देव स्नान पूर्णिमा (Deva Snana Purnima), जिसे स्नान यात्रा भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है. यह हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा का विशेष स्नान अनुष्ठान किया जाता है. यह पर्व मुख्य रूप से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.
इस दिन सुबह भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को मंदिर के रत्न सिंहासन से बाहर लाकर स्नान मंडप, जिसे स्नान बेदी भी कहा जाता है, पर विराजमान किया जाता है. इसके बाद तीनों देवताओं का 108 पवित्र कलशों के जल से अभिषेक किया जाता है. इस जल को पहले से विशेष विधि से तैयार किया जाता है और धार्मिक मंत्रों के साथ स्नान कराया जाता है.
स्नान के बाद शाम के समय भगवानों को हाथी के स्वरूप जैसा विशेष श्रृंगार पहनाया जाता है, जिसे हाथी वेश या हाती वेशा कहा जाता है. यह अनुष्ठान भी स्नान यात्रा का प्रमुख हिस्सा माना जाता है.
मान्यता के अनुसार, अधिक मात्रा में स्नान कराने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं. इसके बाद वे 15 दिनों के लिए अनसार काल में चले जाते हैं. इस दौरान उन्हें एकांत में रखा जाता है, औषधियां दी जाती हैं और मंदिर के गर्भगृह के दर्शन आम भक्तों के लिए बंद रहते हैं. अनसार अवधि समाप्त होने के बाद भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं और इसके बाद प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत होती है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्कंद पुराण में इस पर्व का उल्लेख मिलता है. माना जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना के समय पहली बार इस स्नान उत्सव का आयोजन कराया था. आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है.