बछरावां (Bachhrawan) उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में स्थित एक कस्बा और नगर पंचायत है. यह एक सामुदायिक विकासखंड का मुख्यालय भी है. बछरावां रायबरेली-लखनऊ मुख्य मार्ग पर स्थित है और यहां से महाराजगंज, हैदरगढ़ और गुरबख्शगंज जाने वाली सड़कें भी निकलती हैं. रेलवे लाइन रायबरेली-लखनऊ सड़क के समानांतर चलती है और कस्बे के पश्चिमी हिस्से में रेलवे स्टेशन स्थित है.
बछरावां का इतिहास काफी पुराना है. कस्बे के पास ईंटों से भरा एक बड़ा टीला है, जिसे पुराने भर नगर से जोड़ा जाता है. माना जाता है कि इस इलाके पर भर समुदाय का लंबे समय तक प्रभाव रहा. पहले यहां मुस्लिम शासकों और बाद में बैस राजपूतों का दबदबा हुआ. अंत में 829 हिजरी में जौनपुर सल्तनत के इब्राहिम शाह के शासनकाल में भरों की सत्ता समाप्त हुई. इसके बाद इस क्षेत्र को थुलेड़ी परगना बनाया गया और इसे आशान तथा सुदौली नाम के दो तप्पों में बांटा गया.
वर्तमान बछरावां कस्बे की स्थापना करीब 1400 के आसपास थुलेड़ी परगना के एक चौधरी बछराज पांडे ने की थी. उन्हीं के नाम से कस्बे का नाम बछरावां पड़ा. इसी दौर में अकाल के कारण जैसवार क्षेत्र से कुछ कुर्मी परिवार यहां आकर बसे. इनमें केशो दास नाम के व्यक्ति ने बछराज पांडे की सेवा शुरू की और बाद में चौधरी का पद संभाला. उनके वंशज लंबे समय तक चौधरी पद और बछरावां समेत बड़ी जमीन के मालिक रहे.
1935 में बछरावां को पहली बार गांव से कस्बे का दर्जा मिला. इसी दौरान डलमऊ, जायस और महाराजगंज को भी कस्बे का दर्जा दिया गया था. हालांकि 1961 की जनगणना में शहरी मानकों को पूरा नहीं करने के कारण इसे फिर कस्बे की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. उस समय बछरावां टाउन एरिया और बछरावां ग्रामीण क्षेत्र के आंकड़े अलग-अलग दर्ज किए गए थे. 1981 की जनगणना में इसे दोबारा कस्बे का दर्जा मिल गया.
बछरावां में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास भी धीरे-धीरे हुआ. 1948 में स्थापित श्री गांधी विद्यालय हाई स्कूल यहां के पुराने शिक्षण संस्थानों में शामिल है. 1961 में यहां सरकारी डिस्पेंसरी भी थी, जिसमें पुरुषों के लिए चार और महिलाओं के लिए दो बेड उपलब्ध थे. इसी दौर में कस्बे में पुलिस व्यवस्था और साप्ताहिक बाजार भी सक्रिय था.
धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी बछरावां की अपनी पहचान है. यहां आश्विन शुक्ल दशमी के दिन रामलीला का आयोजन होता है. इसमें रामायण की कथा का नाटकीय मंचन किया जाता है. रामलीला के दौरान आसपास के इलाकों से दुकानदार और विक्रेता रोजमर्रा की जरूरत का सामान बेचने पहुंचते हैं. पुराने समय में इस आयोजन में करीब एक हजार लोगों की भीड़ जुटती थी.
आर्थिक गतिविधियों में कृषि और व्यापार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. 1981 में बछरावां के प्रमुख आयात में लोहा, सीमेंट और कपड़ा शामिल थे. यहां थ्रेशिंग मशीन, बैलगाड़ी और ड्रम जैसी चीजें बनाई जाती थीं. चावल, दाल और गेहूं यहां से बाहर भेजे जाने वाले प्रमुख उत्पाद थे. कस्बे का पहला बैंक 1966 में कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की शाखा के रूप में खुला.