लस्सी (Lassi) भारत का एक पारंपरिक पेय है. इसे मुख्य रूप से दही और पानी से तैयार किया जाता है. यह खास तौर पर गर्मियों के मौसम में उत्तर भारत में काफी लोकप्रिय है. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली समेत कई राज्यों में लस्सी रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा रही है. अलग-अलग जगहों पर इसे बनाने और परोसने का तरीका थोड़ा अलग देखने को मिलता है.
लस्सी बनाने के लिए आमतौर पर दही को अच्छी तरह फेंटा जाता है और उसमें पानी मिलाया जाता है. इसके बाद स्वाद के अनुसार नमक या चीनी डाली जाती है. नमकीन लस्सी में भुना जीरा, काला नमक और कुछ मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं मीठी लस्सी में चीनी मिलाई जाती है. कई जगहों पर लस्सी को गाढ़ा रखकर उसके ऊपर मलाई या मक्खन भी डाला जाता है.
लस्सी का इतिहास भारतीय खानपान में इस्तेमाल होने वाले दही और छाछ जैसे पारंपरिक डेयरी पेय से जुड़ा हुआ है. ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से दही को मथकर उससे अलग-अलग तरह के पेय बनाए जाते रहे हैं. समय के साथ लस्सी ने स्थानीय खानपान से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों में भी अपनी जगह बनाई.
आज बाजार में पारंपरिक लस्सी के अलावा कई तरह की फ्लेवर्ड लस्सी भी मिलती हैं. आम, गुलाब, स्ट्रॉबेरी और केसर जैसी फ्लेवर वाली लस्सी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं. रेस्तरां और मिठाई की दुकानों पर इसे अक्सर बड़े गिलास या मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा जाता है.
लस्सी का इस्तेमाल केवल पेय के तौर पर ही नहीं होता. पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे पराठे, पूरी, छोले-भटूरे और दूसरे पारंपरिक भोजन के साथ भी परोसा जाता है. कुछ जगहों पर घर में तैयार ताजा दही से तुरंत लस्सी बनाई जाती है.
लस्सी की खास पहचान इसका देसी स्वाद और बनाने का आसान तरीका है. यही वजह है कि यह पारंपरिक भारतीय पेय आज भी घरों, ढाबों, मिठाई की दुकानों और रेस्तरां में आसानी से मिल जाता है. बदलते खानपान के बावजूद लस्सी भारतीय भोजन और पेय संस्कृति का एक जाना-पहचाना हिस्सा बनी हुई है.