शहर कोई जीवित प्राणी नहीं है, लेकिन उसका व्यवहार एक जीवित शरीर की तरह होता है. उसमें विकास के उछाल, बदलाव और कभी-कभी गिरावट भी दिखता है. अब वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट इमेजरी के जरिए दुनिया के 6 प्रमुख शहरों - दुबई, लागोस, मेक्सिको सिटी, मुंबई, सिएटल और शेनझेन की 'शहरी नब्ज' को ट्रैक किया है.
यह नया तरीका शहरों में हो रहे बदलावों को लगभग रीयल-टाइम में देखने में मदद करता है. स्टडी में पता चला है कि शहरों का विकास न तो सुचारू रूप से होता है और न ही लगातार. यह स्पाइकी (अचानक उछाल वाला), साइक्लिक और अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग गति वाला होता है.
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शहरी पल्स क्या है?
यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट के प्रोफेसर झेझू के नेतृत्व में की गई इस स्टडी के अनुसार, शहरी पल्स शहर के विकास की उच्च-आवृत्ति वाली गतिविधियों को मापता है. जैसे मानव शरीर की नब्ज हमें स्वास्थ्य की जानकारी देती है, वैसे ही शहरी पल्स हमें शहर के विकास की सही प्रक्रिया बताता है.
पारंपरिक तरीके में सालाना जनगणना, आर्थिक आंकड़े या दस साल पुरानी मैपिंग का इस्तेमाल होता था, जो सिर्फ नतीजे दिखाते थे. लेकिन नया तरीका प्रक्रिया को समझने में मदद करता है. इससे आर्थिक तनाव या ठहराव के शुरुआती संकेत पहले ही मिल सकते हैं, जिससे संकट को रोका जा सकता है.

छह शहरों का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने नासा के Landsat और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-2 सैटेलाइट्स से ली गई हाई-फ्रीक्वेंसी और घनी इमेजरी का इस्तेमाल किया. उन्होंने नए भवनों के निर्माण, पुरानी इमारतों के तोड़ने, इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और हरे इलाकों में विस्तार को ट्रैक किया.
ये छह शहर अलग-अलग राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों वाले चुने गए थे. शेनझेन राज्य-प्रायोजित विकास, सिएटल बाजार-चालित विकास, लागोस अनौपचारिक विस्तार और दुबई मेगा प्रोजेक्ट्स का उदाहरण हैं.
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प्रत्येक शहर की खास 'नब्ज'
COVID-19 ने दिखाया अलग-अलग प्रभाव
अध्ययन में COVID-19 महामारी का प्रभाव भी साफ दिखा. शोधकर्ताओं ने इसे शहर की 'कार्डियक अरेस्ट' बताया. शेनझेन में तेज गिरावट के बाद तेजी से रिकवरी हुई. लागोस में नब्ज कमजोर हुई और धीमी गति से सुधार हुआ. वहीं मुंबई और मेक्सिको सिटी पर इसका प्रभाव कम रहा. इससे पता चलता है कि वैश्विक संकट हर शहर पर अलग तरीके से असर डालते हैं.
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येल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर केरेन सेटो के अनुसार, यह तरीका शहरी योजनाकारों और नीति-निर्माताओं के लिए एक डायग्नोस्टिक टूल की तरह काम करेगा. इससे वे संकट आने से पहले ही पता लगा सकते हैं कि किसी इलाके की नब्ज कमजोर हो रही है या नहीं.
इससे इंफ्रास्ट्रक्चर के बर्बाद होने से रोका जा सकता है. आर्थिक नुकसान को रोका जा सकता है. शहर की लेबर व मटेरियल मार्केट को ओवरहीट होने से बचाया जा सकता है.
यह अध्ययन, जो प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है, शहरों को समझने के पारंपरिक तरीके को बदलने वाला है. अब शहरों को स्थिर मानचित्रों की बजाय गतिशील, जीवंत इकाई के रूप में देखा जाएगा.
मुंबई जैसे भारतीय शहरों के लिए यह अध्ययन खास महत्व रखता है क्योंकि तेज शहरीकरण, अनौपचारिक बस्तियां और जलवायु चुनौतियों के बीच सही नियोजन की जरूरत है. सैटेलाइट आधारित शहरी पल्स मॉनिटरिंग भविष्य में शहरों को बेहतर और अधिक टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.