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तिलोई

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तिलोई (Tiloi) उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले का एक कस्बा और तहसील मुख्यालय है. यह जायस-इनहौना मार्ग पर मोहनगंज के पास स्थित है. तिलोई को ऐतिहासिक रूप से कान्हपुरिया राजपूतों के एक बड़े तालुकेदारी एस्टेट की राजधानी के रूप में जाना जाता रहा है. 

तिलोई में हर साल दशहरे के मौके पर रामलीला का आयोजन किया जाता है. इसमें रामायण की कहानी का नाटकीय मंचन किया जाता है. यह आयोजन स्थानीय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंचते हैं.

तिलोई का इतिहास कान्हपुरिया राजपूतों से जुड़ा हुआ है. 20वीं सदी की शुरुआत में तिलोई रायबरेली जिले की दूसरी सबसे बड़ी तालुका थी. उस समय खजुरगांव सबसे बड़ी तालुका थी. तिलोई के कान्हपुरिया राजपूत अपने वंश की शुरुआत कान्ह के बेटे रहास से जोड़ते थे. कान्ह के दो बेटे थे, रहास और सहास. सहास से जुड़ी शाखा मुख्य रूप से वर्तमान प्रतापगढ़ जिले के इलाके में रही.

रहास के करीब पांच पीढ़ी बाद परशाद सिंह हुए, जिन्होंने अपनी जमीन अपने तीन बेटों के बीच बांट दी. उनके बड़े बेटे जंगा सिंह ने तिलोई को अपना केंद्र बनाया और उस समय पूरे जायस परगने पर शासन किया. उनके दो भाई क्रमश: अठेहा और सिमरौता में रहे.

समय के साथ तिलोई की संपत्ति का कई बार बंटवारा हुआ. जंगा सिंह के पोते जगदीस राय की मृत्यु के बाद उनके बेटों के बीच जमीन बांटी गई. उनके छोटे बेटे इंद्रजीत को गौरा-जामुन का इलाका मिला, जबकि बड़े बेटे मित्रजीत ने तिलोई को अपने पास रखा. आगे चलकर इस परिवार की कई शाखाएं बनीं.

तिलोई के इतिहास में राजा सूरत सिंह का नाम भी महत्वपूर्ण है. वह नेत्रहीन थे, लेकिन उन्हें ऊर्जावान शासक माना जाता था. उन्होंने कान्हपुरिया राजपूतों की स्थिति मजबूत की और कुर्मियों के विद्रोह को दबाया. कहा जाता है कि उनके शासन में तिलोई का प्रभाव 14 परगनों तक फैल गया था. बाद में उनका प्रतापगढ़ के सोमवंशी शासकों से संघर्ष हुआ और हिंदौर की लड़ाई में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

सूरत सिंह के बाद गोपाल सिंह शासक बने. उनके बाद उनके बेटे मोहन सिंह ने सत्ता संभाली. मोहन सिंह ने कई सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया और 1743 में उनकी मृत्यु हुई. उनके बेटे पेम सिंह ने करीब पांच साल शासन किया. 1748 में उनकी मृत्यु के बाद बलभद्दर सिंह तिलोई के शासक बने. वह एक प्रसिद्ध योद्धा थे और उन्होंने मराठों के खिलाफ मुगलों का साथ दिया था. उन्हें 5,000 का मनसब दिया गया था, जिससे वह अवध दरबार के ऊंचे पद वाले लोगों में शामिल हो गए.

बाद में बलभद्दर सिंह अवध के नवाब के खिलाफ विद्रोह करते हुए युद्ध में मारे गए. उनके कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय तक विवाद चला. इस विवाद ने तिलोई की बड़ी जागीर को कई हिस्सों में बांट दिया.

1857 के विद्रोह के दौरान राजा जगपाल सिंह ने शुरुआत में भारतीय विद्रोहियों का साथ दिया, लेकिन बाद में अंग्रेजों से मिल गए. अंग्रेजों ने उन्हें जब्त की गई जमीन का बड़ा हिस्सा इनाम में दिया. 1877 में अंग्रेजों ने उनके वंशानुगत राजा के पद की पुष्टि की और 1882 में उन्हें राजा बहादुर की उपाधि भी दी.

20वीं सदी की शुरुआत में तिलोई को एक बाजार गांव के रूप में बताया गया था. इसकी मुख्य पहचान तालुका की राजधानी होने से थी. यहां सप्ताह में दो दिन, बुधवार और रविवार को बाजार लगता था. उस समय यहां एक प्राथमिक स्कूल और तालुकेदार का आवास भी था. 1901 में तिलोई की आबादी 2,768 थी.

1961 की जनगणना में तिलोई को टेओली नाम से दर्ज किया गया था. उस समय इसमें 16 मजरे शामिल थे और आबादी 2,205 थी. यहां डाकघर, औषधालय और एक चिकित्सा कर्मचारी की सुविधा थी. 1953 में स्थापित एसपीएन हायर सेकेंडरी स्कूल भी यहां शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. उस समय स्कूल में 14 शिक्षक और 350 विद्यार्थी थे.

1961 में तिलोई के सप्ताह में दो बार लगने वाले बाजार में करीब 1,000 लोगों की औसत भीड़ जुटती थी. वहीं वार्षिक रामलीला देखने के लिए करीब 15,000 लोग पहुंचते थे. 1981 की जनगणना के अनुसार तिलोई की आबादी बढ़कर 3,682 हो गई थी और यहां 874 परिवार रहते थे.

आज तिलोई अमेठी जिले का एक महत्वपूर्ण स्थानीय केंद्र है. तहसील मुख्यालय होने के कारण यहां प्रशासनिक गतिविधियां होती हैं और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोग भी अपने जरूरी काम के लिए यहां पहुंचते हैं. तिलोई की पहचान आज भी उसके लंबे राजपूत इतिहास, स्थानीय बाजार और दशहरे की रामलीला से जुड़ी हुई है.
 

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