फिल्म ‘धुरंधर-2’ में एक बहुत खतरनाक स्लो पॉयजन का नाम लिया गया है – डाइमिथाइल मरक्यूरी. फिल्म में इसे इतना खतरनाक बताया गया कि यह धीरे-धीरे शरीर में घुसकर इंसान को मार देता है. सवाल यह है कि क्या यह पॉयजन सच में होता है?
जवाब है – हां, यह बिल्कुल असली है. यह दुनिया के सबसे जहरीले रसायनों में से एक है. वैज्ञानिक इसे ऑर्गेनोमर्करी कंपाउंड कहते हैं. यह इतना खतरनाक है कि सिर्फ दो बूंदें भी इंसान की जान ले सकती हैं.
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यह पॉयजन कब और किसने बनाया?
डाइमिथाइल मरक्यूरी की खोज बहुत पुरानी है. इसे सबसे पहले 1857-1858 में ब्रिटिश केमिस्ट जॉर्ज बकटन ने बनाया था. वे लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री (अब इंपीरियल कॉलेज) में काम करते थे. उन्होंने मिथाइलमर्करी आयोडाइड को पोटैशियम सायनाइड के साथ मिलाकर यह बनाया.

बाद में एडवर्ड फ्रैंकलैंड नाम के वैज्ञानिक ने 1863 में इसे और आसान तरीके से बनाने का तरीका खोजा. शुरू में यह सिर्फ लैब में रिसर्च के लिए बनाया जाता था. कोई भी इसे जानबूझकर हथियार या हत्या के लिए नहीं बनाता था क्योंकि यह इतना खतरनाक है कि खुद बनाने वाले को भी खतरा हो सकता है.
यह कैसे बनाया जाता है?
यह एक लैब में बनाया जाने वाला रसायन है. मुख्य तरीका है – मर्क्यूरिक क्लोराइड को मिथाइल लिथियम या सोडियम अमलगम के साथ रिएक्ट करवाना होता है. यह एक भारी, रंगहीन तरल होता है जो पानी जैसा दिखता है लेकिन उससे तीन गुना भारी होता है.
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इसमें मर्करी और दो मिथाइल ग्रुप जुड़े होते हैं. बनाना बहुत मुश्किल और खतरनाक है क्योंकि यह आसानी से भाप बनकर हवा में फैलता है. आजकल इसे सिर्फ बहुत सुरक्षित लैब में ही बनाया जाता है. ज्यादातर देशों में इसकी हैंडलिंग पर सख्त पाबंदी है.
कहां-कहां इस्तेमाल हुआ है?
इसका कोई व्यावसायिक या रोजमर्रा का उपयोग नहीं है क्योंकि यह इतना जहरीला है. पहले कुछ पुरानी लैब रिसर्च में ऑर्गेनोमेटैलिक कंपाउंड्स बनाने के लिए इस्तेमाल होता था. 1997 में अमेरिका के डार्टमाउथ कॉलेज की केमिस्ट केरन वेटरहान के साथ हादसा हुआ. उन्होंने लैटेक्स ग्लव्स पहनकर सिर्फ दो बूंदें स्पिल कीं. ग्लव्स से पेनिट्रेट होकर यह त्वचा में घुस गया.
पांच महीने बाद लक्षण शुरू हुए. कुछ महीनों बाद उनकी मौत हो गई. यह केस दुनिया भर में चर्चा में रहा. अब लैब में इसकी हैंडलिंग पर बहुत सख्त नियम हैं. किसी अपराध या हत्या में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ क्योंकि यह बहुत महंगा और खतरनाक है. फिल्मों और कहानियों में इसका जिक्र सिर्फ डराने के लिए किया जाता है.

शरीर पर क्या असर होता है?
यह स्लो पॉयजन इसलिए कहलाता है क्योंकि इसके लक्षण महीनों बाद दिखते हैं. यह त्वचा, दस्ताने और यहां तक कि प्लास्टिक से भी आराम से घुस जाता है. शरीर में पहुंचकर यह मिथाइल मरक्यूरी में बदल जाता है. यह ब्लड-ब्रेन बैरियर पार कर दिमाग में हमला करता है.
ये होता है असर...
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क्या इसका इलाज संभव है?
इलाज बहुत मुश्किल और ज्यादातर मामलों में असफल होता है. कोई खास एंटीडोट नहीं है. डॉक्टर कीलेशन थेरेपी देते हैं जिसमें दवाएं मर्करी को शरीर से बाहर निकालने की कोशिश करती हैं. लेकिन अगर पॉयजन दिमाग तक पहुंच चुका हो तो इलाज काम नहीं करता.
केरन वेटरहान के केस में भी थेरेपी दी गई थी लेकिन वे नहीं बच सकीं. डॉक्टर सिर्फ सपोर्टिव केयर (सांस लेने में मदद, दर्द निवारक) दे सकते हैं. ज्यादातर मामलों में मौत हो जाती है. इसलिए लैब में इसे हैंडल करने के लिए स्पेशल ग्लव्स और बॉक्स इस्तेमाल होते हैं.
तो ये जहर असली ही है
डाइमिथाइल मरक्यूरी फिल्म धुरंधर-2 में दिखाया गया स्लो पॉयजन बिल्कुल असली है. यह सिर्फ लैब रिसर्च के लिए था और अब लगभग बैन है. शरीर में घुसकर यह दिमाग को धीरे-धीरे नष्ट करता है. इलाज मुश्किल है. केरन वेटरहान का केस इसकी खतरनाक होने का सबसे बड़ा सबूत है. धुरंधर-2 फिल्म में इसका जिक्र डराने के लिए किया गया. असल इस्तेमाल नहीं किया जाता.