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जीवित्पुत्रिका व्रत आज, जानें कैसे शुरू हुई ये व्रत रखने की परंपरा?

जीवित्पुत्रिका व्रत को जिउतिया भी कहते हैं. ये व्रत संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है. छठ की तरह ये पर्व भी तीन दिनों तक मनाया जाता है. कहा जाता है कि जो भी महिला इस व्रत की कथा सुनती है उसे कभी भी अपनी संतान के वियोग का सामना नहीं करना पड़ता है.

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स्टोरी हाइलाइट्स
  • जीवित्पुत्रिका व्रत आज
  • संतान के लिए रखा जाता है ये व्रत
  • महाभारत काल से हुई थी शुरुआत

जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपनी संतान के लिए रखती हैं. मान्यता है कि ये व्रत रखने से संतान दीर्घायु होती है. जीवित्पुत्रिका व्रत को जिउतिया व्रत भी कहते हैं. ये  व्रत निर्जला रखा जाता है. ये व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन किया जाता है. जीवित्पुत्रिका व्रत खासतौर से बिहार, मध्य प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है. आइए जानते हैं कि आखिर ये व्रत रखने कहां से शुरू हुई.

महाभारत काल से है संबंध

जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध महाभारत काल से है. महाभारत के युद्ध में पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था. मन में बदले की भावना लिए वह पांडवों के शिविर में घुस गया. शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे. अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला. कहा जाता है कि सभी द्रौपदी की पांच संतानें थीं. अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली. क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को मार डाला.

ऐसे में भगवान कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुन: जीवित कर दिया. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित होने वाले इस बच्चे को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया. तभी से संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल जितिया व्रत रखने की परंपरा को निभाया जाता है.

नहाय-खाय की परंपरा

छठ पर्व की तरह जितिया व्रत पर भी नहाय-खाय की परंपरा होती है. यह पर्व भी तीन दिनों तक मनाया जाता है. सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के बाद अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नत के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. इसके बाद नवमी तिथि यानी अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है यानी व्रत खोला जाता है.

जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व

जीवित्पुत्रिका या जितिया का व्रत संतान की लंबी उम्र और उसकी मंगल कामना के लिए किया जाता है. माना जाता है कि जो मां ये व्रत रखती है, उसकी संतान को जीवन में किसी तरह का दुख नहीं उठाना पड़ता है और  उसके घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है. जो भी महिला इस व्रत की कथा सुनती है उसे कभी भी अपनी संतान के वियोग का सामना नहीं करना पड़ता है.

 

 

 

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