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चांद की धूल अब परेशानी नहीं, घर बनाने के काम भी आएगी! वैज्ञानिकों का नया प्रयोग

चांद पर इंसानों के रहने का सपना सच करने के लिए वैज्ञानिक वहां की धूल से ईंटें बनाने में जुटे हैं. लेजर और 3D प्रिंटिंग की मदद से घर, सड़कें और लैंडिंग पैड बनाने की तैयारी हो रही है.

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नासा का प्लान है कि वो चंद्रमा की मिट्टी से वहां पर इंसानी बस्तियां बनाएगा. (Photo: Getty)
नासा का प्लान है कि वो चंद्रमा की मिट्टी से वहां पर इंसानी बस्तियां बनाएगा. (Photo: Getty)

चांद पर इंसानों के रहने के लिए घर कैसे बनाए जाएंगे? नासा और दूसरे अंतरिक्ष वैज्ञानिक इसका जवाब चांद की धूल में तलाश रहे हैं. वैज्ञानिक वहां की धूल को गर्म करके मजबूत ईंटें बनाने की तकनीक पर काम कर रहे हैं. इसके लिए लेजर, 3D प्रिंटिंग और सूरज की गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे भविष्य में चांद पर घर, सड़कें और अंतरिक्ष यानों के उतरने की जगह बनाई जा सकती है. इसका मकसद निर्माण के लिए धरती से कम सामान ले जाना है, ताकि अंतरिक्ष मिशन का खर्च और सामान ले जाने की परेशानी कम हो सके.

चांद पर घर बनाना आसान नहीं है. वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं है और न ही धरती की तरह निर्माण का सामान आसानी से मिल सकता है. अगर ईंटें और दूसरी चीजें धरती से ले जानी पड़ें, तो ज्यादा वजन के कारण खर्च बढ़ सकता है. इसलिए वैज्ञानिक चांद पर मौजूद धूल और पत्थरों का इस्तेमाल करने के तरीके खोज रहे हैं.

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चांद की धूल से कैसे बनेंगी ईंटें?

चांद की सतह पर धूल, छोटे पत्थर और चट्टानों के टूटे हुए टुकड़े फैले हुए हैं. इस सामग्री को लूनर रेगोलिथ कहा जाता है. वैज्ञानिक इसी का इस्तेमाल करके निर्माण सामग्री बनाना चाहते हैं. इसके लिए धूल को बहुत ज्यादा गर्म किया जा सकता है. गर्मी से धूल के कण आपस में जुड़कर सख्त हो सकते हैं. इसके लिए लेजर या सूरज की रोशनी का इस्तेमाल किया जा सकता है. ठंडा होने पर यह सामग्री ईंट या पत्थर जैसी मजबूत बन सकती है.

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नासा की 3D प्रिंटिंग तकनीक क्या है?

नासा चांद और मंगल पर मौजूद सामग्री से घर और दूसरी चीजें बनाने की तकनीक पर काम कर रहा है. इसके लिए मून टू मार्स प्लैनेटरी ऑटोनॉमस कंस्ट्रक्शन टेक्नोलॉजी यानी MMPACT प्रोजेक्ट शुरू किया गया है. इस काम में अमेरिकी कंपनी ICON भी शामिल रही है. कंपनी का ओलंपस सिस्टम चांद पर मौजूद सामग्री से निर्माण करने के लिए तैयार किया जा रहा है. 3D प्रिंटिंग में मशीनें सामग्री की एक के ऊपर एक परत लगाकर ढांचा तैयार करती हैं. भविष्य में इससे घरों की बाहरी दीवारें, सड़कें और लैंडिंग पैड बनाए जा सकते हैं. हालांकि, अभी चांद पर इस तकनीक से कोई पूरा घर नहीं बनाया गया है.

सूरज की गर्मी से भी बनी थीं ईंटें

ESA ने 2017 में चांद की मिट्टी जैसी सामग्री से ईंटें बनाने का प्रयोग किया था. इसमें सूरज की रोशनी को एक जगह इकट्ठा करके तेज गर्मी पैदा की गई. इस प्रयोग में करीब 1000 डिग्री सेल्सियस तापमान पर मिट्टी को गर्म किया गया. करीब 20 सेंटीमीटर लंबी, 10 सेंटीमीटर चौड़ी और 3 सेंटीमीटर मोटी एक ईंट बनाने में लगभग 5 घंटे लगे. यह प्रयोग धरती पर चांद जैसी बनाई गई मिट्टी से किया गया था. इससे पता चला कि सूरज की गर्मी से भी निर्माण के लिए मजबूत सामग्री बनाई जा सकती है.

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घरों से पहले बनेंगी सड़कें और लैंडिंग पैड

चांद पर इंसानों के रहने के लिए सिर्फ घर बनाना काफी नहीं होगा. वहां अंतरिक्ष यानों के उतरने की जगह, सड़कें और उपकरणों को सुरक्षित रखने के लिए दीवारें भी बनानी होंगी. जब कोई अंतरिक्ष यान चांद पर उतरता है, तो उसके इंजन से निकलने वाली गैस धूल और छोटे पत्थरों को तेजी से उड़ा सकती है. इससे आसपास के उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है. अगर धूल को गर्म करके जमीन को सख्त बना दिया जाए, तो इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है.

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चांद पर घर बनाने में क्या हैं मुश्किलें?

चांद पर दिन और रात के दौरान तापमान में बहुत ज्यादा अंतर होता है. वहां रेडिएशन और बारीक धूल भी मशीनों को नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए वैज्ञानिकों को यह जांचना होगा कि धूल से बनी ईंटें कितनी मजबूत होंगी और वहां के माहौल में कितने समय तक टिक पाएंगी. 

इसके अलावा, घर के अंदर सांस लेने लायक हवा, पानी, बिजली और सही तापमान बनाए रखने की व्यवस्था भी करनी होगी. सिर्फ दीवारें बना देने से घर इंसानों के रहने लायक नहीं हो जाएगा. फिलहाल चांद पर धूल से बना पूरा घर तैयार करने की कोई तय तारीख नहीं है. वैज्ञानिक अभी इस तकनीक का परीक्षण कर रहे हैं. 

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अगर इसमें सफलता मिलती है, तो भविष्य में चांद पर निर्माण के लिए धरती से कम सामान ले जाना पड़ेगा. शुरुआत में इस तकनीक से सड़कें, लैंडिंग पैड और सुरक्षा के लिए दीवारें बनाई जा सकती हैं. इसके बाद चांद पर इंसानों के लंबे समय तक रहने के लिए घर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है.

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