हरीश राणा एक नौजवान युवक जो 13 सालों से बिस्तर पर खामोश पड़ा है, उसकी सांसें तो चल रही हैं, लेकिन उसे खुद जीने का एहसास नहीं है. दिन महीने साल बीतते गए, जीने की उम्मीद खत्म होती गई, लेकिन बदकिस्मती ऐसी कि मौत भी नहीं आई. 6/4 का बिस्तर ही उसकी पूरी दुनिया है.
उसकी वो मां जो कभी अपने बच्चे की जिंदगी की दुआ मांगती थी वो भी अपने बच्चे की बेबसी देखकर ऊपर वाले से उसकी मौत की दुआ मांगती रही, लेकिन जब उसकी दुआ कबूल नहीं हुई तो उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आज सुप्रीम कोर्ट ने उस खामोश जिंदगी की तकदीर पर अपना फैसला सुना दिया है. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला फैसला सुनाते हुए बेहद भावुक हो गए और उनकी आंखों से भी आंसू छलक आए. बेंच ने हरीश के माता-पिता को उनके बेटे का लाइफ सपोर्ट रोकने की इजाजत दे दी.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
जस्टिस पारदीवाला ने फैसले की शुरुआत शेक्सपियर के उस कालजयी और दर्दभरी कथन "होना या न होना" (To be or not to be) से की, जो जीवन और मृत्यु के बीच झूलते एक इंसान की गहरी पीड़ा को दर्शाता है. कोर्ट ने बड़े ही संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण से व्यक्ति के अपनी मृत्यु चुनने के अधिकार पर चर्चा की और स्पष्ट किया कि जहां 'एक्टिव इच्छा मृत्यु' भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है, वहीं 'पैसिव इच्छा मृत्यु' के मामलों में मरीज की प्राइवेसी और उसकी शारीरिक अखंडता सर्वोपरि है.
जजों की टिप्पणियों में वह दर्द झलका कि जब एक इंसान पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है, तब उसके 'सर्वोत्तम हित' में लिया गया फैसला ही सबसे बड़ा धर्म है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथ ने जनवरी में हरीश के माता-पिता से मुलाकात भी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने एम्स से वो रिपोर्ट भी मांगी थी, जिसमें लिखा था कि हरीश अब कभी ठीक नहीं हो सकता है.
कौन है हरीश ?
हरीश राणा का ख्वाब था इंजीनियर बनने का, माता-पिता ने भी बड़े अरमानों से अपने बेटे को चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई करने के लिए भेजा था, उसके भविष्य के लिए हजारों सपने सजाए थे. लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ कि इस परिवार की खुशियां एक झटके में खत्म हो गईं. हरीश अपने कॉलेज के पास ही पीजी में चौथी मंजिल पर रहता था. एक दिन कॉलेज से आने के बाद वो अपने कमरे की बालकनी से अचानक नीचे गिर गया.
हादसे में हरीश के सिर में गहरी चोट आई और वो कोमा में चला गया. पहले चंडीगढ़ फिर दिल्ली के एम्स में इलाज चला मां बेटे की सलामती की दुआ मांगती रही, लेकिन उसके हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. दिन, महीने और साल गुजरते गए, लेकिन एक हंसता खेलता नौजवान बिस्तर पर सिमटकर रह गया और उसके साथ उसके माता-पिता की जिंदगी भी थम गई.
बिस्तर पर पड़ा हरीश, न हंस सकता है, न रो सकता है, वो करवट तक नहीं बदल सकता. खाने के लिए लिक्विड खाना और पाइप लाइन, पेशाब के लिए बैग. हरीश एक जिंदा लाश की तरह है, जिसकी सांसें तो चल रही हैं, लेकिन जीने के कोई मायने नहीं हैं. हरीश की मां कहती है अगर हम उसे दिन भर कुछ खाने को न दें तब भी उसे कुछ पता नहीं चलता है.
सालों से एक ही बिस्तर पर
हरीश अपने दर्द का इज़हार भी करने की हालत में नहीं है. वो इशारों -इशारों में ही अपनी बातें करता है. बेटे की देखभाल के लिए पिता ने अपनी नौकरी तक छोड़ दी, यहां तक कि अपना घर भी बेचने को मजबूर हो गए. पहले नर्स भी रखा, लेकिन माली हालत ऐसी थी कि नर्स भी रखना महंगा पड़ रहा था.
डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर लिए थे और इलाज का खर्च उठाना अब मुश्किल होने लगा था. मजबूर होकर एक दिन हरीश की मां ने वो फैसला लिया जो शायद ही दुनिया की कोई मां ले सके. हरीश का पूरा परिवार एक फरियाद के साथ कोर्ट की शरण में पहुंचा और अपने बच्चे के लिए इच्छामृत्यु मांगी. माता-पिता दो बार 2018 और 2023 में सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने दोनों ही बार परिवार की मांग ठुकरा दी थी. लेकिन 11 मार्च को आखिर उनके पक्ष में फैसला आया.