हिमालय के जंगलों में इस सर्दी में आग लगने की घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सैटेलाइट डेटा से पता चलता है कि सर्दियों में आग की संख्या पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है. विशेषज्ञ कहते हैं कि यह अब कोई असामान्य बात नहीं रही, बल्कि जलवायु परिवर्तन के कारण पारिस्थितिकी में बदलाव का संकेत है.
सर्दियों में आग क्यों लग रही है?

भारतीय लोग जुलाई में बाढ़, दिसंबर में बर्फीले पहाड़ और गर्मियों में जंगल की आग की खबरें सुनते हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से मौसम का पैटर्न बदल गया है. इस सर्दी (दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 तक) हिमालय में बारिश और बर्फबारी लगभग नहीं हुई. इससे जंगल सूखे हो गए और घास-पत्तियां आसानी से जलने लगीं. सैटेलाइट विश्लेषण से पता चला कि इस साल 1 दिसंबर 2025 से 20 जनवरी 2026 तक पिछले साल (2024-25) की तुलना में 6,092 ज्यादा आग की घटनाएं हुईं.
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सैटेलाइट डेटा क्या कहता है?
सेंटिनल सैटेलाइट की तस्वीरों से कुल्लू घाटी (हिमाचल) में आग की तीव्रता बहुत बढ़ी दिखी, क्योंकि बर्फ का आवरण पीछे हट गया है. कश्मीर में भी पीर पंजाल रेंज, उरी, बांदीपोरा, निशात और पूंछ तक आग लगी. मिट्टी में नमी न होने से जंगल बहुत ज्वलनशील हो गए.

पिछले छह सालों में पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की बर्फ कम होती जा रही है. उत्तराखंड के ऊपरी इलाकों, हिमाचल के कुल्लू और जम्मू-कश्मीर के पीर पंजाल-किश्तवाड़ में बर्फ की कमी साफ दिखती है.
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स्नोलाइन पीछे हट रही है
कुमाऊं यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अध्ययन (1990-2022) से पता चला कि उत्तराखंड के गोरी गंगा क्षेत्र में औसत स्नोलाइन 520 मीटर ऊपर चली गई (4665 मीटर से 5185 मीटर तक), यानी सालाना 16 मीटर की दर से.
नासा के लैंडसैट सैटेलाइट डेटा से एवरेस्ट क्षेत्र में 2024-25 की सर्दी में स्नोलाइन दो महीनों में 490 फीट (लगभग 150 मीटर) ऊपर चली गई.

बर्फबारी और बारिश में भारी कमी
भारत मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों से...

ग्लेशियरों पर खतरा
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के ग्लेशियोलॉजिस्ट मनीष मेहता कहते हैं कि कश्मीर और लद्दाख में कुछ बर्फबारी हुई, लेकिन उत्तराखंड में लंबा सूखा पड़ा है. इससे ग्लेशियरों का मास बैलेंस नेगेटिव हो सकता है — यानी वे ज्यादा बर्फ खोएंगे. ग्लेशियर पिघलने से ग्लेशियर झीलें बढ़ेंगी, जो भविष्य में बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती हैं.
यह जलवायु संकट सिर्फ जंगल की आग तक सीमित नहीं है. यह पानी की सुरक्षा, कृषि, जैव विविधता और लाखों लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर बर्फबारी और बारिश का पैटर्न ऐसा ही रहा, तो हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र और बदल जाएगा.