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पाखंड का मास्टरक्लास है वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की ड्रामेबाजी, क्या भूल गया अपना इतिहास?

पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ टी20 विश्व कप मैच का बहिष्कार किसी सिद्धांतवादी विरोध से अधिक राजनीतिक पाखंड और वित्तीय मजबूरी का परिणाम है. बांग्लादेश के नाम पर लिया गया यह कदम ऐतिहासिक विडंबनाओं से भरा है, क्योंकि 1971 के घाव आज भी अनसुलझे हैं. चयनात्मक बहिष्कार पीसीबी को भारी आर्थिक, कानूनी और क्रिकेटिंग नुकसान की ओर ले जा सकता है.

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पाकिस्तान ने भारत के साथ वर्ल्ड कप मैच खेलने से किया इनकार (Photo: ITG)
पाकिस्तान ने भारत के साथ वर्ल्ड कप मैच खेलने से किया इनकार (Photo: ITG)

भारत के खिलाफ टी20 विश्व कप मैच का बहिष्कार करने का पाकिस्तान का फैसला सूर्यकुमार यादव और उनकी टीम से केवल एक शानदार अभ्यास मैच का अवसर छीन लेता है. मौजूदा फॉर्म को देखते हुए, भारत आसानी से मैदान पर उतरता, 250 से अधिक रन बनाता और पाकिस्तान को चंद ओवरों में समेट देता. यह हर किसी के लिए विन-विन होता. भारत को कोलंबो में मैच प्रैक्टिस मिलती, क्रिकेट प्रशंसकों को ड्रामा मिलता और पाकिस्तान को सीखने का एक और मिलता.

लेकिन मौजूदा पाकिस्तानी हुकूमत ने मैदान में उतरने से इनकार कर दिया. उन्होंने खेल से ऊपर उठकर एक ऐसे तमाशे को चुना है, जो पाखंड का मास्टरक्लास बन चुका है.

भेड़िये के मगरमच्छी आंसू

पाकिस्तान दावा कर रहा है कि वह आईसीसी द्वारा बांग्लादेश की हाइब्रिड मॉडल की मांग न मानने और मैचों को श्रीलंका शिफ्ट न करने के विरोध में भारत के खिलाफ मैच नहीं खेल रहा. उसने खुद को बांग्लादेशी हितों का एकमात्र रक्षक, “बड़ा भाई” और भारत की “हेजेमनी” के खिलाफ खड़े योद्धा के रूप में पेश किया है.

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लेकिन इतिहास की थोड़ी-सी जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि यह चिंता कितनी खोखली है. 1971 में, इसी पाकिस्तानी स्टेट के पूर्ववर्तियों ने बांग्लादेशी अस्तित्व को कुचलने की क्रूर कोशिश की थी. ऐसे में आज पाकिस्तान का बांग्लादेशी क्रिकेटरों के अधिकारों के लिए रोना इतिहास की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है.

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मुक्ति संग्राम के ज़ख्म आज भी पूरी तरह नहीं भरे हैं. पूर्वी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक जनादेश को न मानने से जन्मे उस संघर्ष पर बांग्लादेश दशकों से औपचारिक माफी की मांग करता रहा है. एक ऐसी माफी, जिसे पाकिस्तान ने हमेशा कूटनीतिक जुमलों में टाल दिया.

आज उसी बांग्लादेश को ढाल बनाकर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश न सिर्फ अवसरवादी है, बल्कि इतिहास का घोर अपमान भी है. यह भेड़िये का भेड़ के लिए रोना है. और आंसू मगरमच्छ के हैं. पाकिस्तान छाती इसलिए नहीं पीट रहा कि उसे भेड़ की चिंता है, बल्कि इसलिए कि भेड़ की मुश्किल उसे अपने प्रतिद्वंद्वी पर झपटने का बहाना दे रही है.

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चयनात्मक भागीदारी की कायरता

अगर पीसीबी सच में मानता था कि आईसीसी का शासन इतना पक्षपाती है कि बहिष्कार जायज़ हो, तो एक ही तार्किक रास्ता था. पूरा टूर्नामेंट छोड़ देना. टी20 विश्व कप से पूरी तरह हटना ही असली विरोध होता.

इसके बजाय उन्होंने चयनात्मक बहिष्कार चुना. संदेश साफ है. हम आईसीसी का पैसा लेंगे, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के खिलाफ खेलेंगे, आईसीसी के खर्चे पर पांच-सितारा होटलों में ठहरेंगे, लेकिन भारत के खिलाफ नहीं खेलेंगे क्योंकि हम “विरोध” कर रहे हैं.

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यह सिद्धांत नहीं, बल्कि वित्तीय अस्तित्व की रणनीति है, जो खुद को विद्रोह के रूप में पेश कर रही है. पूरा बहिष्कार पीसीबी के लिए आईसीसी फंडिंग के फ्रीज़ होने, बैंक अकाउंट्स के खाली होने और 2028 चैंपियंस ट्रॉफी से संभावित प्रतिबंध का रास्ता खोल देता.

एक अविश्वसनीय आत्मघाती कदम

क्रिकेट के नजरिये से यह बहिष्कार आत्म-विनाश का उदाहरण है. इसका तात्कालिक असर यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ी जो अपने करियर के सर्वश्रेष्ठ दौर में हैं वह दुनिया के सबसे बड़े मंच पर प्रदर्शन करने का मौका गंवा रहे हैं. वे उन प्रशंसकों को भी सज़ा दे रहे हैं, जिन्होंने कोलंबो तक पहुंचने के लिए हज़ारों डॉलर खर्च किए हैं.

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टूर्नामेंट चलता रहेगा. भारत को अंक मिलेंगे. पाकिस्तान एक कोने में खड़ा रह जाएगा. खाली कमरे में चिल्लाता हुआ. जबकि दुनिया क्रिकेट का आनंद लेती रहेगी. और नुकसान बढ़ता जाएगा.

मेंबर पार्टिसिपेशन एग्रीमेंट के तहत पीसीबी कानूनी रूप से खेलने के लिए बाध्य है. ब्रॉडकास्टर्स आईसीसी पर मुकदमा कर सकते हैं और आईसीसी वह पूरा बोझ पीसीबी पर डाल देगा. अनुमान है कि डिज़्नी स्टार करीब 38 मिलियन डॉलर तक का दावा ठोक सकता है.

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पाकिस्तान को हर साल आईसीसी से करीब 34.5 मिलियन डॉलर मिलते हैं. सूत्रों के मुताबिक, आईसीसी इस नुकसान की भरपाई के लिए 70–80 प्रतिशत तक राशि रोकने पर विचार कर रहा है.

इस पैसे के बिना पीसीबी न खिलाड़ियों की सैलरी दे पाएगा, न स्टेडियम चला पाएगा, न घरेलू क्रिकेट. वे एक राजनीतिक हेडलाइन के बदले गद्दाफी स्टेडियम का बिजली बिल दांव पर लगा रहे हैं.

आईसीसी पीएसएल में विदेशी खिलाड़ियों की भागीदारी पर भी प्रतिबंध लगा सकता है. अगर इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ी बाहर हुए, तो लीग का व्यावसायिक मूल्य रातों-रात ढह जाएगा.

भारत का रुख

2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बावजूद भारत विश्व कप से पीछे नहीं हटा. उसने वैश्विक खेल के हित में श्रीलंका के न्यूट्रल वेन्यू पर खेलने पर सहमति दी. पिछले साल एशिया कप में भी भारत ने पाकिस्तान से तीन बार खेला और तीनों बार हराया.

इतने बड़े आतंकी हमले के बाद भी भारत का खेलना और पाकिस्तान का बांग्लादेश के नाम पर बहिष्कार करना, पीसीबी के रुख को छोटा, बनावटी और राजनीतिक मायोपिया बनाता है. भू-राजनीति का चक्र घूमता रहता है. बांग्लादेश और पाकिस्तान कभी शांति से साथ नहीं रह पाए. यह सच नहीं बदलेगा.

(यह लेख संदीपन शर्मा द्वारा लिखा गया है. संदीपन क्रिकेट, सिनेमा, संगीत और राजनीति पर लिखते हैं.)

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