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Chaitra Navratri 2026: देवी कवच का पाठ करेगा हर संकट से रक्षा! जानें कैसे करें पाठ

Chaitra Navratri 2026: देवी कवच पाठ का रहस्य यह है कि इसमें नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने और साधक को सभी प्रकार की बुराइयों, अकाल मृत्यु, रोग, शत्रुओं, और मुकदमों जैसी बाधाओं से बचाने की अद्भुत शक्ति है. यह कवच मार्कंडेय पुराण का हिस्सा है, जो दुर्गा सप्तशती के अंतर्गत आता है, और इसका पाठ करने से मन शांत होता है, बुद्धि सुरक्षित रहती है, और धन, मान, तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.

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चैत्र नवरात्र में करें देवी कवच का पाठ (Photo: ITG)
चैत्र नवरात्र में करें देवी कवच का पाठ (Photo: ITG)

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्र के इन शुभ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नवदुर्गा स्वरूपों की उपासना करते हैं. मान्यता ऐसी भी है कि इन 9 दिनों में मां दुर्गा से जुड़ी कुछ विशेष उपाय और उनके पाठ करने चाहिए. उन्हीं में से एक है देवी कवच का पाठ. देवी कवच का उपदेश ब्रह्माजी ने मार्कण्डेय ऋषि को दिया था. इस कवच में अपूर्व शक्ति है, इसमें देवी के विभिन्न नामों और शक्तियों का उल्लेख है. इसके पाठ से व्यक्ति हर तरह की नकारात्मक शक्ति से सुरक्षित रहता है. अकाल मृत्यु, तंत्र मंत्र, मुकदमे की बाधाओं से बचा रहता है. साथ ही, इसका पाठ मनचाही वस्तुओं की प्राप्ति भी करा देता है. 

किन दिशाओं में करें देवी कवच का पाठ?

अगर स्वास्थ्य की समस्या निरंतर बनी रहती हो या अगर एक से ज्यादा रोगों से परेशान हों या अगर किसी भी तरह रोग का निवारण ना हो पा रहा हो तो. अगर तंत्र मंत्र की क्रियाओं से परेशान हो तो. अगर किसी मुकदमेबाजी में फंस गए हों तो. अगर शत्रु और विरोधी लगातार नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हों. तो इन सभी समस्याओं से बचने के लिए देवी कवच का पाठ जरूर करें, ऐसा करने से मां का आशीर्वाद बना रहता है. 

कैसे करें देवी कवच का पाठ?

1. रोज मध्य रात्रि में इसका पाठ करें. 
2. देवी के सामने घी का एक दीपक जलाएं. 
3. फिर, सामने एक जल का पात्र रख लें, इसके बाद दुर्गा कवच का पाठ करें. 
4. पाठ के थोड़ी देर बाद सामने रखे जल को अपने ऊपर छिड़क लें. 
5. अगर किसी विशेष हिस्से में समस्या है तो उस हिस्से पर जल लगाएं.

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ये है देवी कवच-

ऊं नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच-
ऊं यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥

ब्रह्मोवाच-
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम्॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥

अग्निना दह्यमानास्तु शत्रुमध्ये गता रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥

न तेषां जायते किंचित् अशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥

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