ब्लैक होल (Black Hole) अंतरिक्ष में मौजूद एक ऐसा खगोलीय पिंड है, जिसका गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक होता है. इसका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत होता है कि इससे प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता. ब्लैक होल का नाम इसी खासियत से जुड़ा है. आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार, जब किसी वस्तु का द्रव्यमान (Mass) बहुत छोटे क्षेत्र में सिमट जाता है, तो ब्लैक होल बनने की स्थिति पैदा हो सकती है.
ब्लैक होल के चारों ओर एक सीमा होती है, जिसे इवेंट होराइजन कहा जाता है. यह वह सीमा है जिसके अंदर जाने के बाद कोई वस्तु बाहर नहीं निकल सकती. सामान्य सापेक्षता के अनुसार, इवेंट होराइजन को पार करने वाली वस्तु को स्थानीय स्तर पर कोई खास बदलाव महसूस नहीं होता. सिद्धांत के अनुसार ब्लैक होल के केंद्र में सिंगुलैरिटी होती है. इस क्षेत्र में स्पेसटाइम की वक्रता बहुत अधिक हो जाती है.
ब्लैक होल की अवधारणा पर वैज्ञानिक चर्चा 18वीं शताब्दी में शुरू हुई थी. उस समय ऐसे खगोलीय पिंडों की कल्पना की गई थी जिनका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत हो कि प्रकाश उनसे बाहर न निकल सके. वर्ष 1916 में सामान्य सापेक्षता के आधार पर ऐसा गणितीय समाधान सामने आया, जो बाद में ब्लैक होल से जुड़ा. 1950 के दशक के अंत तक वैज्ञानिकों ने इस समाधान को अंतरिक्ष के ऐसे क्षेत्र के रूप में समझना शुरू किया, जहां से कुछ भी बाहर नहीं निकल सकता.
1960 के दशक में ब्लैक होल पर वैज्ञानिक अध्ययन तेजी से आगे बढ़ा. इसके बाद इन्हें सामान्य सापेक्षता का संभावित परिणाम माना जाने लगा. साइग्नस एक्स-1 को शुरुआती व्यापक रूप से स्वीकार किए गए ब्लैक होल उम्मीदवारों में गिना जाता है. 1971 से 1974 के बीच हुए कई अध्ययनों में इसे ब्लैक होल वाली बाइनरी प्रणाली से जोड़ा गया.
ब्लैक होल आमतौर पर बहुत बड़े तारों के जीवन के अंतिम चरण में बन सकते हैं. जब ऐसे तारे अपना ईंधन समाप्त कर देते हैं, तो उनका केंद्र अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ सकता है. बड़े तारों के ढहने के दौरान सुपरनोवा जैसी घटना हो सकती है और इसके बाद ब्लैक होल बन सकता है.
ब्लैक होल बनने के बाद वह अपने आसपास मौजूद पदार्थ को आकर्षित करके द्रव्यमान बढ़ा सकता है. गैस और अन्य पदार्थ ब्लैक होल के चारों ओर घूमते हुए एक्रेशन डिस्क बना सकते हैं. इस डिस्क में मौजूद गर्म पदार्थ से विद्युतचुंबकीय विकिरण निकल सकता है.
ब्लैक होल कई आकार के हो सकते हैं. तारकीय ब्लैक होल बड़े तारों के पतन से बन सकते हैं. इसके अलावा आकाशगंगाओं के केंद्र में सुपरमैसिव ब्लैक होल पाए जाते हैं. इनका द्रव्यमान सूर्य से लाखों या उससे भी अधिक गुना हो सकता है.
ब्लैक होल का सीधे दिखाई देना संभव नहीं है. वैज्ञानिक उनके आसपास के पदार्थ और प्रकाश पर पड़ने वाले प्रभावों से उनकी मौजूदगी का पता लगाते हैं. किसी ब्लैक होल की परिक्रमा कर रहे तारों की गति से उसके द्रव्यमान और स्थान का अनुमान लगाया जा सकता है. ब्लैक होल के विलय से निकलने वाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों को भी वैज्ञानिक उपकरणों से दर्ज किया जा सकता है. मिल्की वे आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद Sagittarius A के आसपास तारों की गति से वहां लगभग 43 लाख सौर द्रव्यमान (Mass) वाले सुपरमैसिव ब्लैक होल की मौजूदगी का पता चला है.