस दिलचस्प जर्नी के सबसे मुश्किल आखिरी पड़ावों में से एक इंग्लिश चैनल को 5 अक्टूबर को तैरकर पार किया. इंग्लिश चैनल को क्रॉस करके वो फ्रांस से इंग्लैंड पहुंचे. जहां उन्होंने डोवर में कुछ समय आराम किया. करीब 28 साल बाद अपने देश की जमीन पर कदम रखना उनके लिए बेहद इमोशनल मोमेंट था.
होटल के बाहर ब्रिटेन का झंडा देखकर उन्होंने अपनी खुशी जाहिर की और बताया कि उन्होंने सफर के दौरान कई देशों के झंडे देखे, लेकिन अपने देश का झंडा देखने की खुशी सबसे अलग है. इंग्लैंड पहुंचने के बाद उनके लिए एक और खास पल आया.
28 साल बाद खाई ये डिशेज
कार्ल बुशबी ने करीब 28 साल बाद ट्रेडिशनल ब्रिटिश डिश फिश एंड चिप्स खाई, इसके साथ उन्होंने मश्ड मटर भी टेस्ट की. कार्ल ने इस खाने का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए अपनी खुशी जाहिर की. उनके लिए यह सिर्फ एक खाना नहीं, बल्कि लंबे अरसे बाद अपने देश की जिंदगी से दोबारा जुड़ने का मौका था.

पिता के जन्मदिन कार्ड ने दिखाई जिंदगी की राह
ऐसा नहीं है कि कार्ल अचानक इस जर्नी पर निकल पड़े थे, बल्कि उनके इस अनोखे सफर के पीछे एक दिलचस्प कहानी छिपी है. उन्होंने बताया कि साल 1990 के दशक में उनके पिता ने उन्हें बर्थडे पर एक कार्ड दिया था. उसमें दो सैनिकों के बीच ऐसी यात्रा को लेकर बहस दिखाई गई थी, जिसमें लंदन से न्यूयॉर्क तक बेरिंग जलसंधि के रास्ते पैदल पहुंचने की बात थी.
इस बात ने उन पर गहरा असर डाला था और उन्होंने नक्शा उठाया और दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने का रास्ता खींच दिया. उन्हें लगा कि यही वह चैलेंज है, जिसे उन्हें अपनी लाइफ में पूरा करना है.
ब्रिटिश सेना में थे कार्ल
कार्ल पहले ब्रिटिश सेना में पैराट्रूपर रह चुके थे और सेना छोड़ने के बाद उन्होंने 1 नवंबर 1998 को चिली से अपनी इस पैदल यात्रा को शुरू किया था. उस टाइम उनकी जेब में सिर्फ कुछ सौ डॉलर थे. जब कार्ल ने अपनी जर्नी शुरू की थी, उनको लगा था कि वो करीबन 12 साल में अपने घर लौंट आएंगे, लेकिन आगे के हालातों ने उनकी प्लानिंग पूरी तरह बदल दी.
रास्ते में आईं कई मुश्किलें
चिली से निकलने के बाद कार्ल नॉर्थ की ओर बढ़ते हुए अमेरिका पहुंचे. फिर उन्होंने अलास्का से रूस जाने के लिए बेरिंग जलसंधि के जमने का इंतजार किया, ताकि उसे पार किया जा सके. फिर अप्रैल 2012 में रूस ने उनका अगला वीजा देने से मना कर दिया. इसके बाद वो कार्ल वाशिंगटन डीसी स्थित रूसी दूतावास की ओर पैदल चल पड़े. बाद में बैन हटने के बाद उन्होंने अपना सफर आगे बढ़ाया.
रूस से आगे बढ़ते हुए वह मंगोलिया और चीन पहुंचे, इसके बाद उन्होंने कजाकिस्तान से अजरबैजान तक कैस्पियन सागर को तैरकर पार किया और फिर यूरोप की ओर अपना सफर जारी रखा.

इस दौरान आर्थिक संकट, वीजा संबंधी पाबंदियां, युद्ध, देशों के बीच राजनीतिक तनाव और कोविड-19 महामारी जैसी परिस्थितियों ने उनके सफर को बार-बार रोक दिया. सरकारी प्रक्रियाओं और यात्रा से जुड़े बैन के कारण भी उन्हें काफी समय गंवाना पड़ा. कार्ल के मुताबिक, उन्होंने अपने तय रास्ते से समझौता नहीं किया और इसी वजह से 12 साल में पूरी होने वाली यात्रा में 28 साल लग गए.
ट्रॉली का नाम रखा था 'बीस्ट'
कार्ल की इस अनोखी और लंबी जर्नी में एक खास चीज हमेशा उनके साथ रही. वो कोई इंसान या जानवर नहीं, बल्कि सामान ढोने वाली एक कस्टमाइज्ड गोल्फ ट्रॉली थी, जिसको उन्होंने बीस्ट नाम भी दिया था. इस ट्रॉली में खाने-पीने की चीजें, कैंपिंग का सामान, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और खराब हालात में काम आने वाली जरूरी चीजें रखी जाती थीं.
सफर के दौरान उनकी पहली ट्रॉली करीब तीन साल बाद खराब हो गई. इसके बाद उन्होंने निकारागुआ में दूसरी ट्रॉली बनाई, जिसे बीस्ट 2 नाम दिया. यह ट्रॉली करीब 25 साल तक उनके साथ रही. लंबे रास्तों पर जरूरी सामान साथ लेकर चलने के लिए यह ट्रॉली उनके बहुत काम आई.

बंदूक की नोक से लेकर डूबने के खतरे तक का सामना
सबसे खास बात यह है कि कार्ल का यह अभियान सिर्फ पैदल चलने और नए देशों को देखने की कहानी नहीं है. रास्ते में उन्हें कई बार ऐसे हालात का सामना करना पड़ा, जहां उनकी जान तक जा सकती थी. कई जगहों पर उन्हें बंदूक की नोक पर रोका गया और एक समय देश निकाला भी दिया गया. इसके अलावा कुछ मौकों पर तो वो डूबने और प्यास से जान गंवाने के भी बहुत करीब पहुंच गए थे. तो कभी जंगली जानवरों का भी खतरा उन पर आया.
कार्ल का कहना है कि सफर में मिले अनजान लोगों ने उन्हें आगे बढ़ते रहने की ताकत दी. उनके मुताबिक, इंसान अक्सर अपनी ताकत को कम आंकता है, जबकि दुनिया उतनी डरावनी भी नहीं होती, जितनी दूर से दिखाई देती है.
मां के घर पहुंचकर पूरा करेंगे सफर
करीब 36 हजार मील की दूरी तय करने और 29 देशों से गुजरने के बाद कार्ल अब अपनी जर्नी के आखिर स्टेज पर हैं. उन्हें ब्रिटेन के हल शहर में स्थित अपनी मां के घर तक पहुंचने के लिए लगभग 240 मील यानी करीब 386 किलोमीटर और पैदल चलना है. उनका लक्ष्य 1 नवंबर को घर पहुंचने का है, क्योंकि 1 नवंबर 1998 को ही उन्होंने चिली से अपने सफर की शुरुआत की थी.
इस तरह वह जिस तारीख को अपने सफर पर निकले थे, उसी तारीख को उसे पूरा करने की उम्मीद कर रहे हैं. हालांकि, इतने सालों तक पैदल चलने का असर अब उनकी बॉडी पर भी दिखाई देने लगा है. कार्ल ने बताया कि उनके घुटनों और टखनों में दर्द होने लगा है, उन्हें महसूस हो रहा है कि अब रुकने का समय आ गया है.